शैक्षणिक संस्थानों में भीतर चल रही राजनीति पर न तो मुख्य धारा की मीडिया बहस करती है और न ही कोई बड़ा राजनीतिक दल। जब भी किसी बड़े विश्वविद्यालय से कोई ख़बर बनती भी है तो सिर्फ़ लड़ाई झगड़े या बवाल अथवा कभी किसी बड़ी घटना के घटने पर। ऐसा न के बराबर ही देखा जाता है कि विश्वविद्यालयों के भीतर चल रही शिक्षा प्रणाली या शिक्षा व्यवस्था पर कोई गंभीर कवरेज किया गया हो।
महाराष्ट्र के एक मात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा विगत सालों में जब भी खबरों में आया, तो नकारात्मक खबरों के साथ ही आया, मगर इसके भीतर चल रही राजनीति को न तो कोई समझना चाहता है और न ही दिखाना चाहता है। विश्वविद्यालय की अवधारणा ही यही है, जहां छात्र तर्क और बुद्धि के विकास के साथ साथ दुनिया में हो रहे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों को समझें और उन पर अपनी सोच विकसित कर सकें। मगर अभी के दौर में ऐसा हो पाना मुश्किल होता जा रहा है। सरकार, इन संस्थाओं को अपने विचारों और राजनीतिक कार्यक्रमों की प्रयोगशाला बना चुकी है।
हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रहे रजनीश शुक्ल को 2023 में तमाम विवादों के चलते अपना पद छोड़कर जाना पड़ा। उसके बाद से मार्च, 2025 तक यह विश्वविद्यालय कार्यवाहक कुलपतियों के भरोसे ही चलता रहा। इस दौरान कई विवाद हुए जिनमें उच्च पदों पर आसीन पदाधिकारी अपने वैचारिक मतभेदों में संस्था की बलि चढ़ाते रहे। कभी संघ की दखलंदाजी सामने आई तो कभी वर्तमान सत्ता द्वारा पोषित संगठनों की। हालांकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की वैचारिकी को मानने वाले प्रोफेसर्स भी दो धड़े में बंटते नज़र आए।
रजनीश शुक्ल के कुलपति कार्यकाल में ही हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के मुख्य परिसर से दो विभागों – स्त्री अध्ययन विभाग और फिल्म अध्ययन विभाग को क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद भेज दिया गया। ऐसा करने के पीछे पूर्व कुलपति की मंशा क्या थी, यह अब तक साफ नहीं है मगर कयास लगाए गए कि उनका एक महिला प्रोफेसर से जुड़ा विवाद इस बात की ओर संकेत करता है कि वो ‘ जेंडर सेंस्टाइजेशन ‘ जैसे गंभीर विषयों के खिलाफ रहे हैं और उनके लिए जेंडर संवेदनशीलता कोई मायने नहीं रखती। सूत्रों से यह भी पता चला कि कुछ महिला शिक्षिकाओं ने विशेष संगठन से न जुड़ने का फैसला किया तो उन्हें मुख्य परिसर से दूर करने के लिए पूर्व कुलपति ने स्त्री अध्ययन विभाग सहित फिल्म विभाग को इलाहाबाद भेज दिया। जबकि मुख्य परिसर में तो ये विभाग होने ही चाहिए। क्षेत्रीय केंद्रों में भले से ही यह विषय चलाए जाएं, लेकिन किसी भी संस्था के मुख्य परिसर से विभाग को उठाकर कहीं भेजना, यह तर्कसंगत तो बिल्कुल नहीं लगता। यह मंशागत कार्य की ओर हो संकेत करता है।
क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद में संचालित इन दोनों पाठ्यक्रमों में पिछले सत्रों में कभी शून्य तो कभी एक और दो छात्र एडमिशन लेते हैं। क्षेत्रीय केंद्र में फिल्म अध्ययन विभाग में न तो समुचित संसाधन हैं और न ही प्रयोगशाला फिर भी विभाग चलाया जा रहा है। ज्ञात हुआ है कि फिल्म अध्ययन विभाग के एक प्रोफेसर का राष्ट्रीय स्वयं संघ से जुड़ाव है और उनका घर इलाहाबाद के आस-पास जनपद में पड़ता है ऐसे में उनके द्वारा शासन-प्रशासन पर दबाव बनाया जा रहा कि किसी भी हालत में फिल्म विभाग को मुख्य परिसर में नहीं जाने दिया जाएगा, जो जहां है उसे वहीं रहने दिया जाए और उनके इस दबाव में शायद वर्तमान कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा भी हैं। इन बातों से ऐसा लग रहा है कि शिक्षण संस्थान अब शासन-प्रशासन के व्यक्तिगत हितों तक ही सीमित रह गया है।
एक महिला कुलपति होने के नाते मुख्य परिसर में स्त्री अध्ययन विभाग होने की उम्मीद तो लोगों में बढ़ती ही है। महिला कुलपति से लोगों को न्याय की उम्मीद थी और है कि वो शायद इस विभाग की अहमियत समझें। यह सिर्फ डिग्री प्रोग्राम भर नहीं बल्कि महिलाओं के लिए या जेंडर से जुड़े वातावरण के लिए भी आवश्यक है। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों से देश की बेटियों और महिलाओं की सुरक्षा हेतु प्रतिबद्ध हैं, फिर पांच महीने बीत जाने के बाद भी कुलपति कुमुद शर्मा अब तक यह निर्णय क्यों नहीं ले पा रही हैं। उनके निर्णय पर क्या किसी संगठन का साया है? या वो स्वयं पुराने ढर्रे पर ही विश्वविद्यालय को चलाना चाह रही हैं।
विदर्भ की धरती पर हिंदी विश्वविद्यालय और इस परिसर में संचालित पाठ्यक्रमों के द्वारा उन छात्रों का भला हो सकता है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। जहां पूरे देश में सिनेमा की पढ़ाई अंग्रेजी और मोटी फीस के साथ होती है वहीं यह विश्वविद्यालय कम फीस में हिंदी में पढ़ाई करने वाला एक मात्र विश्वविद्यालय है। ऐसे में विदर्भ और आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों से उनका अधिकार छीन लिया गया और विभाग को ऐसे शहर में भेज दिया गया जहां न तो संसाधन है और न ही छात्र। महाराष्ट्र की धरती दादा साहब फाल्के जैसे सिनेमा के पुरोधा की धरती है और उसी धरा पर बसे एक मात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय में फिल्म अध्ययन विभाग का नदारद होना बेशक राजनीतिक चाल का हिस्सा है।
एक ग्रामीण कहावत है कि ‘ तिरिया के दुख तिरिया जाने’। मगर गोस्वामी तुलसीदास ने यह भी कहा है कि ‘ नारि न मोहे नारि के रूपा ‘। अब कुलपति कुमुद शर्मा क्या ‘ तिरिया के दुख, तिरिया जाने ‘ कहावत को समझते हुए स्त्री अध्ययन विभाग को पुनः मुख्य परिसर में स्थापित करेंगी या गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई का अनुसरण करते हुए विशेष विचारधारा की उंगली पकड़कर चलेंगी। आने वाले कुछ दिनों में विश्वविद्यालय के कौंसिल की बैठक भी है, ऐसे में देखना है कि कुलपति कुमुद शर्मा का निर्णय क्या होता है?
(विवेक रंजन सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं।)