जाति, रोजगार और चुनाव : मुसहर बाल मज़दूरों की त्रासदी

बिहार में ‘लोकतंत्र’ का सबसे बड़ा पर्व-चुनाव-अपने पूरे शोर के साथ शुरू हो चुका है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की घोषणाओं से ऐसा आभास होता है मानो राज्य की सारी तकलीफ़ें पलभर में मिट जाएँगी और बिहार की जनता के जीवन में चार चाँद लग जाएँगे। हर चुनाव की तरह इस बार भी जाति और रोजगार मुख्य मुद्दे बनकर उभर रहे हैं। हर पार्टी अपने वादों का पुलिंदा खोल रही है। लेकिन इस चुनावी कोलाहल के बीच कई ऐसी खबरें हैं जो जानबूझकर ‘शांत’ रखी जाती हैं-क्योंकि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को उनकी चुप्पी में ही लाभ दिखता है। इन्हीं में एक खबर है चार मुसहर बच्चों की मौत की।

मुसहर बच्चों की दर्दनाक मौत

3 अक्टूबर 2025 की सुबह, पूर्णिया ज़िले के कसबा थाना क्षेत्र के यवनपुर रेलवे फाटक के पास वंदे भारत एक्सप्रेस से कटकर तीन बच्चों की मौत हो गई। दो बच्चे गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें से एक ने बाद में अस्पताल में दम तोड़ दिया। सभी बच्चों की उम्र 12 से 16 वर्ष के बीच थी। ये बच्चे पूर्णिया के ठाकुरपट्टी गांव के मुसहर समुदाय से थे। एक ऐसा समुदाय जो गरीबी की आख़िरी हद पर जीवन काट रहा है। 

मृतक सुंदर कुमार (15 वर्ष) के पिता ब्रह्मदेव ऋषि ने दैनिक भास्कर को बताया कि दरभंगा ज़िले के बेनीपट्टी का रहने वाला ठेकेदार अमर और विशु साहनी नामक व्यक्ति महादलित बस्ती में आया था। उसने 10 बच्चों को मुफ्फलिस थाना क्षेत्र के सपनी गांव में मखाना फोड़ाई का काम कराने के लिए ले गया। ठेकेदार उन्हें नशे का आदी बनाकर काम करवाता था ताकि मजदूरी न देनी पड़े। बच्चे किसी तरह भागकर घर लौट आए। कुछ महीनों बाद वह दूसरे मुहल्ले में आया, “अच्छी कमाई” का लालच दिया और तीन बच्चों को साथ ले गया। पैसे की मांग करने पर वह देसी शराब पिलाकर 16–17 घंटे काम करवाता था। जब बच्चे भागकर घर आए तो उसका काम रुक गया।

डेढ़ महीने पहले वही ठेकेदार फिर आया और तीनों परिवारों को 5-5 हज़ार रुपये दिए। गरीबी और बेरोज़गारी के दबाव में ब्रह्मदेव ऋषि ने बेटे श्यामसुंदर, भतीजे सिंटू और जिगर कुमार को भेज दिया। उनके साथ भगिना रोहित और कुलदीप ऋषि भी गए। बच्चे अपने परिवार का बोझ हल्का करने गए थे, लेकिन अब वे परिवार असहनीय बोझ में दब गए हैं।

बाल मज़दूरों की मौत

ब्रह्मदेव ऋषि ने बताया, “एक सप्ताह पहले बेटे और भतीजे ने फोन कर बताया कि उन्हें आधा पेट खाना दिया जाता है, ओवरटाइम कराया जाता है, और विरोध करने पर ठेकेदार मारता है।” उन्होंने बच्चों से कहा कि वे लौट आएँ, लेकिन बच्चों ने कहा-“पैसे मिलते ही दीपावली तक आ जाएँगे।” 2 अक्टूबर की रात 10 बजे बच्चों ने फोन पर बताया कि वे भाग रहे हैं और सुबह तक घर पहुँच जाएँगे। सुबह 6 बजे ठेकेदार ने फोन कर कहा कि बच्चे काम छोड़कर भाग गए हैं। कुछ देर बाद खबर आई कि चारों बच्चे ट्रेन की चपेट में आ गए हैं।

घायल कुलदीप (12 वर्ष) ने बताया कि उन्हें 5000 रुपये महीने का कहकर काम पर ले गया था। दशमी के दिन ठेकेदार ने 50 रुपये देकर मेला भेजा। बच्चों ने वहीं तय किया कि वे अब लौटेंगे नहीं। रास्ते में ठेकेदार विशु साहनी ने इन बच्चों को पकड़ लिया, बुरी तरह पीटा और अधमरा कर पटरी पर छोड़ दिया। वे रोज़ 17–18 घंटे काम करते थे-रात में आग के पास मखाना सुखाने का काम भी करना पड़ता था। मना करने पर ठेकेदार बेरहमी से जूते-चप्पल से पीटता था। सांसद पप्पू यादव ने भी हत्या का आरोप लगाया है।

कसबा थाने के एसएचओ ने 9 अक्टूबर को फोन पर बताया कि “बच्चों को सिखाकर झूठी बातें कहलवाई जा रही हैं। घटना स्थल से कार्यस्थल की दूरी 20 किमी है, ठेकेदार का वहाँ पहुँचना संभव नहीं है।” उन्होंने कहा कि जांच जारी है, ठेकेदार का मोबाइल जब्त किया गया है और उस दिन की लोकेशन ट्रैक की जा रही है। अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। पुलिस का पक्ष सही भी मान लिया जाए, तब भी यह स्पष्ट है कि बच्चे ठेकेदार की प्रताड़ना से तंग आकर भाग रहे थे।

विपक्ष की चुप्पी और जाति समीकरण

जहाँ सत्ता पक्ष इस घटना को दबाने की कोशिश कर रहा है, वहीं विपक्ष की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। यह घटना बिहार की जातिगत संरचना और बेरोजगारी दोनों की भयावह सच्चाई को उजागर करती है, फिर भी यह चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पा रही? 

23 अगस्त 2025 को ‘वोट अधिकार यात्रा’ के दौरान कटिहार में राहुल गांधी ने मखाना किसानों से मुलाकात की थी। उनके साथ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी भी थे। राहुल गांधी ने लिखा था- “आज, इन किसानों से उनके खेतों में मिलकर उनकी आपबीती जानी। बड़े शहरों में 1000–2000 रुपये किलो बिकता है, मगर इन मेहनतकशों-पूरे उद्योग की नींव को-नाम मात्र का दाम मिलता है। कौन हैं ये किसान-मज़दूर? अतिपिछड़े, दलित–बहुजन। पूरी मेहनत 99 प्रतिशत बहुजनों की और फ़ायदा सिर्फ़ 1 प्रतिशत। वोट चोर सरकार को न इनकी कदर है, न फ़िक्र-न आय दिया, और न ही न्याय।”

मुकेश सहनी ने भी कहा था कि महागठबंधन की सरकार आने पर इन्हें उचित दाम मिलेगा। तो फिर उनकी पार्टी इन मुसहर बच्चों की मौत को मुद्दा क्यों नहीं बना रही? क्या यह डर है कि ठेकेदार उनकी ही जाति से है-विशु सहनी?

मुसहर समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति

मुसहर जाति को महादलित वर्ग में रखा गया है। 2023 के बिहार सर्वे के अनुसार, इनकी आबादी 3.08% है जो अनुसूचित जातियों में तीसरी सबसे बड़ी संख्या है। इसके बावजूद मुसहर सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे निचले पायदान पर हैं। उनके प्रमुख नेता जीतन राम मांझी (एनडीए सरकार में मंत्री) भी इस घटना पर मौन हैं।

मुसहर समुदाय के आंकड़े बताते हैं:

· कक्षा 1 से 5 तक पढ़ने वालों की दर: 23.47%

· कक्षा 6 से 8 तक: 7.99%

· मैट्रिक पास: 2.44%

· इंटरमीडिएट पास: 0.77%

· सरकारी नौकरी में प्रतिनिधित्व: 0.75%

लगभग 54.56% मुसहर परिवार हर महीने 6000 रुपये से भी कम कमाते हैं। 24.76 प्रतिशत परिवार 6000 रु. महिना कमा पाता है। यानी, इस समुदाय के 79% से अधिक परिवार 6000 रुपये की मासिक आय पर जी रहे हैं। सिर्फ़ 26% के पास पक्के घर हैं। ज्यादतर लोग भूमिहीन हैं और छोटे छोटे समूहों में बंटे रहते हैं। 

‘सबका विकास’ और मुसहरों की हकीकत

बीस साल से सत्ता में रहने वाले नीतीश कुमार, जो ख़ुद को कर्पूरी ठाकुर की विरासत का वारिस बताते हैं, ने 2007 में ‘महादलित विकास मिशन’ शुरू किया था। पर सवाल यह है-क्या मुसहर समुदाय के जीवन में कोई वास्तविक परिवर्तन आया? ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के बीच मुसहर कहाँ खड़े हैं? आज जब ये परिवार अपने बच्चों की मौत के लिए न्याय माँग रहे हैं, सत्ता और विपक्ष दोनों गायब हैं।

चुनावी पोस्टर, भाषण और वादों के बीच कोई उम्मीदवार मुसहर टोले में वोट माँगने तो जाएगा, पर इन पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की बात नहीं करेगा। क्योंकि यहाँ केवल जाति नहीं, वर्ग भी मायने रखता है। ठेकेदार भले ही पिछड़ा वर्ग से आता हो, लेकिन वह जातीय रूप से संगठित है। इसीलिए पक्ष और विपक्ष दोनों की चुप्पी कायम है-और यही इस लोकतंत्र की सबसे दर्दनाक सच्चाई है। जब लोकतंत्र वोट तक सीमित रह जाए, तो नागरिकों की ज़िंदगी उसकी प्राथमिकता से गायब हो जाती है।

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