नेपाल में युवाओं के विद्रोह-बगावत को कैसे देखें ?

सबसे पहले इस विद्रोह-बगावत से जुड़े तथ्यों पर एक निगाह डाल लेना चाहिए-

1-विद्रोह-बगावत के मुख्य निशाने क्या और कौन लोग हैं?

इस विद्रोह-बगावत के मुख्य निशाने नेपाली सरकार, राजसत्ता के शीर्ष संस्थान ( संसद-सुप्रीमकोर्ट-राष्ट्रपति भवन आदि), नेपाली सरकार के शीर्ष व्यक्ति ( प्रधानमंत्री-मंत्री इत्यादि) और नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री-मंत्री ( प्रचंड-बाबूराम भट्टाराई आदि) और मीडिया हाऊस हैं।

निम्न राजसत्ता के संस्थानों और व्यक्तियों के ऑफिसों-घरों को जलाया गया-

1- सुप्रीम कोर्ट 

2-सिंह दरबार ( नेपाली राजसत्ता का परंपरागत केंद्र)

3-राष्ट्रपति भवन 

4-नेपाल के सबसे बड़े मीडिया हाउस ( कांतिपुर पब्लिकेशन) 

5- काठमांडू की केंद्रीय जेल को भी तोड़ दिया गया।

जिन पूर्व प्रधानमंत्रियों-मंत्रियों के घरों को जलाया गया-

पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ( कांग्रेस)

पूर्व प्रधानमंत्री झालानाथ खनाल (  मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी )

पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई  (माओवादी पार्टी )

पुष्पदहल उर्फ प्रचंड ( कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल( मओविस्ट सेंटर)

वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ( मार्क्सवादी-लेनिवादी पार्टी) और उनके मंत्री 

राजनीतिक पार्टियों के ऑफिस 

2- इस विद्रोह-बगावत की मुख्य शक्ति कौन वर्ग है? 

इस विद्रोह-बगावत मुख्य शक्ति मध्यवर्गीय-निम्न मध्यमवर्गीय, शहरी, विशेषकर करके काठमांडू और आप-पास के युवा हैं। इसकी एक हद तक नेतृत्वकारी शक्ति- नई पीढ़ी का नेपाल“GenZprotests”  (‘NextGenNepal’)    नामक ग्रुप है। 

नेपाल, विशेषकर नेपाल की राजसत्ता के केंद्र राजधानी काठमांडू की सड़कों पर जो कुछ हुआ और जैसे हुआ, वह इस बात का स्पष्ट साक्ष्य है कि नेपाल के युवाओं, विशेषकर मध्यवर्गीय-निम्न मध्यवर्गीय युवाओं के बीच नेपाली राजसत्ता के खिलाफ गंभीर असंतोष, आक्रोश और आक्रामक नफरत है। 

युवाओं में इस कदर राजसत्ता के खिलाफ आक्रोश है कि वे अपनी जान भी जोखिम डालकर राजसत्ता शीर्ष व्यक्तियों और संस्थानों को ध्वस्त कर दिए और अन्य ध्वस्त करने की कोशिश की। अभी तक की पुष्ट खबरों के मुताबिक 20 प्रदर्शनकारी मारे गए और करीब 200 गंभीर रूप से घायल हैं। आक्रोश इस कदर था कि युवाओं ने गोली, लाठीचार्ज, कर्फ्यू, पुलिस और सेना तक की कोई परवाह नहीं की। 

युवाओं का राजसत्ता के खिलाफ विद्रोह-बगावत वर्तमान सरकार, सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों (प्रधानमंत्री-मंत्री) तक सीमित नहीं रही है, इसके पहले के नेपाल के प्रधानमंत्री-मंत्री रहे, व्यक्तियों को उतनी आक्रामकता के साथ निशाना बनाया गया। 

पूर्व प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों, पूर्व मंत्रियों और राजनेताओं को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया, उनके घरों में आग लगाई गई।

3- विद्रोह-बगावत के तात्कालिक कारण- 

सोशल मीडिया पर प्रतिबंध-

सोशल मीडिया आज के युवाओं-किशोरों के लिए सांस जैसा है, हम सभी अपने अनुभवों से जानते हैं। यह उन्हें कई तरह की संतुष्टि-संतोष देता है, तो उनके असंतुष्टि-आक्रोश, यहां तक भड़ास की अभिव्यक्ति का मौका भी देता है। बिना कोई वैकल्पिक सोशल मीडिया सोशल मीडिया मुहैया कराए, नेपाल सरकार ने इस पर रातों-रात, बिना कोई जनमत बनाए एकतरफा तानाशाही पूर्ण तरीके से बंद कर दिया। एक तरह के अभिव्यक्ति की आजादी के प्लेटफार्म को उनसे छीन लिया, जिसमें वे सत्ता और सरकार विरोधी अभिव्यक्तियां भी कर रहे थे।

रुस-चीन में कई कई सोशल मीडिया पर प्रतिबंध हैं, लेकिन विकल्प भी उपलब्ध कराए गए हैं। इसके साथ जनमत को राष्ट्र के नाम पर ही सही इस मामले में एक हद सहमत करने की कोशिश गई थी।  

नेपाल की एक के बाद-एक बनने वाली सरकारें और प्रधानमंत्री नेपाली युवाओं को सम्मानजनक रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन-स्थिति तो नहीं दे पाईं, उनके हाथ उनका सबसे नजदीकी सुख-दुख के साथी ( सोशल मीडिया) को भी वर्तमान ओली की सरकार ने छीनने की कोशिश की। 

चरम बेरोजगारी – पलायन की विवशता का न थमना

नेपाल में आधिकारिक आंकड़े के तौर पर बेरोजगारी करीब 13 प्रतिशत है। जब आधिकारिक और औपचारिक क्षेत्र की बेरोजगारी की बात हो रही है, तो इसमें नेपाल के अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले 83 प्रतिशत लोग शामिल नहीं है। यह सिर्फ औपचारिक क्षेत्र का आंकड़ा है। जिसमें एक निश्चित डिग्री वाले मध्यवर्गीय शिक्षित-प्रशिक्षित तकनीकी तौर पर कुशल युवा ही शामिल होते हैं। इनके बीच 12 प्रतिशत बेरोजगार हैं।15 से 25 वर्ष तक के युवाओं के मामले में यह बेरोजागारी 25 प्रतिशत तक है। 

नेपाल लंबे समय तक सबसे सस्ते श्रम और श्रमिकों की आपूर्ति करता रहा है। उम्मीद थी कि नेपाली गणतंत्र की स्थापना के बाद यह प्रक्रिया थमेगी। नेपाली लोगों को नेपाल में रोजगार मिलेगा, लेकिन इस स्थिति में बहुत कम सुधार आया। आज नेपाल के लोग अरब देशों, मलेशिया जैसे देशों, भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सस्ते श्रमिक और सबसे कठिन कामों को जाने के लिए पलायन के लिए बड़ी संख्या में विवश हैं। इस प्रक्रिया में वे नेपाली के नाम से अपमानित होने को भी विवश हैं।

3- राजनीतिक जीवन में चरम भ्रष्टाचार 

दुनिया की वैश्विक संस्थाओं ने नेपाल को एशिया का सबसे भ्रष्ट देश घोषित किया है। नेपाल में पिछले 17 (2008 से अब तक) वर्षों में जो 14 सरकारें बनी हैं, उनके करीब सभी प्रधानमंत्रियों तक पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। इसमें पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड (कभी माओवादी आंदोलन के शीर्ष नेता) भी शामिल हैं।

यह भ्रष्टाचार लोगों को साफ-साफ दिखता है। नेताओं के रहन-सहन और जिंदगी में आम लोगों की जिंदगी में लोगों को जमीन आसमान का अंतर दिखता है।  

प्रदर्शनकारियों ने शानो-शौकत और विलासिता की जिंदगी जीने वाले नेताओं के बेटों को लक्ष्य करके इन्हें- “Nepo Babies” and “Nepo Kids”। नाम दिया है।

नेताओं और उनके परिवारों की शान-शौकत और विलासितापूर्ण जिंदगी प्रदर्शनकारियों को इतनी चुभ रही है कि वो इनके निजी संपत्तियों को भी निशाना बना रहे हैं।

4- बढ़ती आर्थिक असमानता-

यह कहकर नेपाल के लोगों के बहुसंख्यक हिस्से को बदहाली-गरीबी को ढंका नहीं जा सकता है कि नेपाल एक गरीब देश है, इसमें एक आंशिक सच हो सकता है, लेकिन बड़ा सच यह भी है कि नेपाल में जो धन-संपदा सृजित हो रही है वह भारत की तरह चंद प्रतिशत लोगों या व्यक्तियों के हाथों में संकेंद्रित होती जा रही है।

नेपाल के 10 प्रतिशत धनी लोगों के पास नीचे के 40 प्रतिशत लोगों की तुलना में तीन गुना संपत्ति है। नेताओं और सत्ता से सीधे जुड़े अन्य लोगों और सगे-संबंधियों  की शान-शौकत और संवृद्धि तो भौंडे तरीके से दिख ही रही है। 

‘क्रांतिकारी पार्टियों’ और ‘क्रांतिकारी नेताओं’ और ‘क्रांतिकारी संविधान’ से  मोहभंग-

किसी समाज की, विशेषकर युवाओं की अपने लिए, अपने समाज के लिए और अपने देश के लिए सबसे बड़ी और अंतिम उम्मीद का केंद्र क्रांति, क्रांतिकारी पार्टी और क्रांतिकारी नेता होते हैं। जब सब उम्मीदें टूट जाती हैं, तो लोग क्रांति, उसकी अगुवाई करने वाली पार्टी  और उसके नेताओं की ओर देखते हैं।

नेपाल ने क्रांतिकारी पार्टी और क्रांतिकारी नेताओं के अब तक के इतिहास के सबसे विकसित उन्नत रूपों को देख लिया है। जनता का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ भी खड़ा हुआ।

नेपाल की माओवादी सशस्त्र क्रांति किसी समय प्रचंड-बाबू राम भट्टराई जैसे नेताओं की अगुवाई में नेपाली जनता ही नहीं, दुनिया की जनता के लिए उम्मीद की केंद्र थी। ऐसा लगता था कि क्रांति की जो लपट दुनिया को अपने आगोश में रूस-चीन में ले रही थी, उसके बुझने के बाद नेपाल में माओवादी क्रांति की चिंगारी लपट बनकर फिर से दुनिया में क्रांतियों के एक सिलसिला शुरु करेगी। लेकिन चक्र बिलकुल उलटी दिशा में घूम गया।

विश्वव्यापी क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास की तीनों क्रांतिकारी पार्टियां नेपाल में बनी- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल ( मार्क्सिस्ट-लेननिस्ट) और अंत में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल ( माओवादी)। इन पार्टियों ने बड़े पैमाने के जनसंघर्ष और सशस्त्र संघर्ष भी चलाए। संघर्षों की मिसालें भी कायम कीं। शीर्ष राजनीतिक सत्ता और संविधान में कुछ बदलाव भी हुए, लेकिन जमीन पर लोगों के आर्थिक, सामाजिक, जनवादी जिंदगी में बुनियादी परिवर्तन नहीं हुए। शीर्ष स्तर पर ऊपरी तौर पर राजनीतिक सत्ता में बदलावों से इतर नेपाल और नेपाली लोगों की आर्थिक और सामाजिक जिंदगी में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया। लोकतंत्र और जनवाद भी सिर्फ संविधान और चुनावों तक सीमित रहा। उसको भी खेल बना दिया गया।

प्रचंड-बाबूराम भट्टराई के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल ( माओवादी) के नेतृत्व में नेपाली जनता ने अपने देश और अपने लोगों की नियति को बदलने के लिए एक बड़ा संघर्ष छेड़ा। नतीजा राजतंत्र के खात्मे, राजा के हटने और सापेक्षिक तौर पर क्रांतिकारी संविधान तक आकर रूक गया। 

उसके बाद चुनाव, सरकार और सत्ता का ऐसा खेल शुरु हुआ कि कौन पार्टी किसके साथ है? कौन नेता किसके साथ है, कौन किसके साथ मिलकर सरकार बनाएगा? कौन किसके साथ मिलकर सरकार गिरा देगा? कौन किसके सहयोग से प्रधानमंत्री बनेगा, कौन किसको प्रधानमंत्री पद से हटा देगा? यह कहना ही मुश्किल हो गया? इस खेल में सब शामिल रहे हैं और हैं, क्या माओवादी, क्या मार्क्सवादी-लेनिनवादी और क्या कांग्रेसी। 

चुनाव और संविधान सब का सब नेताओं के हाथ इस्तेमाल होने वाली कठपुतली बन गया। 

यह सच है कि नेपाल का संविधान दुनिया के सबसे बेहतर संविधानों में से एक है, जो क्रांतिकारी संघर्षों की उपज था। पर जैसा कि आंबेडकर ने किसी को उद्धृत करते हुए ठीक कहा था कि कोई संविधान चाहे कितना अच्छा हो, वह अपने आप में कुछ नहीं कर सकता है। वह एक निर्जीव चीज है। संविधान बन जाने के बाद सब कुछ संविधान लागू करने वाले लोगों के नीति और नियति पर निर्भर करता है। उन्होंने यहां तक कहा था कि एक बुरा संविधान लोगों के लिए कल्याणकारी हो सकता है, यदि लागू करने वालों की नीति और नियति ठीक हो। सड़कों पर उतरे युवाओं के आज की तारीख में किसी पार्टी और नेता की नीति और नियति पर कोई भरोसा नहीं है। 

सच तो यह है कि नेपाल में नेपाली जनता को विश्व इतिहास की सभी राजनीतिक धाराओं ने अंतिम तौर पर ठगा। उदारवादी धारा के रूप में नेपाली कांग्रेस ने, वामपंथी धारा के तीनों रूपों- पहली खुद को मार्क्सवादी कहने वाली, उनके अलग होकर खुद को मार्क्सवादी लेनिनवादी कहने वाली और उनसे भी अलग होकर खुद माओवादी कहने वाली।

नेपाल और नेपाल के लोग कांग्रेसी, मार्क्सवादी, मार्क्सवादी-लेनिनवादी और माओवादी कहने वाली पार्टियों और उनके नेताओं को सरकार चलाते, प्रधानमंत्री-मंत्री बनते देख चुके हैं। सबके के सब बारी-बारी से सरकार चला चुके और प्रधानमंत्री-मंत्री बन चुके हैं। कभी इस गठजोड़ में कभी, उस गठजोड़ में। कइयों ने प्रधानमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा इसी दौरान पूरी की।

नेपाल की सड़कों पर उतरे युवाओं को सब के सब राजनेता और पार्टियां एक ही रंग-ढंग, एक ही चाल-चलन, एक नीति-नियति और एक ही तरह की आकांक्षा-महत्वाकांक्षा के शिकार दिख रहे हैं। यही वजह है कि सब के सब नेता, उनकी पार्टियां, उनके पार्टी ऑफिस और उनके लिए गाल बजाने वाली दलाल मीडिया युवाओं के निशाने पर है।  

ऐसे समय में जब कांग्रेसी और विभिन्न नामों-रंगों की वामपंथी पार्टियां उनके निशाने पर हैं, तो उनके पास कोई इतिहास द्वारा प्रदत्त वैचारिक-राजनीतिक ठोस विकल्प नहीं है।

विद्रोह-बगावत की अगुवाई करने वालों की अभी तक दो-तीन ही ठोस मांगे सामने आईं हैं-

सरकार के साथ संसद को भंग किया जाए।

 नए चुनाव कराए जाएं। 

 नई युवा पीढ़ी के हाथों में सत्ता सौंपी जाए।

मेरी समझ में यह विद्रोह और बगावत ही है, भले ही इसका दायरा मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग और शहरों तक सीमित हो। 

भविष्य में यह क्या रूप लेगा और नतीजे क्या होंगे? यह भविष्य गर्भ में है।

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

Leave a Reply