प्रेमचंद: वक़्त बदला, व्यथा वही

जिस समय प्रेमचंद ने लिखना शुरू किया, वह भारत के इतिहास का एक संक्रमणकाल था। एक ओर आज़ादी की छटपटाहट थी, दूसरी ओर समाज में व्याप्त विषमता, जातीय उत्पीड़न, स्त्री-वंचना और आर्थिक असमानता की जड़ें गहरी थीं। लेकिन अद्भुत बात यह है कि प्रेमचंद ने अपने समय को ही नहीं, बल्कि आने वाले युगों को भी रच डाला। उनके पात्र आज के अखबारों, न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया की बहसों में अलग-अलग चेहरों के साथ जीवित हैं। उनका समय आज भी हमारे भीतर सांस ले रहा है।

समय का दस्तावेज़, जो आज भी प्रासंगिक है

प्रेमचंद को “समाज का दस्तावेज़कार” यूं ही नहीं कहा जाता। उन्होंने न केवल कथा साहित्य की धारा को नैतिक और सामाजिक दिशा दी, बल्कि अपने लेखन को एक ऐसे आईने में बदल दिया, जिसमें समाज बिना सजावट, बिना बनावटी उजाले के ख़ुद को आज भी देख सकता है।

गोदान का होरी आज भी किसी बैंक की किश्त में उलझा किसान है, जो समर्थन मूल्य और मौसम के बीच झूल रहा है। ठाकुर का कुआं की जातीय विडंबना आज भी देश के किसी कोने में जल संकट और अस्पृश्यता के रूप में ज़िंदा है। पंच परमेश्वर में मिला दोस्ती का झटका आज भी न्याय और रिश्तों के टकराव में देखा जा सकता है। नमक का दारोगा भ्रष्टाचार और ईमानदारी की उस लड़ाई का प्रतीक है, जो आज भी नौकरशाही के गलियारों में गूंजती है।

पात्र बदल गए, पीड़ा वही

आज हम भले ही स्मार्टफोन, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जी रहे हों, लेकिन प्रेमचंद की कहानियों में जो पीड़ा, अन्याय और असमानता की पुकार है, वह कहीं नहीं गई। बस आज के होरी ने ट्रैक्टर ख़रीद लिया है, लेकिन साहूकार अब बैंक और डिजिटल ऋणदाता बन चुके हैं। आज का झुनिया सोशल मीडिया पर ट्रोल होती है, और आज की सुभागी घरेलू हिंसा के विरुद्ध न्याय के दरवाज़े खटखटाती है।

प्रेमचंद की दृष्टि: केवल वर्णन नहीं, परिवर्तन की चेतना

प्रेमचंद का साहित्य केवल यथार्थ का दस्तावेज़ नहीं, एक गहरी सामाजिक चेतना भी है। वे केवल घटनाओं को नहीं, उनके पीछे की मानसिकता, व्यवस्था और उस व्यवस्था की कुंठा को पकड़ते हैं। उनके पात्र करुणा नहीं, समझ और बदलाव की मांग करते हैं।

उनके शब्दों में नैतिकता की गूंज है और विद्रोह की अनुगूंज भी है। “ईश्वर के लिए हम दुख नहीं सहते, समाज के डर से सहते हैं” जैसी पंक्तियाँ केवल दर्शन नहीं, सामाजिक क्रांति की आग हैं।

आज की ज़रूरत: प्रेमचंद को फिर से पढ़ना नहीं, जीना

प्रेमचंद को पाठ्यक्रम में पढ़ना काफी नहीं। उन्हें अपने समय की चुनौती समझकर, उनके सवालों को अपने समाज में दोहराकर और उनके समाधान को फिर से टटोलकर ही हम उनके साहित्य को जीवित रख सकते हैं। आज जब हम जातीय गणनाओं, किसान आंदोलनों, बेरोजगारी, स्त्री स्वतंत्रता, और शिक्षा के बाज़ारीकरण की बात करते हैं,तो प्रेमचंद का साहित्य उस हर विमर्श में कहीं न कहीं मौन गवाही देता है।

प्रेमचंद केवल अतीत नहीं , भविष्य की चेतना भी हैं

आज जब हम उनकी पुण्यतिथि या जयंती पर श्रद्धांजलियाँ अर्पित करते हैं, तो यह याद रखना ज़रूरी है कि प्रेमचंद को याद करना केवल एक लेखक को याद करना नहीं है-यह अपने समाज की अंतरात्मा को टटोलने जैसा है। वह अंतरात्मा जो बार-बार कहती है:

“अगर समाज में अन्याय है, तो साहित्यकार का मौन सबसे बड़ा अपराध है।”

प्रेमचंद का लेखन उनके समय के लिए सच था, लेकिन दुखद यह है कि वही सत्य आज भी अनकहा नहीं हुआ है। पात्र भले ही बदल गए हों, मगर पीड़ा, संघर्ष और सवाल वही हैं। इसलिए जब हम प्रेमचंद को पढ़ा जाए, तो केवल आंखों से नहीं, आत्मा से पढ़ा जाए और फिर अपने समय से उनकी भाषा में संवाद किया जाए।

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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