युद्ध के दौरान धर्म, धर्मात्मा और धर्माधिकारी

अमेरिका-इजरायल के ‘ईरान युद्ध’ पर अमेरिकी मूल के पोप लियो-चौदहवें के वेटिकन स्थित रविवारी संबोधन को पूरी दुनिया में बहुत गंभीरता से लिया गया। जिस युद्ध का नेतृत्व दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका स्वयं कर रहा हो, उसकी कैथोलिक ईसाई समुदाय के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप इतने साफ शब्दों में निंदा करेंगे और उसे खत्म कराने का आह्वान करेंगे; ऐसा बहुत कम लोगों ने सोचा रहा होगा। ईसाई समाज में इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की छवि निश्चय ही और गिरेगी।

युद्ध छेड़ने के दूसरे सप्ताह से ही अमेरिका में उनकी कथित लोकप्रियता का ग्राफ बहुत तेजी से गिर रहा है। बहुत संभव है कि इसका असर उनके राजनीतिक भविष्य पर भी पड़ता दिखे। 

राष्ट्रपति ट्रंप ने 20 जनवरी, 2025 को जब दूसरी बार राष्ट्रपति पद के लिए शपथ ली तो संयोगवश उनका हाथ बाइबिल पर नहीं था, जिसे उनके बगल में खड़ी उनकी धर्मपत्नी मेलानिया ट्रंप ने अपने हाथ में थाम रखा था। पर विचारों से कंजरवेटिव ट्रंप ने ईसाइयों के उस पवित्र धर्मग्रंथ पर हाथ नहीं रखा। शपथ ग्रहण समारोह के बाद ट्रंप के इस आचरण की ईसाई प्रभाव वाले अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया के बड़े हलके में आलोचना भी की गई। कुछ टिप्पणीकारों ने इसे अपशकुन के तौर पर देखा था। 

लेकिन हम जैसे धर्म और राजनीति को बिल्कुल अलग-अलग रखने के हिमायती भारतीय पत्रकारों-टिप्पणीकारों ने इस घटना को खास तव्वजो नहीं दी। शपथग्रहण के दूसरे दिन राष्ट्रपति ट्रंप परंपरा का पालन करते हुए अपने परिजनों और संभावित सचिवों (मंत्रियों)-सलाहकारों के साथ जब वाशिंगटन स्थित नेशनल कैथेड्रल चर्च पहुंचे तो वहां की प्रमुख बिशप मरियन एडगर बुड्डे ने अपने बेहद सधे हुए संबोधन में दुनिया के सबसे ताकतवर देश के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति से मनुष्यता के पक्ष में काम करने की अपील की।

इस क्रम में उन्होंने कहा, “अगर महामहिम राष्ट्रपति मुझे एक अपील करने की इजाजत दें तो मैं कहूंगी कि वह प्रवासी लोगों और ट्रांसजेंडरों के प्रति अपने इस कार्यकल में दयालु रहें।” महिला बिशप की इस अपील बहुत प्रासंगिक थी क्योंकि चुनाव प्रचार अभियान के दौरान ट्रंप और उनके राजनीतिक मित्रों ने इन दोनों समुदायों के प्रति अपने बेहद कठोर रवैये और अनुदारता का परिचय दिया था। पूरी दुनिया में विशप मरियन एडगर बुड्डे की अपील की चर्चा हुई। 

महज तेरह-चौदह महीने बाद ईसाई (कैथोलिक) समाज के सर्वोच्च वैश्विक धर्मगुरू पोप लियो-चौदहवें, जिन्हें पहले कार्डिनल राबर्ट प्रीवोस्ट के नाम से जाना जाता था, ने दो दिन पहले रविवार को वेटिकन के सेंट पीटर्स स्क्वायर से अपने महत्वपूर्ण संबोधन में किसी का नामोल्लेख किये बगैर अमेरिका-इजरायल के ईरान-युद्ध को सिरे से खारिज किया।

यहीं नहीं, उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जिनके हाथ लोगों के खून से सने हैं, उनकी युद्ध जीतने और कथित शत्रुओं पर हिंसा ढाने की प्रार्थना को ईश्वर कत्तई मंजूर नहीं करेंगे। पोप के संबोधन से कुछ समय पहले अमेरिका के रक्षा सचिव (युद्ध मंत्री) पीटर हेगसेथ ने ईश्वर(गॉड) से अपनी प्रार्थना में कहा था, “हे ईश्वर शत्रुओं के खिलाफ हिंसा में कोई चूक नहीं होने देना। उनके प्रति कोई दया नहीं दिखाना।” 

पोप लियो ने अमेरिकी रक्षामंत्री हेगसेथ का नाम लिये बगैर अपने रविवारी संदेश में कहा, “ईश्वर (गॉड) उनकी प्रार्थना (प्रेयर) को नजरंदाज करेंगे। जिनके हाथ लोगों के खून से सने हुए हैं, उनकी प्रार्थना को ईश्वर हरगिज स्वीकार नहीं कर सकते। जो ईश्वर शांति का राजा है, जो हर युद्ध और अशांति को खारिज करता है, वह किसी भी युद्ध को वाजिब नहीं बता सकता।”

अमेरिका के मूल निवासी रहे पोप लियो का यह ऐतिहासिक संबोधन सिर्फ कैथोलिक चर्च और ईसाई समाज के लिए ही नहीं, समूची मुनष्यता के लिए बहुत बड़ा यह संदेश है। यह जितना प्रेरक है, उतना ही साहसिक है। इसमें धर्म के सर्वोच्च आसन से राजनीति के सर्वोच्च आसन की आलोचना और निंदा है। यहां यह बताना भी मौजू है कि पोल लियो अमेरिकी पृष्ठभूमि से आने वाले पहले पोप हैं। उन्होंने अपने संदेश में सिर्फ युद्ध-विराम की ही बात नहीं की, यह भी कहा कि एयर-स्ट्राइक्स पर पूरी तरह प्रतिबंध लगना चाहिए। 

मुस्लिम समुदाय के शीर्ष धर्मगुरुओं ने भी इस युद्ध की निंदा की है। वे शिया धर्मगुरू हों या सुन्नी, जिन-जिन धर्मगुरुओं ने इस विषय पर अब तक बोला है, उन सबने इसके लिए इजरायल-अमेरिका की निंदा की है और युद्ध खत्म करने की अपील की है। अनेक मुस्लिम धर्मगुरुओं ने अयातुल्लाह अली खामेनेई सहित ईरान के अनेक नेताओं और विद्वानों की निशानदेही कर हत्या की घटना को राजनीति की नृशंसता भी कहा है।

इजिप्ट स्थित सुन्नी समुदाय के वैश्विक धर्मगुरू शेख अहमद अल तैयब सहित पाकिस्तान, टर्की और भारत के मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी ईरान पर अमेरिका-इजरायल के साझा हमले की निंदा की है और इसे समूची इंसानियत के लिए बड़ा खतरा करार दिया है।  

भारत में सर्वाधिक धर्मावलंबी हिन्दू धर्म के हैं। लेकिन आश्चर्य की बात है कि हिन्दू धर्मावलंबियों के बड़े धर्माधिकारियों या धार्मिक नेताओं ने अमेरिका-इजरायल के ईरान युद्ध पर या तो बिल्कुल मौन धारण रखा है या कुछेक ने कुछ कहना भी चाहा तो उसमें ज्यादा स्पष्टता नहीं है।

हिन्दू धर्म के चार शंकराचार्य माने जाते हैं। इनमें एक पुरी (ओडिशा) स्थित गोबर्द्धन पीठ के हैं, दूसरे कर्नाटक स्थित श्रृंगेरी पीठ के हैं, तीसरे द्वारका स्थित शारदा पीठ के हैं और चौथे जोशीमठ स्थित ज्योतिर्मठ पीठ के हैं। इस चौथी पीठ के शंकराचार्य के अलावा अन्य किसी शंकराचार्य का कोई मंतव्य या विचार इस युद्ध पर अब तक सामने नहीं आया है।

ज्योतिर्मठ के शंकाराचार्य अविममुक्तेश्वरानंद का बयान भी वैचारिक रूप से बहुत अस्पष्ट है। उनके बयान से यह साफ नहीं होता कि वह युद्ध के बारे में क्या सोचते हैं और आगे के लिए क्या कहना चाहेंगे? उन्होंने अपने बयान में कहा कि हिपोक्रेसी के कारण युद्ध हो रहे हैं। यह बयान युद्ध की असलियत पर ज्यादा प्रकाश नहीं डालता।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कोई धार्मिक पीठ या संस्था नहीं है। अपने मूल स्वरूप और चरित्र में वह एक गैर-चुनावी और गैर-पंजीकृत राजनीतिक दल या संगठन है, जो अपने आपको भारत के बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय यानी हिन्दुओं के हितों का कथित संरक्षक मानता है। आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत भी इसी तर्ज पर कहते हैं कि यह युद्ध ‘इगो के क्लैश’ से हो रहा है।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बयान की तरह भागवत का बयान भी कुछ शब्दों की एक पंक्ति जरूर बनाता है पर उससे कोई ठोस अर्थ नहीं निकलता। 

क्या इससे यह अर्थ निकाला जाय कि हमारे हिन्दू धर्मगुरू भी राज-सत्ता के नक्शेकदम पर अपना धार्मिक-विमर्श पेश करते हैं? हमारी सरकार ने आधिकारिक तौर पर ईरान के विरूद्ध युद्ध छेड़ने वाले अमेरिका-इजरायल की अब तक एक बार भी निंदा नहीं की। ईरान के सु्प्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या की निंदा से भी परेहज किया। इसलिए हमारे धर्मगुरुओं ने भी युद्ध छेड़ने के लिए जिम्मेदार देशों-अमेरिका और इजरायल पर खामोश रहना ही उचित समझा?

इससे एक बात तो बिल्कुल साफ है कि हमारे यहां बहुसंख्यकों के धर्माधिकारी मूलतः सत्ता-राजनीति के सोच और विचार से ही अपनी दिशा तय करते हैं। 

(उर्मिलेश वरिष्ठ लेखक-पत्रकार हैं।)

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