संसद में नक्सलवाद पर बहस के बहाने

कल संसद में भारत के गृहमंत्री ने कई सारे आंकड़े देते हुए बताया कि नक्सलवाद का कमोबेश पूरी तरह से सफाया हो गया है। वह माओवाद के अंत के बारे में बोल रहे थे। उनकी मानें तो यह काम समय से पहले ही पूरा कर लिया गया। वह तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के छत्तीसगढ़ में पुलिस बल की तैनाती, पेसा के उल्लंघन, वहां के स्कूलों के हालात और आर्थिक विकास के आंकड़ों के आधार पर वहां के आदिवासी समुदाय के उत्पीड़न के मुद्दे पर सवालों के जवाब दे रहे थे।

गृहमंत्री नक्सलवाद के बने रहने में कांग्रेस की नीति को भी दोषी बताने से नहीं चूके। मोइत्रा ने बंगाल के अनुभवों के आधार पर नक्सलवाद के प्रति मोदी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि सैन्य बल से विचारधारा को हराया नहीं जा सकता। संसद में कई और सांसदों ने इस सदंर्भ में सरकार की दमन की नीतियों की आलोचना की और इसे लेकर अपनी चिंता व्यक्त की।

इन बहसों को पढ़ते हुए संसद में उस एकमत को ध्यान में रखना होगा, जिसमें सभी की एक राय रही है कि भारत से नक्सलवाद का खात्मा हो। लेकिन, नक्सलवाद है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। भाजपा के आने के बाद इस शब्द का प्रयोग और भी व्यापक तरीके से किया गया और इसकी जद में वे लोग भी आ गये जो खुद नक्सलवाद को खत्म करने की बात करते रहे हैं।

अब जबकि नक्सलवाद और माओवाद के अंत की घोषणा हो चुकी है, तब क्या हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि विकास का रास्ता तेज सरपट दौड़ पड़ेगा? यदि नहीं, तब इसे खत्म करने के लिए इस कदर युद्धस्तरीय अभियान क्यों चलाया गया? क्या इसलिए कि यह देश की ‘आंतरिक सुरक्षा’ के लिए सबसे बड़ा खतरा था?

अब जब यह खत्म हो गया है तो देश की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित कर ली गई है? ऐसे में, क्या आदिवासियों को संवैधानिक अधिकार और पेसा के तहत अधिकार सुरक्षित हो जाएँगे? किसानों को उनका हक मिल जाएगा? मजदूरों को कम से कम उन्हें यूनियन बनाने का अधिकार दे दिया जाएगा? वैचारिक विमर्शों को आजादी दी जाएगी? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो आने वाले समय में अपने जवाब का इंतजार करेंगे।

लेकिन, हम विपक्ष के सांसदों की चिंता और महुआ मोइत्रा की बातों की ओर लौटते हैं। उनकी यह बात सच है कि विचार दमन से खत्म नहीं होते। हरेक विचारधारा उन पेड़, पौधे, जीव और इंसानों की तरह हैं जो अनुकूल हालातों में पनपते, बड़े और विकसित होते हैं और ये अपनी अनुकूलता का निर्माण भी करते हैं, लेकिन दी हुई परिस्थितियों में ही। विचारधारा इंसान के दिमाग के चिंतन की एक पद्धतिपूर्ण अभिव्यक्ति है जो जीवन जीने के सलीके में अभिव्यक्त होती है।

विचार और जीवन के सलीके के बीच यदि मेल न बैठे तब इंसान अपने विचार और यथार्थ को लेकर बेचैनियों से घिर जाता है और आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए तड़प उठता है। ये रुकावटें विचार की हो सकती हैं और ये जीवन जीने के सलीके में भी हो सकती हैं। लेकिन, इतना साफ है कि इंसान एक जीवन की लय में जो टूट पैदा होती है उससे इंसान बेचैनियों से भर उठता है और लय में आने के लिए पहलकदमी लेने की ओर बढ़ जाता है। जीवन की भौतिक स्थितियां यही होती हैं।

भारत में यह लयपूर्ण स्थिति कहीं भी दिखाई नहीं देती। यह न तो परिवार में है, न समाज में है और न सरकार की संरचना में है। हर जगह टकराहटें हैं और उन्हें हल करने के अलग-अलग तरीके हैं। संसद में ही जिस तरह की टकराहटें देखी गई हैं, वह अभूतपूर्व हैं। समाज और परिवार में अलग-अलग तरह की जिस तरह की हिंसाएं बढ़ती हुई दिख रही हैं, उनके आंकड़े डरा देने वाले हैं।

जिस तरह से संपदा का केंद्रीकरण है और उसके प्रति उच्च वर्ग की तरफदारी है, उस तुलना में भारत की बढ़ती गरीबी और उसके साथ होने वाले भेदभाव एक खुली और नंगी सच्चाई की तरह हमारे सामने है। पिछले दस वर्षों में मध्यवर्ग की तबाही को बयान करने वाली कई किताबें छपकर आ गई हैं। भारत में बढ़ते धर्मगुरू और धर्म आधारित अर्थव्यवस्था का विकास कुछ और नहीं इस देश की बर्बादियों की सामानान्तर कहानी है। धर्म के बढ़ते प्रभाव के साथ साथ आत्महत्या की प्रवृत्ति में वृद्धि देखी जा रही है।

सरकार के राजनीतिक निर्णयों पर आम लोगों के विरोध, उसकी राय का आज कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिख रहा है। यहां तक कि विपक्ष की आवाजें अनसुनी कर दी जा रही हैं और उनके विरोध को बहुत बार ‘विकास विरोधी’ बताकर प्रचारित करने से विकल्पहीनता एक विकराल रूप धारण करते हुए दिखती है। विकल्पहीनता की यह स्थिति निश्चित ही सामाजिक हताशा और निराशा में वृद्धि करती है।

तब यह सवाल उठता है कि क्या इससे माओवाद और नक्सलवाद पैदा होता है? मेरा साफ मानना है, नहीं। इससे विचारधारा पैदा नहीं होती। ऐसे हालातों से न तो कांग्रेसी पैदा हो सकते हैं और न ही भाजपा-आरएसएस पैदा हो सकती है। इन हालातों में एक सुप्रीम नेता पैदा जरूर हो सकता है जो चुटकी बजाते ही सारी समस्या का हल निकाल देने का दावा करे और लोगों को इस बात पर सहमत करा ले जाए।

या एक ऐसा नेता हो जो लोगों को सारे तौर-तरीके अपनाकर यह साबित कर दे कि वही समस्या का हल निकालेगा, कोई और नहीं। जाहिर सी बात है कि दूसरे मामले में सत्ता का पूरा और अंतहीन प्रयोग किया जाएगा। दोनों ही स्थितियां विचारधारा नहीं, तानाशाह पैदा करती हैं जिसका मुख्य आधार हिंसा या हिंसा का भावी प्रयोग का वादा मुख्य हो जाता है।

तब यह सवाल जरूर उठता है कि विपक्ष के सांसद संसद में यह बयान क्यों दे रहे थे कि विचारधारा को दमन से खत्म नहीं किया जा सकता? साफ है कि वे सिर्फ नक्सलवाद के बारे में नहीं बोल रहे थे। उनकी चिंता में भारत में तानाशाह राजनीति की बढ़ती प्रवृत्तियां हैं जो तेजी से आक्टोपस की तरह सबको अपने शिकंजे में कस लेने के लिए बेताब हैं। उनकी चिंता में नक्सलवाद को खत्म करने में प्रयुक्त हिंसा के प्रयोग को और दिशा में चले जाने को लेकर है। ‘खात्मे की राजनीति’ राजनीति के बिसात को ही खत्म करने की प्रवृत्ति से ग्रस्त होती है।

ऐसा नहीं है कि माओवादी राजनीति को खत्म करने की चिंता सिर्फ भाजपा, कांग्रेस और इसी तरह की पार्टियों की रही है। यह चिंता वाम राजनीति से भी आती रही है और बकायदा पुस्तक और पुस्तिकाएं निकालकर ‘माओवाद के खतरे’ को चिन्हित किया गया और उन्हें ‘लंपट, गुंडा, लुटेरे, पतित’ जैसी संज्ञाओं से विभूषित किया गया। उनके खिलाफ राजनीतिक प्रचार अभियान चलाया गया। माओवादियों की ओर से भी इसी से मिलती-जुलती भाषा में ऐसे अभियानों के खिलाफ प्रचार चलाया गया।

कई बार इन संदर्भों में हिंसक झड़पें भी हुईं और कुछ ‘काॅमरेड’ मारे गये। वैचारिक और राजनीतिक संघर्षों का यह दूसरा हिस्सा है जहां एकता का पक्ष बेहद कमजोर रहा है। नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे का अभियान जैसे-जैसे तेज होता गया इसकी आंच में माओवाद से इतर वामपंथ की धारा तक भी पहुंचनी शुरू हो गई। दमन के खिलाफ आवाज उठाने में वामपंथ की धारा में यहीं से एकता का पक्ष थोड़ा अधिक मुखर और जोर से आना शुरू हुआ।

प्रतिरोध के ये स्वर गैर-वामपंथी समूहों तक पहुंचे और बहुत से विचारकों और संगठनों ने, जो मार्क्सवाद के विरोधी माने जाते रहे हैं, ‘अर्बन नक्सल’ कहना शुरू कर दिया। यह भारतीय राजनीति में एक अलग तरह की परिघटना थी, जो आगे जाना चाहती थी लेकिन नेतृत्व के बिना गोलबंद और ताकतवर नहीं हो पायी।

माओवाद और नक्सलवाद की असफलता पूरी तरह से उसके नेतृत्व में है जो दमन के आगे घुटने टेक कर बैठ गया और समर्पण को एक राजनीतिक पहल में बदल दिया। घुटने टेक देने वाले इन नेताओं में एक ने भी मार्क्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद की विचारधारा को गलत नहीं बताया है, एक ने भी भारत के समाज को ‘अर्धसामंती-अर्धऔपनिवेशिक’ से अलग नहीं बताया है। सभी ने ‘हिंसा’ के प्रश्न पर बात की है।

ऐसे में, साफ है कि माओवाद की विचारधारा में कोई बदलाव नहीं आया है। यह परिघटना भारतीय वामपंथ की राजनीति में इस मामले में नायाब है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। 1950 के दशक में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का पूरा नेतृत्व ‘पूंजीवादी विकास पर जोर’ के सहारे संसदीय राजनीति की ओर मुड़ा और उसने गुप्त पार्टी का ख्याल छोड़ दिया।

1960 से 70 के बीच ‘सत्ता, सुधार और क्रांति’ के तिराहा समझ पर तीन खंडों में टूटा और क्रमशः भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) बनीं। अंतिम नक्सलवाद के तमगे के साथ आई थी और यही धारा बंगाल के एक गांव से निकलकर पूरे देश में फैलती चली गई। इसका नेतृत्व चारू मजुमदार ने किया था। माओवाद का इतिहास यहीं से माना जाता है।

लेकिन, माओवादी अपने इतिहास को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना से लेकर अपनी नई पार्टी के बनाने तक से जोड़ते हैं, जो सौ साल का इतिहास बनता है।

किसी भी देश में किसी भी राजनीतिक पार्टी की आधारभूमि उसके राजनीतिक अर्थशास्त्र पर निर्भर होती है जो वहां सामाजिक और राजनीतिक जीवन को संबोधित होती है। इसमें दूरगामी पक्ष राजनीतिक अर्थशास्त्र की मूल संरचना से निर्धारित होता है और तात्कालिक पक्ष सत्तासीन समूहों, वर्गों की नीतियों पर निर्भर करता है। ये दोनों साथ-साथ चलते हैं। कोई भी राजनीतिक पार्टी इनमें से किन्हीं भी एक को नजरअंदाज नहीं कर सकती।

किसी भी एक पक्ष पर अनुपयुक्त जोर या तो उसे अप्रासंगिक या राजनीतिक टकराहटों के केंद्र में ला सकता है। दोनों ही स्थितियां खतरनाक होती हैं। माओवादी पार्टी राजनीतिक अर्थशास्त्र में राजनीतिक पक्ष में आ रहे बदलाव और उसके दूरगामी प्रभाव को आंकने में सफल नहीं हुई। हाल के दिनों एक आलोचना यह भी आई है कि इस पार्टी की वर्ग संरचना में बदलाव आया और ‘बुर्जुआ राजनीति’ का प्रभाव बढ़ जाने से आत्मसमर्पण की राजनीति में वृद्धि हुई।

किसी भी पार्टी के बिखराव में उसका आतंरिक पक्ष ही मुख्य होता है। फिर भी, इस ‘बुर्जुआ राजनीति’ का प्रभाव इस पार्टी की विचारधारा में किसी तरह का बदलाव करता हुआ नहीं दिखता है। आत्मसमर्पण करने वाला नेतृत्व अभी भी विचारधारा में एक किसी बदलाव के बारे में नहीं बता रहा है। वे ‘अनावश्यक हिंसा से बचने’, ‘संसदीय तरीके को चुनने’ की बात जरूर कर रहे हैं और सरकार द्वारा दिये जा रहे ‘पुरस्कार’ और ‘सुविधाओं’ का उपयोग करने में उन्हें कोई एतराज नहीं है।

निश्चित ही यह सब घोर अवसरवाद है जो राजनीति के पतित हो जाने से ही पैदा होती है। लेकिन, यह भी साफ है कि यह पतित राजनीति कोई ‘रूप’ ग्रहण करती हुई नहीं दिखती है।

लेकिन, राज्य के दबाव और दमन से बढ़े प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता। 2004 में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान ने ‘माओवाद’ को भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया और उस पर बहस पैदा कर उसे हिंसक राजनीति का पर्याय बना दिया। उनकी यह रणनीति सफल रही और हिंसा को खत्म करने के लिए हिंसा के प्रयोग को औचित्य मिला और इस दिशा में उन्हें कदम उठाना आसान होता गया।

बातचीत की मेज पर ‘राजसत्ता बनाम राजसत्ता’ का जो द्वैध रचा गया  उसे भी कांग्रेस की सरकार ने एक दुधारी तलवार में बदल देने में कामयाब रही। भारतीय राजसत्ता ने इस आधार पर मनोवैज्ञानिक ही नहीं, सैन्य आधारों पर अधिक आक्रामता हासिल करने का औचित्य हासिल किया और सैन्य बलों को भारत के सबसे गरीब लोगों वाले हिस्से में संकेंद्रित करने की ओर ले गया। इससे जनांदोलनों पर भी दमन करने और दमन से जुड़े कानूनों का खुला प्रयोग करने, जेल में डालने का रास्ता पहले से अधिक आसान हो गया।

आदिवासी समुदाय पर दबाव बढ़ता गया। माओवाद के इलाकों के बारे में अध्ययन और रिपोर्ट लिखने के लिए शुरूआती दौर में मध्यवर्ग से आये लेखकों, पत्रकारों और अध्ययनकर्ताओं को मुख्यधारा में खूब तवज्जो दी गई। लेकिन जल्द ही इस रास्ते को बंद कर दिया गया और माओवाद के साथ इनके रोमांस की चर्चा को एक अपराध की तरह देखा जाने लगा। देखते-देखते ऐसे बहुत से लेखकों, पत्रकारों और अध्येताओं को ‘माओवादी’ होने की चपेट में ले लिया गया।

दमन की इन कार्रवाईयों में वकील और यहां तक कि स्टेन स्वामी जैसे लोग भी आए। नागरिक अधिकार एक माखौल बनकर रह गया।
मनमोहन सिंह की सरकार के समय में चलाई गई नीति का राजनीतिक अर्थशास्त्र उसके नवउदारवादी आर्थिक तंत्र में निहित था। जो जल्द ही मोदी सरकार के हाथों राम माधव के शब्दों में ‘विश्व राष्ट्रवादी आकांक्षाओं’ में ढल गया और उसने खुद को हिंदुत्व की विचारधारा पर ‘विश्वगुरू’ होने के दावे साथ एक नया रूप अख्तियार किया।

भारतीय राजनीति में आये इस बदलाव को संसदीय राजनीति के सामान्य उलटफेर की तरह देखा गया। लेकिन, जल्द ही यह साफ दिखने लगा कि यह सामान्य उलटफेर नहीं है। अब चौतरफ़ा दमन का दौर था। यह अब सिर्फ माओवाद का ही दमन नहीं रह गया था। लेकिन, माओवाद पर होने वाला दमन पहले से कई गुना बढ़ चुका था। भारतीय राजनीति में यह एक नया मुकाम था।

कल जब गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के कमोबेश खत्म करने की घोषणा किया तब निश्चित ही वह इसी मुकाम की घोषणा कर रहे थे। इस घोषणा से विपक्ष के सांसद उत्साहित नहीं दिखे। वे इस घोषणा पर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे थे और इस मुकाम को हासिल करने वाले संदर्भों के औचित्य पर अपनी बात रख रहे थे।

भारतीय समाज सैकड़ों तरह के अंतर्विरोधों में फंसा हुआ है। सोशल इंजिनियरिंग के नाम पर आरएसएस-भाजपा धर्म के आधार पर सामाजिक अंतर्विरोधों को बताने में सफल हुई है। कांग्रेस ऐसे किसी अंतर्विरोध को मानने से ही इंकार करती है। उसके लिए यदि नफरत न बढ़ायी जाए तो सभी प्यार और मुहब्बत से रहेंगे। अन्य पार्टियां वोट बैंक के विस्तार के संदर्भ में अंतर्विरोधों की बात कभी करती हैं और कभी नहीं करती हैं।

भारत के अधिकांश आर्थिक चिंतक भारत के लोगों के जीवन जीने की गिरती स्थिति को लेकर चिंतित हैं। समाजशास्त्री अंतर्विरोधों के बीच पनप रही कटुता को लेकर चिंतित हैं। राजनीतिक चिंतक भारत में नागरिक बोध के घटने और तानाशाही प्रवृत्ति के बढ़ते जाने को लेकर आगाह कर रहे हैं। मजदूर वर्ग दास जैसा जीवन जीने को अभिशप्त हो रहा है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान तक से काम में दास प्रथा के पैदा होने के बारे में कई पत्रकारों ने रिपोर्ट दी है। गांव की जमीनों पर दबाव बढ़ा है और इन पर बिना मजदूरी काम करने वाले, खासकर महिलाओं की संख्या में होने वाली वृद्धि के आंकड़े सामने आ रहे हैं। शहरों से लेकर गांव के नुक्कड़ तक बुलडोजर जमीन खाली कराने में लगे हुए हैं। असमानता की श्रेणियां डराने वाली हैं।

भारत में पहली बार अमेरीकी साम्राज्यवाद का खुला हस्तक्षेप आम जनता के बीच बहस का मुद्दा बन गया है। अडानी और अंबानी का एकाधिकार और उनका मोदी सरकार के साथ गठजोड़ भी बहस के केंद्र में आया है। बदलती दुनिया में भारत का अकेलापन और आर्थिक तंगहाली आम जनों को बहुत कुछ बता रहा है। हालात अपने आप में कुछ नहीं होते, लेकिन जब वे राजनीतिक प्रशिक्षण के तथ्य बन जाते हैं तब ये हालात ही राजनीति की शक्ल लेने लगते हैं।

ये हालात ही अपने विश्लेषण में अपनी उपयुक्त राजनीति और विचारधारा की तलाश में लग जाते हैं। जिस तरह से तथ्य इंसान से जुड़े होते हैं, हालात इंसान के होते हैं उसी तरह से विश्लेषण के लिए हासिल राजनीति और विचारधारा भी इंसान के ही होते हैं और इस सबका अगुवा यह इंसान ही होता है।

उसे चाहे जो नाम दिया जाए या वह चाहे जो भी अपना नाम रखे, निश्चित ही इसका एक ऐतिहासिक संदर्भ होगा और उसका वर्तमान होगा जिसे वह संबोधित कर रहा होगा। यही वे हालात हैं जिसमें विचारधाराएं हमेशा जिंदा रहती हैं।

(अंजनी कुमार लेखक व राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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