दिन, महीने, साल गुज़र गये बकाया वेतन तो नहीं इन्हें मिलती है सिर्फ़ तारीख 

बनारस। जिंदगी की जरूरतें मेहनत के बदले मिलने वाली पगार से चलती हैं अदालत से मिलने वाली तारीखों से नहीं। बनारस में अपने बकाये वेतन के लिए सालों सालों चक्कर काट रहे दैनिक सांध्य कालीन अखबार के श्रमिकों को देने के लिए श्रम विभाग के पास न्याय तो नहीं बस तारीख है। 

जिन कर्मचारियों ने अपने श्रम के बूते बनारस से प्रकाशित सांध्यकालीन अखबार गांडीव को पहचान दिया कोरोना काल में भी जिन कर्मचारियों ने अपनी मेहनत, लग्न, निष्ठा के साथ अखबार को निकालने में कोई कसर बाकी नहीं रखी उन्हीं कर्मचारियों को प्रबंधन ने बिना किसी सूचना के बाहर निकाल फेंका। जो कर्मचारी सालों  जिम्मेदारी के साथ अखबार के साथ खड़े रहे उनकी ज़िम्मेदारी अखबार प्रबंधन ने नहीं ली। 

तुषार दादा, पारस विश्वकर्मा, राजू विश्वकर्मा, आशुतोष श्रीवास्तव, विजय यादव, जितेन्द्र यादव ये चंद नाम हैं जो अपने हक के लिए सालों से श्रम विभाग के चक्कर काट रहे हैं इन्हें हर तारीख पर एक नयी तारीख मिल जाती है। लगभग तीन दशक तक मशीन पर अखबार छापने वाले पारस विश्वकर्मा कहते हैं हमने अपनी जिंदगी यहां लगा दी हमें बाहर कर दिया। हमारा बकाया भी नहीं मिला। हम श्रम विभाग के चक्कर काट रहे हैं। हमें वो तारीख थमा देते हैं, कहीं किसी रोज़ हम न तारीख बनकर रह जाएं। अखबार के कंप्यूटर विभाग में समाचार टाइप वाले संजय विश्वकर्मा बगैर इलाज कैंसर से मर गये और ये समाचार अप्रकाशित रह गया। 

अखबार प्रबंधन अपने ही कर्मचारियों का हक मारने में कोई कसर नहीं छोड़ा भविष्य निधि (पीएफ) जमा करने के नाम पर कर्मचारियों के वेतन से तो रुपये काट लिया लेकिन वो रुपये कर्मचारियों के भविष्य निधि खाते तक पहुंचे ही नहीं।

बीते चार साल से मुकदमे के दौरान अखबार प्रबंधन और श्रम विभाग द्वारा कर्मचारियों से कई बार कार्य करने का साक्ष्य मांगा गया सभी कर्मचारियों ने अपना साक्ष्य भी प्रस्तुत किया लेकिन श्रम विभाग ने कभी भी अखबार प्रबंधन से इन कर्मचारियों के बारे में ब्यौरा नहीं लिया। सालों से चल रहे मुकदमे के दौरान लगभग आधा दर्जन श्रमायुक्त आए और चले भी गये, लेकिन सभी श्रमायुक्त व बाबू ने कर्मचारियों को सिर्फ झूठा आश्वासन देते हुए यह कहकर शांत कर दिया कि आपका पैसा दूध पी रहा है, आज नहीं तो कल मिल ही जाएगा।

 अपने हक के पैसे (वेतन) के लिए सभी कर्मचारियों को बार-बार विभाग का चक्कर काटना पड़ रहा है। महीने में एक या दो तारीख तो पड़ती ही है। कर्मचारी तयशुदा वक्त पर पहुंच कर वकील को फीस अदा कर तारीख लेकर वापस हो जाते है। बहुतेरे कर्मचारियों की माली हालत बेहद ख़राब है। घर मुश्किल से चल रहा है तो कुछ इतने बूढ़े और बीमार हो चुके हैं कि उनके लिए विभाग का चक्कर काटना मुश्किल है फिर भी हर बार ये आस लेकर पहुंचते हैं कि उनके हक में फैसला होगा और उन्हें उनके हक के पैसे मिलेंगे। 

दरअसल भरे पेट और खाली पेट के लोगों की दुनिया के बीच सबसे बड़ा विरोधाभास है कि भरे पेट वालों को लगता है कि वक्त बहुत है करते रहेंगे जबकि खाली पेट वालों के लिए हर लम्हा खुद को जिंदा रखना ही सबसे बड़ी चुनौती है। कुछ ऐसी ही चुनौती से जूझ रहे हैं सांध्य कालीन दैनिक अखबार के ये कर्मचारी श्रम विभाग के ढीले-ढाले और जिंदगी के सवालों पर टालू रवैयों के बीच।

  (बनारस से भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट।)

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