29 अगस्त के हिंदू अखबार ने लोगों का ध्यान कितना आकृष्ट किया ये मैं नहीं कह सकता पर एक महत्वपूर्ण बात है जिसे ज़रूर समझा जाना चाहिए और उसका विश्लेषण किया जाना चाहिए। भारत के प्रधानमंत्री खुले स्वरों में यह बात कहते हुए नजर आए कि “वैश्विक आर्थिक स्थिति में स्थिरता लाने के लिए यह जरूरी है कि भारत और चीन साथ में मिलकर काम करे।”
इससे आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री ने यह पहल अपनी तरफ से आगे बढ़ाया है और आश्वस्त किया है कि दोनों ही देशों को अपने द्विपक्षीय संबंधों को सामरिक, और लंबे समय के लिए मजबूत करने की आवश्यकता है।
परंतु “कौआ हंस की बोली कैसे बोलने लगा?” शायद यह बहुत सारे लोगों के लिए आश्चर्य की बात हो सकती है परंतु सही मामलों में आर्थिक स्थिति की समझ रखने वालों के लिए यह समझना आसान होगा। पूरे एक दशक में देश की एनडीए सरकार चीन और पाकिस्तान के मुद्दे पर देश की सियासत को गरम किए हुए थी और भारत का चरम राष्ट्रवाद चीन की अर्थव्यवस्था को नाकों चने चबाते हुए सातवें आसमान पर चल रहा था।
पर ऐसा क्या हुआ जो एकदम से बोली बदल गई जनाब। दरअसल, यही भारतीय अर्थव्यवस्था का सच है कि यह कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो सकी जिसका परिणाम है कि आज जब अमेरिका ने 50 फीसदी तक टैरिफ लगा दी है तो रुपया बेतहाशा रूप से परेशान हो रहा है और अपने कच्चे माल तक की खपत करने को लेकर भी समस्या खड़ी हो गई है। इसलिए यह लगातार कयास लगाए जा रहे हैं कि घरेलू मांग ही बचा सकता है।
अर्थशास्त्री जो कई समय से अमेरिका के साथ बढ़ते संबंध को लेकर फूले नहीं समा रहे थे आज उन्हें विकल्प के लिए पुनः अपनी तरफ देखना पड़ रहा है। पर बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार वैसे देख रही है, शायद नहीं। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि मेक इन इंडिया के लिए भारत सरकार ने जापान को खुला न्योता भेजा है। जब मेक इन इंडिया योजना आई थी तब भाजपा सरकार ने इसे कुछ ऐसे ही प्रचारित किया था कि भारत विनिर्माण और उत्पादन का केंद्र बन जाएगा और यह योजना भारत को व्यापक निर्यात देगी। पर वो बड़ा सवाल तब भी था और आज भी है कि क्या भारत के अगर इतने बड़े पूंजीपति लोग हैं पर क्या भारत की व्यवस्था में अपने उत्पादन को लेकर बाहरी निर्भरता को देख कर नहीं लगता कि यहां का पूंजीपति खुद बाहर की पूंजी पर निर्भर है। बहरहाल ये फिर से एक पूरे उत्पादन संबंध के पूर्ण आर्थिक राजनीतिक विवाद का विषय है जो इस लेख का तात्पर्य कतई नहीं है।
वहीं दूसरी तरफ हिंदू की खबरों से थोड़ा ध्यान अलग ओर ले जाएं तो इंडियन डिफेंस रिसर्च एंड स्टडीज में आज ही के दिन का एक लेख छपा है जिसमें भारत में अमेरिका के नए राजदूत सर्गियो गोर के आने को एक नए उम्मीद की तरह देख जा रहा है खास कर भारत और अमेरिका के संबंध में। पर बड़ा सवाल किस आधार पर? क्या अमेरिका के यह राजदूत भारत की अमेरिकी निर्भरता को कम करने के प्रयास से आ रहे हैं? मेरा मानना है बिल्कुल भी नहीं।
यह एक प्रक्रिया के साथ ट्रंप सरकार द्वारा वैश्विक स्तर पर किया जा रहा है जिसके अंतर्गत कई देशों के राजदूत बदले गए हैं। परंतु भारत और अमेरिका के बीच जो 50 फीसदी टैरिफ की समस्या थी उसमें 25 फीसदी का इजाफा इसलिए किया गया क्योंकि भारत ने रशिया से तेल का आयात किया था जबकि रशिया एक लंबे समय से अमेरिकी कठपुतली यूक्रेन के साथ युद्ध कर रहा है। ऐसे हालत में अमेरिका की यह अपेक्षा थी कि भारत भी रशियन अर्थव्यवस्था के embargo को बल दे।
ऐसा न होने पर भारतीय अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने की साजिश भारत को घुटनों पर लाने के लिए अमेरिका ने की। पर भारत ने इसके जवाब में क्या किया? उसने अमेरिका की बैसाखी कमजोर देख कर और बैसाखियों की मदद लिया न कि आत्मनिर्भरता को चुना। वह चुन भी नहीं सकता क्योंकि चुनाव के लिए अपने संसाधनों को बेचने के अलावा आपके पास कुछ और भी होना जरूरी है जैसे प्रौद्योगिकी, नवान्वेषण जिसका व्यापक अभाव देखने को मिलता है।
और यह अभाव हो भी क्यों न जब इस देश के एस्पिरेशन में ही यह बात स्थापित रूप से डाल दी गई है कि आपका कार्य केवल बड़ी कंपनियों की सेवा करना है। देश की बड़ी-बड़ी संस्थाओं जैसे आईआईटी, आईआईएम जैसी संस्थाओं में छात्रों को केवल दूसरी कंपनियों में काम करने के लिए तैयार किया जा रहा हो वहां स्वनिर्भरता एक बहुत दूर की बात नजर आती है।
कुल मिला कर सवाल वर्तमान रणनीतिक पहलों में क्या अलग मोदी जी ने किया है वहीं जाकर अटक जाती है और जिसका बेहद दुर्भाग्यपूर्ण जवाब है, कुछ नहीं किया। हम फिर से कटोरा लेकर खड़े हैं दोराहे पर कि कोई हाथ थाम ले तो हमारा कारवां बढ़ जाए। इसलिए यह कहना उचित है कि भारत में अंध राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है क्योंकि इसके बिना आप अपनी कमियों को बेहतर रूप से छुपा नहीं पाएंगे।
(निशांत आनंद पेशे से एडवोकेट हैं। साथ ही विभिन्न विषयों पर लेखन का भी काम करते हैं।)