दुनिया के प्राचीन सभ्यताओं एवं धर्मों में शुमार आज का भारत अपनी समृद्ध परंपराओं, विरासत, संस्कृति की अमिट पहचान के साथ जाना जाता रहा है। यहां नैतिक मूल्यों का महत्व सर्वोपरि रहा है। समाज में चरित्र से कमजोर व्यक्ति को हमेशा ही हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है और उससे दूरी रखी जाती रही है। इस सदी की शुरुआत तक देश और समाज अपनी इस गौरवशाली पहचान को आगे रख बढ़ रहा था पर हाल के वर्षों में हम अपनी उस समृद्ध पहचान को खत्म करते नजर आ रहे हैं। देश तथा समाज को कुछ बेहतर देने की बजाए हम निज स्वार्थ में लीन हो समाज को ही खोखला कर रहे हैं।
भारतीय समाज समग्र रूप से तथा निजी क्षमता के साथ प्रारंभ से ही अपने भीतर की कमजोरियों, कुरीतियों और गलत परंपराओं को अपने विवेक से दूर कर आधुनिक, प्रगतिशील सोच के साथ आगे बढ़ता रहा है जिसकी दुनिया भर में प्रशंसा होती रही है, सनातनी परंपराओं की पहचान और आधुनिक सोच के इसी लचीले पर मज़बूत गठजोड़ ने एक राष्ट्र के रूप में भी हमारी बड़ी पहचान बनाई है।
अपनी इसी समावेशी समझ से हम विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं जहां भारतीय संविधान ही सर्वोपरि है जो प्रत्येक नागरिक को समानता का तथा बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, यही संविधान सभी नागरिकों में देश के प्रति मूल कर्तव्यों का बोध भी कराता है। इसी लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर देश में आम मतदाताओं के जरिए सरकारों का गठन होता है जो उनके प्रति जवाबदेह होतीं रही हैं। दुखद विडंबना है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से इन सारी मज़बूत प्रणालियों का क्रमशः क्षरण प्रारंभ हो गया। आज 2026 में हम पाते हैं कि राष्ट्र की सारी चेक एंड बैलेंस की व्यवस्थाएं लगभग दम तोड़ रही हैं।
2014 के चुनावी परिणाम तत्कालीन यूपीए सरकार की अलोकप्रियता की वजह से बड़े बदलाव लेकर आए जिसके और भी सामयिक कारण थे, जैसे अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के नाम पर आरएसएस पोषित सिविल सोसाइटी का मुखर आंदोलन, नरेंद्र मोदी का कृत्रिम रूप से बनाया गया विराट व्यक्तित्व जो देश की तमाम समस्याओं को हल करने में सक्षम है, राम मंदिर तथा राम सेतु पर भाजपा का स्पष्ट स्टैंड और कांग्रेस को मुस्लिम तुष्टिकरण के फ्रेम में पेश कर चुनाव को हिन्दू-मुस्लिम एंगल देना तीन प्रमुख कारण थे। भाजपा के उस उग्र चुनावी प्रचार की सबसे तीखी और तीव्र प्रतिक्रिया जो मैंने आम मतदाताओं में देखी वह यह थी कि उसने कांग्रेस से नफरत करते हुए, उसे भला बुरा कहते हुए, देश की सभी समस्याओं के लिए जिम्मेदार मानते हुए तथा मोदी जी को हिंदू हृदय सम्राट मानते हुए उनके नाम पर मतदान किया था।
नई सरकार आने के बाद समाज के बड़े और वाचाल तबके ने संघ के नेरेटिव को आगे बढ़ाया कि देश हजार साल की गुलामी से मुक्त हो हिन्दू शासन की राह पर चल पड़ा है। आम जनमानस को बरगलाया गया कि यह उसकी स्वयं की सरकार है, इससे सवाल जवाब न कर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए समय देना चाहिए। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जो भारतीय समाज अपने अधिकारों के लिए सजग और सक्रिय रहा उसने अपनी मुखरता पर अंकुश लगाना शुरू कर दिया, समाज अपनी मूलभूत जरूरतों को नज़रंदाज़ कर संघ के एजेंडों में अपने को उलझाता चला गया। संघ तथा उसके अनुषांगिक संगठन अपनी ही सरकार के संरक्षण में समाज को धर्म की अफीम ऐसी चटाई कि उसकी सुधबुध ही चली गई।
देश और समाज सिर्फ हिन्दू राष्ट्र में ही अपनी सारी समस्याओं का हल देखने लगा जो दरअसल में मृगमरीचिका से ज्यादा कुछ नहीं, सरकार भी इसी आड़ में अपनी तमाम नाकामियों को ढंकती आ रही है। आम जनता के खामोश होने का भरपूर लाभ लेते हुए सरकार ने सारी संवैधानिक संस्थाओं को कब्जे में लेकर अपने राजनैतिक विरोधियों पर तमाम बंदिशें लगाकर उन्हें जनता की आवाज न बनने देने का जतन किया, जबकि लोकतंत्र में विपक्ष जनता की ही आवाज है।
समाज के बड़े तबके का इस सरकार के पक्ष में खड़े होने का नतीजा है कि जो सरकार हिंदू मुस्लिम में गहरे भेद कर अपनी राजनीतिक दुकान चला रही थी वह हिंदुओं में ही भेद कर अपनी सत्ता को मज़बूत करने में लग गई। सरकार ने समाज के हर तबके को बांटते हुए अपनी राजनैतिक चालें चलीं। उसने पेंशन के मुद्दे पर सैनिकों में बंटवारा किया, उसने तीन कृषि कानूनों के नाम पर अन्नदाताओं में विभाजन किया, उसने मनोरंजन की दुनिया को विभाजित किया, उसने शिक्षा जगत में बंटवारा किया, उसने इतिहासकारों में दूरियां बनाई, उसने मीडिया को दो फाड़ कर सूचनाओं और प्रोपोगेंडा में विभाजित कर दिया।
यहां तक कि खिलाड़ियों में भी बंटवारे की लकीरें खींच दी। इसकी इंतहा यह है कि जो खामोशी से इस सरकार के साथ है वो देशभक्त की श्रेणी में और जो इस सरकार तथा उसकी विचारधारा से नाइत्तफाकी रखते हैं, आवाज उठाते हैं वो देशद्रोही हैं, स्पष्ट है कि यह बंटवारा हिंदुओं में ही किया गया है, ताकि अपनी सत्ता अबाध गति से जारी रहे।
धर्म की अफीम चाटकर मदमस्त भारतीय समाज किस कदर इस सरकार का मानसिक गुलाम बन रहा उसकी बानगी देखें तो कोई भी स्तब्ध रह जाए। दुनिया का सबसे वीभत्स अपराध बलात्कार और महिला अपराध माना जाता है इस पर हमारे समाज का दोहरा मापदंड देखिए, देश की राजधानी दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 में घटित निर्भया रेप केस के विरोध में जनता स्वत:स्फूर्त पीड़िता को इंसाफ दिलाने सड़कों पर उतर गई थी, तत्कालीन यूपीए सरकार ने पूरी हमदर्दी से पीड़िता को बेहतर इलाज के लिए सिंगापुर भेजा, ऐसे जघन्य कुकृत्यों पर लगाम लगाने के लिए जस्टिस जे एस वर्मा के नेतृत्व में कमीशन बना कठोरतम कानून बनाया, पीड़िताओं के लिए निर्भया फंड भी बनाया, अभियुक्तों को फांसी की सजा देने की तेज प्रक्रिया के जरिए निर्भया के परिवार को इंसाफ दिलाने का जतन किया, निर्भया के भाई की पढ़ाई पूरी कर पायलट बनाने का पुनीत कार्य कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने स्वयं के प्रयासों से किया।
2014 से बलात्कार के कितने जघन्य अपराध हुए पर क्या जनता ने उसी जज्बे से कभी आवाज उठाई ? निर्भया फंड पर सरकार से कोई सवाल किया? देश भर से कितनी ही बच्चियों के अपहरण पर कोई प्रश्न किया ? हाथरस की बेटी, कठुआ की बेटी, ओडिशा की बेटी, बिहार की बेटी भी उसी दरिंदगी की शिकार हुईं, क्या इनके लिए इंसाफ की वही मुखर आवाज़ उठी ? केवल दिल्ली से ही हजार से अधिक नाबालिग बच्चियों के साथ दरिंदगी हुई, पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज हुए पर जनमानस में सुई पटक सन्नाटा है।
मणिपुर में हमारी ही बेटियों की नग्न परेड, उनसे वीभत्स तरीके से बलात्कार की अंतरराष्ट्रीय शर्मसार करने वाली घटना पर देश में हुई ठंडी प्रतिक्रिया ने महिलाओं के प्रति हमारी खोखली संवेदनाओं को सारी दुनिया के सामने रख दिया। हम यहीं नहीं रुके, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमें गौरवान्वित करने वाली हमारी बेटियों ने जब उन पर हो रहे यौन अपराधों पर देशवासियों से न्याय की गुहार लगाई तो फिर हमारा दोगलापन सामने आ गया जब महिलाओं का बड़ा तबका उस अपराधी के साथ ही खड़ा हो गया, उन खिलाड़ियों को न्याय दिलाना तो दूर की बात रही।
महिला यौन अपराध पर हमारी निष्ठुरता का नंगा सच सारी दुनिया ने एक बार फिर देखा जब अबोध नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण के अपराध का बेहद ही विद्रूप चेहरा जैफ्री एपस्टिन के विश्व व्यापी कुकृत्यों की भयावह दास्तां एपस्टिन फाइल्स में आया, जिसने पूरे विश्व में हलचल मचा दी है। इन फाइल्स में दुनिया भर के कई प्रभावशाली लोगों के नाम हैं, हमारे देश के भी कुछ लोगों के नाम आए हैं।
एक ओर नाम आने पर विश्व में लोगों के इस्तीफे हो रहे, सार्वजनिक माफी मांगी जा रहीं, मामले दर्ज़ हो रहे, वहीं भारत अकेला ऐसा देश है, जहां इस मुद्दे पर पूरी बेशर्मी से इस फाइल्स में आए नामों को न केवल बचाया जा रहा है बल्कि निम्नता की पराकाष्ठा पार कर जैफ्री एपस्टिन को असल में ताकतवर पॉवर ब्रोकर से महिमामंडित किया जा रहा है। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी, मोदी जी के करीबी उद्योगपति अनिल अंबानी, राजस्थान भाजपा सरकार में उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी के पुत्र का नाम, परफेक्ट रिलेशन के सहसंस्थापक इमेज गुरु दिलीप चेरियन का नाम अब तक के खुलासे में सामने आए हैं।
किसी भारतीय महिला जो पीड़िता हैं का भी नाम सामने आया है पर किसी ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया है अर्थात इनकी नैतिक बेशर्मी समझी जा सकती है। संसद में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के इस मुद्दे को उठाने पर केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने संसद की बजाए मीडिया में आकर अपने बचाव में सफाई दी जो पूरी तरह से झूठी, भ्रामक, विरोधाभाषी है। पुरी के पक्षधर पूरी निर्लज्जता से उनके पक्ष में खड़े हो एपस्टिन फाइल्स को ही झूठ का पुलिंदा बता रहे। सत्तारूढ़ भाजपा के लोगों का अपने निर्लज्ज मंत्री के पक्ष में खड़ा होना समझ में आता है कि यह उनकी पुरानी संस्कृति है पर शर्मनिरपेक्ष मीडिया का पूरी बेशर्मी से पुरी का पक्षधर होना बेहद आपत्तिजनक है।
एक महिला एंकर तो राष्ट्रीय सेठ के चैनल पर एपस्टिन को लगभग क्लीन चिट देते हुए उसे शक्तिशाली पॉवर ब्रोकर और फाइनेंस एडवाइजर से नवाज़ कसीदे पढ़ रही थी बाद में सोशल मीडिया पर अपने कुतर्को की सफाई भी दी। सबसे तेज़ चैनल की एंकर तो एपस्टिन को बरी कर इतिहासकार बन बाबर के होमो सेक्सुअल होने की जानकारी बांच रही थी। दूसरी महिला एंकरों का भी कमोवेश यही नज़रिया था। किस दृष्टि से इन्हें महिला हितैषी कहा जाए ? ऐसी गिरी हुई चाकरी कर कैसे ये अपने बच्चों, संबंधियों, परिचितों से नज़रें मिलाती होंगी ? चलिए, इन्हें पैसों के लिए अपनी ग़ैरत बेचने के चलते छोड़ दीजिए। वर्तमान सरकार की सरपरस्ती में मज़े से अपनी धार्मिक दुकान चलाने वाले सरकारी बाबाओं, कथावाचकों, धर्म प्रचारकों के मुंह क्यों सिले हुए हैं जो बात बात पर नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं जो स्वयं को हिंदू राष्ट्र हेतु कृतसंकल्पित बताते हैं।
क्या सनातन धर्म में यह स्वीकार्य है ? इनकी भी इस दौर में इतनी बिसात नहीं कि सरकार से अलहदा अपना पक्ष रख सकें, इन सभी ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी का हश्र देख खामोशी ओढ़ना ही सही समझा। समाज को सही राह दिखाने का दंभ भरने वाली साहित्यकारों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों, प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षकों, खिलाड़ियों, कलाकारों, की जमात कहां है जो इन ज्वलंत मुद्दों पर सवाल जवाब खड़े करे?
अधिकांश की रीढ़ सरकारी बोझ तले झुक चुकी है। जो चंद मुट्ठी भर लोग इन कुकृत्यों पर आवाज उठा रहे हैं, इस व्यवस्था पर प्रश्र उठा रहे, अपनी बेचैनी जता रहे, उन्हें सरकार और उसका तंत्र, चाटुकार मीडिया, सरकार से निजी स्वार्थ चाहने वाले लोग हिन्दू विरोधी, सनातन विरोधी, राष्ट्रद्रोही, अर्बन नक्सली, टुकड़े टुकड़े गैंग बताने में मशगूल है। यह सारी कवायद एक खास विचारधारा द्वारा अपनी सत्ता को अक्षुण बनाए रखने हेतु है जिसकी एक मात्र शर्त है कि समाज को धार्मिक उन्मादी बना, सुसुप्त अवस्था में रख उसे आपस में ही विभाजित रखा जाए, इस वजह से ही देश तथा समाज इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है।
ऐसा नहीं है कि अतीत में देश या समाज पर कोई संकट नहीं आया हो या वह संक्रमण काल से न गुजरा हो, हमारे पूर्वजों ने इन सारी दिक्कतों से इसलिए पार पाया था क्योंकि वे धर्म की अफीम चाटकर बेसुध नहीं थे, वे संकीर्ण विचारधारा के अनुगामी नहीं थे, वे दोगलेपन के शिकार नहीं थे, वे निज धर्म के चश्मे से नहीं बल्कि समग्र राष्ट्रहित में अपनी समझ बनाते थे, वे धर्म को व्यक्तिगत आस्था मानते थे न कि धर्म के नाम पर सार्वजनिक भौंडा प्रदर्शन करते थे, वे सनातन धर्म के मर्म को गहराई से समझते हुए सार्वजनिक व्यवहार करते थे न कि धर्मांधों की लगाई आग में जलकर सार्वजनिक आचरण करते थे।
ध्यान रखें कि वे जिस दौर में थे तब विज्ञान ने इतनी तरक्की नहीं की थी, आवागमन के साधन बेहद सीमित थे, उच्च शिक्षा के अवसर बहुत कम थे, स्वास्थ्य सुविधाओं का अकाल था, एक दूसरे से आसान संपर्क दुरूह था फिर भी उस पीढ़ी ने अपनी जिजीविषा से हमें ऐसा मज़बूत स्वतंत्र देश दिया, सामंजस्यपरक समाज दिया, धर्म के बुनियादी सिद्धांतों के पालन का मर्म दिया, महान और समृद्ध विरासत दिया, पर्यावरण आधारित विकास दिया जिससे हमें आसान, सर्वसुलभ जीवन मिला। इस दौर में विज्ञान ने इतनी तरक्की की, आवागमन काफी बढ़ गए, उच्च शिक्षा हमारी पहुंच में है, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का अंबार है, फिर भी हमने देश और समाज को क्या दिया ? ईमानदारी से अपने से ही सवाल करें क्या आज हम मजबूत राष्ट्र हैं ?
क्या हम समाज में सौहार्द और सामंजस्य बना कर चल रहे ? अपने धर्म के बुनियादी सिद्धांतों का पालन कर रहे ? पर्यावरण, विरासत, संस्कृति, विकास के नाम पर अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सौंपेंगे ? सवाल यह भी हमारे लिए मौजूं है कि हमारा दोगलापन हर स्तर पर परिलक्षित होता है जैसे एक तरफ दुनिया में हम इकलौते देश और समाज हैं जहां बेटियों को देवी का दर्ज़ा दूसरी तरफ सारे विश्व में भारत बलात्कार की राजधानी के रूप में कुख्यात है। छह माह की अबोध बच्ची से लेकर अस्सी बरस की दादी तक यहां यौन कुंठितों का शिकार बनती हैं। यहां भी हमारे प्रधानमंत्री जुमला देते हैं कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।
हम अतिथि देवो भवः का बेसुरा राग अलापते हैं और विदेशी महिला पर्यटकों का रेप करने से पीछे नहीं हटते। इसी तरह भारत इकलौता देश है जहां गाय को माता मानते हैं पर सबसे ज्यादा आवारा पशु भी वही है, सबसे ज्यादा बीफ एक्सपोर्ट भी हम ही करते हैं, ब्राज़ील के बाद भारत दूसरे नंबर पर है। इस पर सत्तारूढ़ भाजपा का सांसद कुतर्क देता है कि देशी गाय मम्मी है, और मिथुन गाय यम्मी है। भारत इकलौता राष्ट्र है जो अपनी नदियों को भी माता मानता है पर सारे विश्व में सबसे प्रदूषित नदियां भारत की ही हैं। गंगा को मां कहकर शिगूफा देने वाले मोदी जी बारह वर्षों में मां गंगा को ही साफ नहीं कर सके तो शेष नदियों का रब ही मालिक है।
विडंबना देखिए नदियों का देश होने के बावजूद साफ पानी की कितनी किल्लत है, लोग गंदे पानी पीकर काल कवलित हो रहे, विकास के नाम पर नदियों के तटों से अवैध रेत उत्खनन से उसके नैसर्गिक बहाव से छेड़छाड़ किया जा रहा है। ठीक इसी तरह देश और समाज में वृक्षों का बड़ा महत्व है इन्हें भी हम ईश्वरीय स्वरूप में पूजते हैं पर अंधे विकास के नाम पर पूरी बेरहमी से हम अपने जंगलों का सफाया कर रहे हैं। एक पेड़ मां के नाम का जुमला फेंककर लाखों पेड़ों को अपने उद्योगपति मित्रों के नाम नेस्तनाबूद करने का काम भी मोदी जी की सरपरस्ती में ही हो रहा है।
महाराष्ट्र में आरे जंगल, छत्तीसगढ़ में बस्तर और सरगुजा के उजाड़े जा रहे जंगल इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। पहाड़ों का भी हमारे समाज में विशिष्ट स्थान है पर इन्हें भी विकास के नाम पर अपने मित्रों को सौंपा जा रहा है, अरावली पहाड़ी, छत्तीसगढ़ में रामगढ़ की पहाड़ी इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। इसी तरह से हमारे तमाम धार्मिक ग्रंथ हमें आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं पर हम कभी उस पर अमल नहीं कर धर्म विपरीत आचरण करते हैं। स्थापित तथ्य है कि मानव सभ्यता अतीत से सबक लेकर वर्तमान का समुचित दोहन कर अपना भविष्य गढ़ती है पर हम अतीत के झूठे गर्व में जीते हुए वर्तमान में नफरतों की वो दीवारें खड़ी कर रहे जो हमारे भविष्य को अंधकारमय बनाएगी।
दरअसल हम निज स्वार्थों में पड़कर खोखला देश और समाज अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपने जा रहे जो बेहद डरावना है, पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। बेहतर है कि हम अपने पूर्वजों के रास्ते चल कर समग्र राष्ट्र तथा समग्र समाज के साथ कदम ताल कर आगे बढ़ें जहां दोहरेपन का कोई स्थान न हो, कठिन और अप्रिय सवालों का स्थान हो। अंतिम सत्य यही है कि हमारा इतिहास गौरवशाली है, वर्तमान दोगलापन से भरा पड़ा है, भविष्य इसी अतीत और वर्तमान के कश्मकश में अपनी जगह तलाश रहा, अर्थात सब कुछ वर्तमान यानि हमारी सोच तथा समझ पर निर्भर है, सनद रहे सवाल केवल हमारा नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों का है ?
(परमजीत बॉबी सलूजा लेखक और टिप्पणीकार हैं।)