अमेरिका का कैदी नंबर 280 – क्या व्यवस्थित अव्यवस्था का आख़िरी शिकार था?

लोकतांत्रिक विशेषज्ञों और जानकारों का मानना है कि पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर काले बादल मंडरा रहे हैं। जहां इजराइल का जनसंहार अभियान फिलिस्तीन के खिलाफ लंबा और बेहद अमानवीय होता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कोटे डी आइवरी में छोटी बार प्रतिक्रियावादी अधिनायकवादी व्यवस्था की स्थापना फ्रांस के दखल से संभव होने जा रहा है। ऐसे समय में अपराध न्याय व्यवस्था पर ध्यान देना बेहद अहम हो जाता है क्योंकि संवैधानिक व्यवस्था और अपराध न्याय तंत्र को साथ में हमेशा से देखे जाने की जरूरत रही है। इसलिए पूर्व न्यायाधीश अभय एस. ओका ने अपने विदाई भाषण में इस बात को बहुत साफगोई से रखा कि एक जज को दृढ़ और “कष्ट पहुंचाने से न घबराने वाला” होने की जरूरत है क्योंकि कई बार आपको संवैधानिक मूल्यों की रक्षा हेतु ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों से गुजरना पड़ेगा। 

बहरहाल, कैदी नंबर 280 कोई और नहीं अमेरिका में सबसे कम उम्र का इंसान है जिसे बिजली के झटकों से मरने हेतु मृत्युदंड सुनाया गया था। इस केस के विस्तार में जाने से पहले दो बातें स्पष्ट करना बेहद जरूरी है जिसके सापेक्ष में इस पूरे ट्रायल को समझे जाने की जरूरत है और वही वो बिंदु हैं जहां से यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि अपराध न्यायदर्शन को संवैधानिक न्यायदर्शन से जोड़ना क्यों जरूरी है; पहला, अमेरिका में दस प्रथा को 1864 में ही अब्राहम लिंकन द्वारा समाप्त कर दिया गया था। और दूसरा यह कि अमेरिका में विधि के शासन की जगह विधि की सम्यक प्रक्रिया पर बल दिया गया था। 

घटना का तथ्यात्मक विवरण

23 मार्च 1944 को अल्कोलू में दो श्वेत लड़कियों, 11 वर्षीय बेट्टी जून बिन्निकर और 8 वर्षीय मैरी एम्मा थैम्स के शव एक नाले में पाए गए। उन्हें बेरहमी से किसी कुंद हथियार से पीटा गया था। आखिरी बार उन्हें जॉर्ज और उसकी बहन एमी से फूलों के बारे में पूछते हुए देखा गया था। गुमशुदा लड़कियों की तलाश में जॉर्ज के पिता ने भी मदद की थी। थोड़ी ही देर बाद, जॉर्ज और उसके भाई जॉन को गिरफ्तार कर लिया गया, हालांकि जॉन को रिहा कर दिया गया। अधिकारियों का दावा था कि जॉर्ज ने अपराध कबूल किया और उन्हें लोहे का एक टुकड़ा दिखाया, लेकिन इसका कोई लिखित स्वीकारोक्ति नहीं था। 

जॉर्ज को डिप्टी एच.एस. न्यूमैन ने गिरफ्तार किया, जिन्होंने आरोप लगाया कि जॉर्ज ने अपराध स्वीकार कर लिया था। लेकिन उससे अकेले ही पूछताछ की गई, बिना माता-पिता या वकील की मौजूदगी के, जिससे उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। उसके परिवार को भी गंभीर परिणाम भुगतने पड़े: उसके पिता को नौकरी से निकाल दिया गया और परिवार को घर से बेदखल कर दिया गया। भीड़ द्वारा मारे जाने से बचाने (लिंचिंग) के डर से जॉर्ज को अल्कोलू से दूर हिरासत में रखा गया, और उसके माता-पिता को मुकदमे के बाद केवल एक बार ही उससे मिलने की अनुमति दी गई। 

मुकदमा 24 अप्रैल 1944 को हुआ, जो केवल कुछ ही घंटों तक चला। जॉर्ज के लिए नियुक्त किए गए सरकारी वकील, चार्ल्स प्लॉडेन ने उसकी पैरवी करने में बहुत कम प्रयास किया। उन्होंने पुलिस की परस्पर विरोधी गवाहियों को चुनौती नहीं दी, गवाहों से जिरह नहीं की और न ही बचाव पक्ष के गवाहों को बुलाया, जैसे जॉर्ज की बहन, जो उसे अलिबाई दे सकती थीं। अभियोजन पक्ष ने मुख्य रूप से कथित कबूलनामे और शव-परीक्षण रिपोर्टों पर भरोसा किया। अदालत कक्ष में 1,000 से अधिक श्वेत दर्शक मौजूद थे और पूरी जूरी श्वेत थी, क्योंकि अफ्रीकी-अमेरिकियों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया था। मात्र 10 मिनट की विचार-विमर्श के बाद, जूरी ने उसे दोषी ठहराया और उसे मौत की सज़ा सुना दी गई।

केस का फिर से खोला जाना

साल 2004 में इतिहासकार जॉर्ज फ्रायर्सन ने इस मामले की जांच शुरू की, जिसके परिणामस्वरूप नागरिक अधिकारों के वकीलों और नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के सिविल राइट्स एंड रेस्टोरेटिव जस्टिस प्रोजेक्ट ने इसमें प्रयास किए। नए सबूत सामने आए, जिनमें जॉर्ज के भाई-बहनों की गवाही शामिल थी कि हत्या के समय वह उनके साथ था, साथ ही हत्या की जगह को लेकर भी संदेह व्यक्त किया गया। इन सबने उसकी निर्दोषता को समर्थन दिया। वर्ष 2014 में जज कार्मेन मुलन ने दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और यह निर्णय दिया कि जॉर्ज का मुकदमा अनुचित था, उसका कबूलनामा दबाव में लिया गया था और उसकी पैरवी अपर्याप्त थी। उन्होंने यह भी कहा कि उसकी फांसी क्रूर और असामान्य सज़ा थी।

जॉर्ज के मरने के लगभग 60 सालों के बाद अमेरिकी कोर्ट द्वारा यह फ़ैसला सुनाया जाता है कि इस पूरे केस की न केवल जाँच प्रक्रिया, बल्कि पूरा मुकदमा ही विधि की सम्यक प्रक्रिया पर एक भद्दा मज़ाक है। जिसमें पुलिस ने एकपक्षीय परीक्षण किया और जज ने साक्ष्यों को सही तरीके से सराहा नहीं। जिसका एक बड़ा कारण जॉर्ज का अश्वेत होना था, जहाँ उसके रंग के आधार पर उसके लिए न्याय की प्रक्रिया का व्यापक उल्लंघन किया गया। इस बात पर कोई आसानी से कह सकता है कि यह एक जज द्वारा की गई ग़लती थी या उसके द्वारा एक नस्लभेद को समर्थन दिया गया, या जाँच एजेंसियों द्वारा यह किया गया। पर क्या यह आधार नहीं तैयार करता कि जॉर्ज का ट्रायल एक राजनीतिक ट्रायल था और जिस प्रकार से उसकी juvenility को नज़रअंदाज़ किया गया, वह मानव अधिकार के प्रति एक रूखा रवैया था।

“अव्यवस्था के क्रम में भारत”

अभी जब यह लेख लिखा जा रहा है तभी एक ख़बर आई, जिसमें नागपुर ट्रायल कोर्ट द्वारा एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में 18 साल के ट्रायल के बाद यह निर्णय दिया गया कि अभियुक्त आठ लोगों के ऊपर से SIMI (Student Islamic Movement of India) जैसे प्रतिबंधित संगठन का सक्रिय सदस्य होने का कोई पर्याप्त सबूत नहीं है और सभी को रिहा कर दिया गया। क्या यह मान लेना बेईमानी नहीं होगी कि नागपुर सत्र न्यायालय Hussainara Khatoon बनाम बिहार राज्य (1979) के निर्णय से अनभिज्ञ होगा, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने speedy trial (त्वरित सुनवाई) को जीवन जीने के अधिकार से जोड़ते हुए स्पष्ट शब्दों में इसे एक मानक के रूप में रखा था?

इसी प्रकार का एक मामला सूरत सत्र न्यायालय के सामने भी आया था, जब 2001 में लगभग 122 लोगों को SIMI की बैठक में शामिल होने के कारण गिरफ्तार किया गया था। परंतु स्वतंत्र साक्ष्यों के अभाव में उन सभी को 20 साल बाद 2021 में छोड़ दिया गया।

क्या यहाँ से यह सवाल नहीं उठता कि जो घटनाएँ अमेरिका में सदियों से अश्वेत लोगों के साथ होती आ रही थीं, वही घटनाएँ भारत में मुसलमानों के साथ हो रही हैं? भारतीय संविधान के होते हुए, जो भारतीय नागरिकों एवं अन्य लोगों के मौलिक अधिकारों की स्वतंत्रता की रक्षा को सुनिश्चित करता है, फिर भी इसे विशेष आपराधिक अधिनियमों के अंतर्गत पूरी तरह से वरीयता प्राप्त नहीं है, जहाँ विशेष क़ानूनों को संविधान से ऊपर की वरीयता दी जा रही है। क्या यह एक बेहतर स्थिति हो सकती है? इस पर सर्वोच्च न्यायालय को भी बेहद गहराई से विचार करना चाहिए, क्योंकि इसमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाला वर्ग पहले से ही हाशिए पर है।

संविधान की आत्मा को समझते हुए, हमेशा यह प्रयास होना चाहिए कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में खड़ा रहे और जहाँ आवश्यक हो, विशेष हस्तक्षेप किया जाए, ताकि उन लोगों को न्याय मिल सके जो लंबे समय से उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं। कई लोगों को यह लग सकता है कि कैदी नंबर 280 के साथ जो हुआ वह केवल पुराने समय की बात है और अब ऐसा नहीं होता, परंतु हमें स्वयं को सजग रखते हुए अपने आस-पास की स्थिति को ज़रूर देखने की कोशिश करनी चाहिए। आज भी कई लोग ऐसे हैं जिनकी ज़मानत मंज़ूर हो जाने के बाद भी वे केवल ज़मानत बॉन्ड और ज़मानतदार (sureties) न भर पाने के कारण जेलों में बंद हैं।

(निशांत आनंद पेशे से एडवोकेट हैं।)

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