अहमदाबाद प्रसाद मिल पार्ट-3 : समूह के बाउंसरों पर दलितों से मार पीट और डिमोलिशन से पहले गहने, कैश और लैपटॉप लूटने का आरोप

अहमदाबाद। लगभग एक माह पहले, 27 जुलाई 2025 को, प्रसाद मिल में टेनेंसी अधिकारों की अनदेखी करते हुए 18 दलित परिवारों के घरों को बिल्डर के प्राइवेट बाउंसरों ने केवल उजाड़ा ही नहीं, बल्कि सोने के गहनों, नकदी, लैपटॉप सहित कई कीमती सामानों की भी लूटपाट की थी।

प्रसाद मिल की निवासी मित्तल चौहान ने बताया कि “हमारे घर का सामान और गहनों के अलावा लैपटॉप आदि सबकुछ लूट लिया गया। घर को पूरी तरह गिरा दिया गया। पुलिस और बाउंसरों ने हमें मार्कशीट्स और अन्य दस्तावेज तक निकालने नहीं दिए।”

इसके बाद, 27 अगस्त को पुलिस और बाउंसरों की टीम फिर से आई और दबंगई से सभी लोगों को मिल कंपाउंड से बाहर निकाल दिया। उन्होंने आयरन शीट लगाकर आने-जाने का रास्ता भी बंद कर दिया। इसके विरोध में कांग्रेस की शहर प्रमुख सोनल पटेल और विधायक जिग्नेश मेवाणी मौके पर पहुंचे और पीड़ितों को साथ लेकर पुलिस कमिश्नर कार्यालय गए। जहाँ कार्यवाही करने का वादा तो किया गया लेकिन अब तक कुछ भी नहीं हुआ है।

पीड़ितों के अनुसार, पुलिस कमिश्नर और डीसीपी (कंट्रोल) ने स्पष्ट कहा कि पुलिस बंदोबस्त केवल मिल का कब्जा ट्रांसफर कराने के लिए दिया गया था। घरों को तोड़ने का कोई आदेश नहीं था। यदि ऐसा हुआ है, तो यह आपराधिक कृत्य है। उन्होंने पीड़ितों से लिखित अर्जी मांगी और कार्रवाई का आश्वासन दिया था।

मित्तल ने आगे बताया, “हमने डीसीपी मैडम को कहा कि हमारे दस्तावेज, किताबें और लैपटॉप मलबे में दब गए हैं। उसी दिन शाम को पुलिस इंस्पेक्टर चिराग गोसाईं ने एक बाउंसर के पास से मेरा लैपटॉप अच्छी स्थिति में बरामद कर मुझे लौटा दिया। लेकिन रिकवरी के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की और न ही कोई गिरफ्तारी की है। गोसाईं साहब ने रिकवरी का वीडियो अपने मोबाइल से शूट किया था।”

प्रसाद मिल की ही निवासी धर्मी गोहिल ने आरोप लगाया कि “प्रसाद मिल के दिवालिया होने के बाद लंबे समय से सरकार और मिल के बीच अदालती लड़ाई चल रही है। इसमें अदालत की तरफ से हमें कभी कोई नोटिस नहीं मिला है। किसी अदालत ने हमें प्रतिवादी नहीं बनाया है। यदि हमारे खिलाफ किसी अदालत का निर्णय है तो बिल्डर और पुलिस को हमें वह आदेश देना चाहिए न कि दबंगई से हमें हमारे घरों निकालना चाहिए। बिल्डर के साथ पुलिस, प्रशासन और नगर निगम सब मिले हुए हैं।

हमें पुलिस शिकायत करने से भी रोका गया है। एक एनजीओ ने हमारी ओर से शिकायत दर्ज कराई है। लेकिन एक अन्य वकील ने बताया कि वह ‘थर्ड पार्टी शिकायत’ है। यदि इस शिकायत के आधार पर कार्यवाही के लिए कोर्ट जाते हैं तो कोर्ट इस पर सवाल खड़ा कर सकती है कि पीड़ितों ने खुद शिकायत क्यों नहीं की। मैंने अब एक लिखित शिकायत दे दी है और अन्य लोग भी ऐसा करने जा रहे हैं।”

इस मामले में कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने सुप्रीम कोर्ट के लिए वकील दिया है। SFI के गुजरात इंचार्ज और अधिवक्ता नितीश एम. नायर ने हाई कोर्ट में केस लड़ने की ज़िम्मेदारी ली है। पीड़ितों को वकील की फीस भी नहीं देना है है। ऐसा लगता है कि अडानी समूह और इससे जुड़े बिल्डरों ने प्रसाद मिल के निवासियों के घेरा बंदी कर दी है ताकि यह लोग कोर्ट भी न पहुँच सकें।

अहमदाबाद में डिमोलिशन का संकट

पिछले एक वर्ष में नगर निगम द्वारा बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की गई है। लगभग 20 हज़ार घरों पर बुलडोज़र चल चुका है, जिससे करीब 1 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं। विरोध में आत्मविलोपन (स्वयं को आग लगाने) जैसी घटनाएँ भी हो चुकी हैं। इसके बावजूद प्रशासन की कार्रवाई जारी है। इसी ड्राइव का लाभ उठाते हुए कुछ बिल्डर दबंगई से कानून को ताक पर रखते हुए ज़मीनों पर कब्ज़ा कर रहे हैं। लोगों के टेनेंसी राइट मारे जा रहे हैं। प्रसाद मिल अकेला मामला नहीं है जहाँ टेनेंसी राइट को पामाल किया गया हो। रखियाल में भी बीजेपी समर्थित एक बिल्डर ने पुलिस और गुंडों की मदद से संपत्ति पर कब्ज़ा किया है।

कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे को नगर निगम राजनीति का केंद्र बना दिया है। प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा, शहर प्रमुख सोनल पटेल, सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालजी देसाई और विधायक जिग्नेश मेवाणी लगातार पीड़ितों से मुलाकात कर रहे हैं। हालांकि भाजपा की नगर निगम पर मजबूत पकड़ के कारण कांग्रेस को राजनीतिक बढ़त मिलना मुश्किल माना जा रहा है। लेकिन इस मुद्दे पर सत्ता परिवर्तन असंभव नहीं है। 

30 अगस्त का डिमोलिशन के विरोध में प्रस्ताव पास हुआ

30 अगस्त को अहमदाबाद स्थित सरदार स्मारक में पीड़ितों, सिविल सोसाइटी और कांग्रेस नेताओं की बैठक हुई। सर्वसम्मति से तीन प्रस्ताव पारित किए गए:

  1. डिमोलिशन ड्राइव तुरंत रोकी जाए। विस्थापन नीति में बदलाव कर “मकान के बदले मकान” की नीति लागू की जाए और अशांत धारा कानून समाप्त किया जाए।
  2. डिमोलिशन के विरोध में आत्मविलोपन करने वाली नर्मदा बेन कुमावत और अशांत धारा के कारण आत्महत्या करने वाली सानिया के परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जाए।
  3. प्रसाद मिल में हुई गुंडई की निष्पक्ष जांच हो। पुलिस इंस्पेक्टर और कंपनी निदेशकों के खिलाफ एट्रोसिटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए।

प्रस्ताव की प्रतियां मानव अधिकार आयोग और गुजरात सरकार को भेजी गई हैं।

सबूतों को मिटाने की कोशिश

पीड़ितों का आरोप है कि प्रसाद मिल की लूट के सबूत छिपाने के लिए बिल्डर और एजेंसी ने रात के समय में मलबा और उसमें दबे घरेलू सामान को डंपरों में भरकर फेंक दिया। पुलिस कमिश्नर कार्यालय से जांच और कार्रवाई का आश्वासन मिलने के बावजूद, अब तक न तो एफआईआर दर्ज हुई है और न ही किसी पर कार्रवाई।

इस पूरे मामले में एक तरफ अहमदाबाद के बड़े बिल्डर और देश का सबसे शक्तिशाली कॉर्पोरेट समूह अडानी खड़ा है, और दूसरी तरफ दलित समुदाय से आने वाला कमज़ोर मज़दूर वर्ग।

(अहमदाबाद से कलीम सिद्दीकी की रिपोर्ट।)

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