प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 18 जुलाई 2025 को मोतिहारी में थे। ‘आज तक’ के वेब संस्करण ने शीर्षक जड़ा – ‘पी.एम. मोदी का मिशन चंपारण, मोतिहारी से विकास की सौगात देकर बिहार की 21 सीटें जीतने का प्लान’। कई और चैनलों, बल्कि ‘गोदी’ चैनलों और वैसे ही चरित्र के अखबारों, ऐंकरों, पत्रकारों ने यही बात किन्हीं और शब्दों में कही होगी।
राज्य में विधानसभा चुनाव इसी साल नवम्बर में होने हैं, जैसे पहले महाराष्ट्र में हुए थे, हरियाणा में हुए थे, ओडिशा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कई अन्य प्रदेशों में हुए थे और मौजूदा पी.एम. और उनके गृह मंत्री का, भाजपा के जिन भी दो-चार बचे-खुचे नेताओ पर वरदहस्त है, वे कमोवेश उन प्रदेशों में जाते भी हैं। तो ‘गोदी’ चैनलों और अखबारों ने यह भी बताया कि ‘पी.एम. मोदी एक के बाद एक बिहार का दौरा करके सियासी माहौल बनाना शुरू कर चुके हैं’ और कि वह ‘मोतिहारी में 7217 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की सौगात देकर मिशन-चंपारण’ साधेंगे। यानि राज्य की कुल 243 में से 21 सीटें साधने की कवायद।
अब अक्टूबर-नवम्बर में विधानसभा चुनाव हैं तो पी.एम. आदतन कई बार आ ही चुके हैं और शायद ‘कई सीटें पहले भी साध’ चुके हैं। ठीक-ठीक शायद तीन बार – एक बार 23-24 फरवरी को, दूसरी बार 29 मई को और तीसरी बार 20-21 जून को। 18 जुलाई को मोतिहारी का दौरा, बिहार का चौथा दौरा था। चुनावी दौरा। वैसे भी मौजूदा पी.एम. चुनावी दौरे ही करते हैं, इस हद तक कि विदेश-यात्राओं को भी अक्सर चुनावी दौरे में बदल देते हैं। कभी-कभी ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ के नारे भी लगा-लगवा आते हैं।
मणिपुर की बात अलग है, जातीय हिंसा के पिछले डेढ़-दो साल में पी.एम. भले वहां न गये हों, पर भरोसा कीजिए, विधानसभा चुनाव आएंगे तो वहां भी जरूर पधारेंगे और पधारेंगे तो घोषणाएं, उद्घाटन, झंडी दिखाकर रवाना करना जैसे काम तो आम होंगे ही। फिर अब बिहार दौरे पर गये हैं तो अन्य राज्यों में भी तो जाएंगे। आखिर देर-सबेर चुनाव तो वहां भी होगे। जैसे इस बार 19 जुलाई को वह पश्चिम बंगाल में थे। जून में आखिर ओडिशा और आंध्र प्रदेश भी गये ही थे।
बस एक बात पिछले प्रधानमंत्रियों, उनके मंत्रियों और उनकी सत्तारुढ़ पार्टी के प्रचारकों को हमारे नए पी.एम. से अलग करती है और वह यह कि पहले शिलान्यासों, घोषणाओं, उद्घाटनों, झंडी दिखाने का सीधा ताल्लुक वोटरों को लुभाने से होता था। यह डर था, वोटर का डर, जो हर पार्टी में होता है, चुनावी लोकतंत्र में यह डर होना ही चाहिए।
हमारे मौजूदा पी.एम. को मतदाता का यह डर नहीं है, शिलान्यासों, घोषणाओं, उद्घाटनों, झंडी दिखाने का सबब अब केवल ‘फेंस’ पर बैठी जनता के और ‘गोदी’ ही नहीं वैकल्पिक मीडिया, यू-ट्यूब पर चल रहे मीडिया और उनके पत्रकारों तक को भरमाना भर होता है। भरमते भी हैं वे लोग और पत्रकार भी, केवल ‘गोदी’ वाले नहीं, वे भी जो यू-ट्यूब पर हैं, वैकल्पिक हैं और ई.वी.एम. ‘मैनीपुलेट’ करने, वोटर-टर्नआउट का प्रतिशत 6-8 प्रतिशत तक बढ़ा देने और लोकसभा से लेकर प्रदेशों तक के चुनावों के अपहरण की खबरें देने और उन पर बहस करने में पूरे उत्साह से शिरकत करते हैं।
आप भी देखिये – शायद 19 या 20 जुलाई को यू-ट्यूब चैनल ‘4 पी एम’ ने 2014 से पिछले 11 साल में किये सभी वादे पूरे कर देने की मौजूदा प्रधानमंत्री की जिन बातों पर गुस्साये मोतिहारी वासियों से बात की या एक दूसरे यू-ट्यूब चैनल ‘न्यूज लांचर’ पर उन्हीं दिनों ‘भाड़े पर लाये गये श्रोताओं के पी.एम. के भाषण के बीच उठकर जाने, पी.एम. को काले झंडे दिखाये जाने और कुर्सियां फेंके जाने’ के जो वीडियो फुटेज दिखाये, वे सब ‘सेलेक्टिव’ भी हो सकते हैं।
आखिर इससे कौन इंकार कर सकता है कि अगर ‘गोदी’ चैनलों और अखबारों के लिए, उनके सम्पादकों, रिपोर्टरों और एंकरो के लिए सरकार की डफली बजाना और हर सवाल नेहरु तक पर पटक देना मजबूरी है, तो अमूमन ‘गोदी’ चैनलों, अखबारों से बाहर होने को मजबूर कर दिये गये यू-ट्यूब चैनलों, साइटों ने हमारे वर्तमान पी.एम. और उनकी सरकार के विरोध को बेचना शुरू कर दिया है। यह विरोध ही ‘मोनेटाइज’ होता है, पर ‘गोदी के गहन अन्धकारा’ के इस दौर में यू-ट्यूब आधारित वैकल्पिक मीडिया की एक सकारात्मक भूमिका तो है ही, अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद, और उनकी जरुरत से इंकार नहीं किया जा सकता है।
बहरहाल, सच तो यह है कि परमात्मा हमारे पी.एम. को शतायु दे, लेकिन उनके गैर-जैविक होने के दावे के बावजूद एक दिन वह सत्ता में नहीं होंगे और तब ऐसे और इतने कंकाल दराज से बाहर आ गिरेंगे कि इस वैकल्पिक मीडिया को आज हिकारत से देख रहे वे सब लोग भी इनका रूख करने को मजबूर हो जाएंगे और चकित होंगे कि उनके ‘अखबारों-चैनलों’ ने तो यह सब दिखाया ही नहीं था।
सोचेंगे कि मोदी सरकार की खामियां उजागर कर रहा ‘वैकल्पिक मीडिया’ और सरकार के विरोध में खड़े लोग शायद ठीक ही उन्हें ‘गोदी’ कहते थे। वरना क्या कारण था कि हमारे अखबारों-चैनलों ने कभी नहीं पूछा कि जिन प्रदेशों में भाजपा के नेता चुनावी रैलियां तक नहीं कर पाते, जहां उनकी रैलियों में भाड़ा दिये जाने पर भी भीड नहीं जुटती, जुटती है तो प्रमुख नेताओं के भाषण के बीच ही लोग उठ-उठ कर जाना शुरू कर देते हैं, वहां भी पार्टी बम्पर चुनावी जीत कैसे दर्ज कर लेती है। हरियाणा और महाराष्ट्र तो इसके उदाहरण हैं ही।
पिछला लोकसभा चुनाव हुए करीब साल भर तो हो ही गए होंगे। क्या हमारे मौजूदा पी.एम. ने चुनाव में भाजपा को 240 सीटें मिलने के बाद आज तक लोकसभा में अपनी पार्टी के सांसदों की बैठक बुलायी? क्या पिछले 75 सालों में कभी ऐसा हुआ? 2014 और 2019 में भी यह तो नहीं हुआ था। लेकिन तब तो भाजपा अकेले दम बहुमत से काफी आगे थी। आखिर 2024 में बहुमत से 32 सीटें दूर रह जाने पर किसने जनता दल-यू और चंद्रबाबू नायडू की तेलूगु देशम पार्टी से समर्थन लिया? क्या लोकसभा में भाजपा के नेता ने? लेकिन चुनाव के बाद संसदीय दल की बैठक तो हुई नहीं।
किसी भी पार्टी के नेता का चुनाव तो लोकसभा में उसके नव- निर्वाचित सदस्यों की बैठक में होता है और लोकसभा का पिछला चुनाव होने के बाद लोकसभा में चुने गये भाजपा के नये सदस्यों की तो बैठक कभी हुई ही नहीं। क्या हमारे मौजूदा पी.एम. को डर था और अब भी है कि कहीं उनकी पार्टी के एक भी सांसद ने नेता के चुनाव के लिए गुप्त मतदान की मांग उठा दी तो? क्या चौडी छाती वाले हमारे पी.एम. का डर इतना बडा है? लेकिन जिन्हें वैकल्पिक मीडिया ‘गोदी’ बुलाता है, उन अखबारों-चैनलों ने यह सवाल क्यों नहीं उठाया? क्यों हमारे अखबारों-चैनलों ने कभी यह नहीं पूछा कि मतदान समाप्ति के वक्त हर बूथ पर औसतन पांच-छ: सौ मतदाता लाइनों में कैसे खड़े रह सकते हैं। महाराष्ट्र के आंकड़ो तो यही बताते हैं।
आखिर छ: बजे लाइनों में खड़ो रह गये मतदाताओं से मतदान कराने का नियम तो काफी पुराना है, पर पहले तो ऐसा नहीं होता था। हमारे चैनलो और अखबारों ने तो कभी यह सवाल नहीं उठाया कि ‘कम्प्युटिंग टेक्नीक्स’ में बेहतरी के बाद ‘टेन्टेटिव और फाइनल’ वोटिंग प्रतिशत आने में बारह-पन्द्रह घंटे लगने की बजाय अब आठ-दस दिन कैसे लगने लगे हैं और मत प्रतिशत का अंतर एकाध प्रतिशत की जगह छ:-आठ प्रतिशत तक कैसे पहुंच गया है। कि जिस विधानसभा सीट से शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी चुनाव जीत गये थे, महाराष्ट्र पुलिस ने उस सीट में पड़नेवाले एक गांव के लोगों को ‘मॉक पोल’ कराकर ई.वी.एम. की गणना को गलत साबित करने से क्यों रोक दिया।
हमारे पी.एम. के दुलारे एम.पी. निशिकांत दुबे भले कहते रहें कि ‘मोदी के बिना भाजपा लोकसभा की 150 सीटें भी नहीं जीत सकतीं, सच वह भी जानते हैं कि ई.वी.एम. की बजाय मत-पत्रों से चुनाव हो जाये और ई.डी.-सी.बी.आई. का डंडे की तरह, ब्लैकमेलिंग के एक हथियार की तरह इस्तेमाल का नया चलन बदल जाये और मीडिया और चुनाव आयोग जैसे संस्थान सत्तारूढ़ पार्टी के ‘डिक्टेट’ पर चलना छोड़ दें, तो मोदी के साथ भी भाजपा लोकसभा में 150 सीटें नहीं जीत सकती।
निशिकांत दुबे का वक्तव्य भी बताता हैं कि पी.एम. ने उनकी पार्टी का क्या हाल किया है। ग्यारह साल पहले तक, आप किसी राजनीतिक पार्टी और उनके प्रमुख नेताओं की विचारधारा, उनके कामों से सहमत रहे हों या असहमत, यह सच है कि तब वे अंतत: राजनीतिक पार्टियां और उनसे संबद्ध राजनीतिक नेता होते थे, उनकी एक विचारधारा और मूल्य-व्यवस्था थी। पहले राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के लिए भी सांस्थानिक, संवैधानिक और व्यक्तिगत नैतिकता का एक मतलब होता था।
यह पहला मौका है, जब हमारी सत्तारूढ़ पार्टी किसी चुनाव से, किन्हीं मतदाताओं से नहीं डरती। बल्कि बिहार के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ को देखकर और उसमें खासकर अजित अंजुम जैसे पत्रकारों के वीडियो-खुलासों को देख-सुनकर तो इसमें कोई संदेह ही नहीं रह जाता कि केचुआ लोकसभा और विधानसभा चुनाव को अब ‘पसंदीदा वोटर के चुनाव’ में बदलने पर आमादा है। यह पार्टी की तरह चलती भी नहीं है। आप इस सरकार के ऐसे पांच मंत्रियों के नाम नहीं बता सकते जो राजनीतिक रहे हों।
दरअसल यह राजनीतिक पार्टी है भी नहीं। ग्यारह साल पहले तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ ‘मैनुफैक्चर्ड’ जन-भावना की वजह से सत्ता में आये लोगों ने हर संस्था पर कब्जा कर लिया है, केचुआ तक पर। वह जब चाहती है, चुनाव जीत लेती है और वह हर चुनाव जीतना भी नहीं चाहती, उसी तर्क से जैसे कोई पॉकेटमार किसी बस में हर यात्री की पॉकेट नहीं मार लेता। उनके नेता, कम से कम उनका जो आलाकमान है, वे राजनीतिक नेता रहे नहीं हैं। कभी रहे होंगे। बीस-पच्चीस साल पहले। फिर उन्हें वह होने में दिल्ली की सत्ता करीब दिखी, जो कुछ आज वे हैं।
केन्द्र में और कई राज्यों में चाहे जैसे, सत्तारूढ़ बन बैठी पार्टी यह नहीं बताती कि कैसे पी.एम. फंड में सरकारी कर्मचारियों का एक-एक दिन का वेतन भी जाता है और सुप्रीम कोर्ट में वह गैर-सरकारी फंड हो जाता है, कैसे ई.डी. के छापे के आगे-पीछे बड़ी-बड़ी कम्पनियां करोड़ों रुपये के इलेक्टोरल बांड खरीद डालती हैं, कैसे इलेक्टोरल बांड को सुप्रीम कोर्ट के असंवैधानिक बताये जाने के बाद भी बांड छापे जाते हैं।
कैसे करीब 35 लोग देश की राष्ट्रीयकृत बैंकों को हजारों करोड़ रुपयों का चूना लगाकर विदेश भाग चुके हैं, उनमें विजय माल्या को छोड़, सभी गुजरात के हैं और उनके विदेश भाग निकलने के बाद, ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का नारा लगाते हमारे सौ फीसदी ईमानदार पी.एम. के साथ उनका विदेश की धरती पर ‘ग्रुप-फोटो’ में होना महज इत्तफाक होता है।
मैं पहले ही प्रकारान्तर से कह चुका हूं कि हमारे नये पी.एम., गृह मंत्री और उनके मनपसंद नेताओं के चुनावी दौरों और उनमें की जानेवाली घोषणाओं, शिलान्यासों, उद्घाटनों आदि का सीधा ताल्लुक वोटरों को लुभाने से नहीं, जनता के खासकर ‘फेंस’ पर बैठे, तटस्थ हिस्से और ‘गोदी’ के लिए और आम तौर पर यू-ट्यूब आधारित वैकल्पिक मीडिया के लिए ‘सुनिश्चित जीत’ का तर्क भर पैदा करना होता है। चुनाव जिताने के लिए तो अब केचुआ है और उसके तंत्र हैं, उसकी कारगुजारियां हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त की चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश, सी.जे.आई. को हटाकर उनके स्थान पर केन्द्र के ही एक मंत्री को नामजद कर देने और तीन सदस्यों वाली चयन समिति में दो-एक का स्थायी बहुमत बना देने की विधायी व्यवस्था बेसबब थोडे ही थी। यह भी अकारण नहीं है कि बिहार में एक तरफ अब उस विधायी व्यवस्था से बना मुख्य चुनाव आयुक्त का पी.एम. की पार्टी को पहली बार अकेले दम बहुमत दिला देने पर आमादा मौजूदा ‘एस.आई.आर.’ है – स्पेशल इन्टेन्सिव रिवीजन, विशेष सघन पुनरीक्षण और दूसरी तरफ पी.एम. के चुनावी दौरे।
केचुआ की कारगुजारियों और पी.एम. के दौरों के अलग-अलग हेतु हैं – पहले का उद्देश्य भाजपा को चुनावी जीत दिलाना है और दूसरे का उद्देश्य इस ‘सुनिश्चित जीत’ का तर्क तैयार करना। वरना क्या बिहार में जिस मतदाता सूची से पिछले लोकसभा चुनाव हुए थे, उसमें लाखों, बल्कि करोड़ों मतदाता फर्जी थे और उन्हें बाहर करना अब जरुरी हो गया है।
करीब आठ करोड़ मतदाताओं का ‘विशेष सघन पुनरीक्षण’ एक महीने में किया जाना है। बिहार में मतदाता सूची के पिछले पुनरीक्षण का आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने किया था और लिंगदोह का भी चयन पी.एम., उनके द्वारा नामजद एक अन्य केन्द्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता ने किया था, लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट ने चयन समिति में पी.एम. और लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता के अलावा मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने का निर्देश नहीं दिया था और तत्कालीन केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर पी.एम. द्वारा अपने एक मंत्री को नामजद करने और चयन समिति में स्थायी बहुमत बना लेने की कानूनी व्यवस्था नहीं की थी।
अकारण नहीं था कि पिछला सघन पुनरीक्षण, चालू पुनरीक्षण की तरह एक महीने में ही हुआ था, पर तब यह लोकसभा चुनाव से करीब दो साल पहले और बिहार विधानसभा के दो चुनावों से लगभग तीन-साढ़े तीन साल पहले कराये गये थे। पिछला पुनरीक्षण 15 जुलाई 2002 से 14 अगस्त तक 2002 तक हुआ था, लेकिन तब लोकसभा चुनाव के लिए मतदान 20 अप्रैल 2004 से 10 मई 2004 के बीच और राज्य विधानसभा के दो चुनाव फरवरी 2005 और अक्टूबर-नवम्बर 2005 में कराये गए थे।
यह और बात है कि तब पुनरीक्षण ‘विशेष’ नहीं था और समय इस कदर दिया गया था कि पुनरीक्षण सचमुच हो सके। जब विधानसभा चुनाव इसी साल अक्टूबर-नवम्बर में होने हों और चुनावों की अधिसूचना जारी होने से पहले, यानी पुनरीक्षित मतदाता सूची अगस्त में जारी कर देने की अनिवार्यता हो तो मतदाताओं तक पहुंचे बिना राज्य भर के बी.एल.ओ. की किन्हीं सरकारी भवनों में एक साथ बैठकर जीवित-मृत मतदाताओं के फॉर्म्स आधा-छीधा भरने और अमूमन एक ही पेन से कई-कई फॉर्म्स पर अलग-अलग हस्ताक्षर कर देने की मजबूरी तो होगी ही।
इसी मजबूरी का वीडियो ‘गोदी’ नहीं, बल्कि पी.एम. और उनकी सत्त्तारुढ़ पार्टी की बजाय, संविधान और लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध बड़े और जरुरी पत्रकार अजित अंजुम ने पटना में बना लिया और उनके वीडियो-खुलासों को लेकर बेगुसराय में उनके खिलाफ एक एफ.आई.आर. भी दर्ज हो गया है। गो राज्य में कुछ अखबारों के स्थानीय संस्करणों ने भी इनकी संक्षिप्त रिपोर्टिंग की है।
ग्यारह वर्ष पहले जो लोकसभा चुनाव हुए थे, उससे वर्ष-डेढ़ वर्ष पहले का अन्ना आंदोलन शायद ही कोई भूला हो। वह मनमोहन सिंह सरकार को ‘डिस्क्रेडिट’ करने, मतदाता-मानस में 2 जी, कोयला जैसे बड़े घोटालों में उसकी संलिप्तता साबित कर देने की कारगुजारियां थीं। उस आंदोलन में किन तत्वों, संघों, संगठनों की भूमिकाएं थी, इसपर लंबे-चौड़े अध्ययन और रिपोर्टें प्रकाशित हो चुकी हैं। और 2जी, कोयला घोटालों में राजस्व को लाखो करोड़ रुपये का चूना लगाये जाने के तत्कालीन सी.ए.जी. विनोद राय की ‘फाइडिंग्स’ और उससे जुडे मामलों का सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ, यह अब आम जानकारी है।
यह भी कि विनोद राय को कैसे और क्यों आभारी मोदी सरकार ने 2015 में भारतीय रेलवे का सलाहकार और 2016 में बैंक बोर्ड ब्यूरो का अध्यक्ष नियुक्त किया था। दरअसल 2014 में मतदाताओं ने मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ वोट दिया था और ‘बाई-डिफॉल्ट’ वह नरेन्द्र मोदी और उनकी भाजपा के पक्ष में गया था। पर 2019 और 2024 के चुनावों में क्या हुआ, किसी से छिपा नहीं है।
‘तयशुदा इलेक्शन रिजल्ट्स’: एक नजर
असम के कोकराझार लोकसभा क्षेत्र में कुल 12,40,306 वोट पडे थे, लेकिन गिने गये 12,29,546 वोट। यानि 10,760 वोट कम गिने गए। इसके उलट उत्तर प्रदेश के मथुरा लोकसभा क्षेत्र में वोट पड़े 10,88,206, लेकिन गिन लिए गए 10,98,112 वोट, यानि 9,906 वोट अधिक। कांचीपुरम में गिने गये वोट, क्षेत्र में हुए कुल मतदान से 18,331 अधिक थे। धरमपुरी और श्रीपेरुम्बदूर में भी यही हुआ। छ: सीटें तो ऐसी थी, जहां गिने गये वोटों में कमी या बेशी प्रत्याशी की जीत के अंतर से भी अधिक था। सभी घटनाएं 2019 के आम चुनाव की हैं।
‘एसोसियेशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ ने 2019 के लोकसभा चुनावों में केचुआ की ही वेबसाइट के आंकड़ों से ऐसे 347 संसदीय क्षेत्रों की पहचान की। 543 में से 347 सीटें। मतदान और मतगणना के आंकड़ों में कमीबेशी को लेकर केचुआ से इन पर स्पष्टीकरण मांगने और अंतिम नतीजों की घोषणा करने से पहले ठीक-ठीक आंकड़े देने की मांग करने वाली उसकी एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उसे एक नोटिस भी जारी किया, लेकिन केचुआ ने रटा-रटाया जवाब दिया कि ये आंकड़े ‘टेन्टेटिव’ हैं और स्पष्ट किया कि ‘वोटर टर्नआउट’ के अंतिम आंकडे ‘स्टैन्डर्ड आपरेटिंग प्रोसीजर्स’ का अंग है और यह कानून सम्मत फॉर्मों और प्रक्रियाओं पर आधारित होता है। उसने कहा कि ‘पूरी प्रक्रिया अत्यन्त पारदर्शी है और इसमें हर स्तर पर प्रत्याशियों और दूसरे संबद्ध पक्षों को शामिल किया जाता है। यह सारी गफलत गलती से गलत आंकडे पेश करने, रिपोर्टिंग में देरी और नेटवर्क मामलों के कारण पैदा हुई।’
2024 के संसदीय चुनावों में कुल 362 ऐसी सीटें थीं, जहां चुनावकर्मियों ने कुल पड़े वोटों से 5,54,598 वोट कम गिने और 117 सीटें ऐसी थीं, जिनमें डाले गये वोटों से 35,093 अधिक गिने गये। यानि कुल 543 सीटों वाली लोकसभा के चुनावों में 479 सीटों पर पड़े कुल वोटों और गिने गए कुल वोटों में ‘मिसमैच’ था। और वोट प्रतिशत तो दोनों लोकसभा चुनावों में मतदान के दिन से छ:-सात दिन तक बढ़ते रहे थे और जिसे केचुआ ‘टेन्टेटिव’ कहता है वह ‘फाइनल’ तक आते-आते छ: से आठ प्रतिशत तक बढ़ गया था। 2019 और 2024 दोनों चुनावों में। और ‘टेन्टेटिव’ के बाद ‘फाइनल’ आंकड़े आने में तो कभी-कभी 8-10 दिन तक की प्रतीक्षा करनी पड़ी, वह भी असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों से नहीं।
2014 के आम चुनाव नौ चरणों में हुए थे, 7 अप्रैल से 12 मई तक और शायद 7 अप्रैल 2014 को प्रथम चरण में ‘टेन्टेटिव’ और ‘फाइनल’ के बीच छ: प्रतिशत अंतर को छोड़ शेष सभी चरणों में यह अंतर 0.3 प्रतिशत से 4.5 प्रतिशत तक रहा था। और ‘टेन्टेटिव’ और ‘फाइनल’ के बीच दसेक दिन का फर्क तो कभी नहीं रहा। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तो कतई नहीं, जो दुर्गम तो नहीं ही है। और ‘फाइनल’ मतदान प्रतिशत आने में दिनों का फासला तो बढ़ता ही जा रहा है। ‘फाइनल’ मतदान प्रतिशत भी।
(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं )