यह 18 अक्तूबर 2025 की बात है। कुछ देर के लिए मैं फेसबुक पर था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक उम्मीदवार का बहुत दिलचस्प पोस्टर दिखा। यह प्रचारात्मक पोस्टर बिहार विधानसभा के चुनाव में बखरी निर्वाचन क्षेत्र के कम्युनिस्ट प्रत्याशी सूर्यकांत पासवान का था। वह इस सीट से पिछले चुनाव में भी महागठबंधन समर्थित भाकपा प्रत्याशी के तौर पर जीते थे। यानी विधायक हैं। उन्होंने 2020 के चुनाव में यहां भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी रमाशंकर पासवान को हराया था। बखरी बिहार के बेगूसराय जिले की एक आरक्षित सीट है। यहां सिर्फ अनुसूचित जाति का प्रत्याशी ही चुनाव लड़ सकता है।
बेगूसराय को एक समय बिहार की राजनीति में कम्युनिस्टों का ‘लाल दुर्ग’ माना जाता था पर अब ऐसा कुछ नहीं है। वहां सभी पार्टियां सक्रिय हैं और सीटें भी जीतती हैं। बेगूसराय के मौजूदा सांसद भाजपा से आते हैं। लेकिन यहां बखरी क्षेत्र के भाकपा प्रत्याशी श्री पासवान के प्रचार अभियान के उस खास पोस्टर पर बात करनी है, जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है। उस दिलचस्प पोस्टर में कामरेड पासवान टाटा कंपनी की बनी एक गाड़ी की छत पर खड़े हैं। उनके दोनों हाथों में बाबा साहेब डाक्टर बी आर अम्बेडकर की बड़ी सी तस्वीर है। गाड़ी के पीछे उनके कुछ समर्थक लाल झंडों के साथ चलते दिख रहे हैं।
इस तस्वीर को देखते ही मुझे अचानक जनवरी, 1952 में हुए स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में बम्बई के नार्थ सेंट्रल क्षेत्र के बारे में पढ़ी बातें याद आने लगीं। वह क्षेत्र और उसका चुनाव आधुनिक भारतीय इतिहास का एक खास प्रसंग बन गया था इसलिए उस बारे में कई महत्वपूर्ण लोगों ने बहुत विस्तार से लिखा है। दरअसल, इस चुनाव क्षेत्र में देश के संविधान की प्रारूप-लेखन समिति के अध्यक्ष और देश के पहले कानून मंत्री रहे डॉ. अम्बेडकर अपनी रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार थे। कुछ ही महीने पहले उन्होंने कानून मंत्री के तौर पर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट से इस्तीफा दिया था। बहुत सारे लोग लिखते और समझते हैं कि उन्होंने सिर्फ हिन्दू कोड बिल पर सरकार के रवैये से क्षुब्ध होकर इस्तीफा दिया था।
पर यह अर्द्धसत्य है। उनका इस्तीफा हिन्दू कोड बिल के अलावा दो-तीन अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी केंद्रित था। ये मुद्दे थे-भारत की विदेश-नीति, खासकर भारत-पाकिस्तान रिश्तों का मामला, इसमें कश्मीर समस्या का भी पहलू शामिल था। इसके अलावा समाज के अन्य पिछड़े समुदायों के लिए एक आयोग बनाने के संवैधानिक प्रावधान को सरकार द्वारा लगातार नजरंदाज करना भी था। बाबा साहेब सरकार में अपनी उपेक्षा से भी दुखी थे। वह सरकार में रहकर देश की प्रगति के लिए कुछ ठोस काम करना चाहते थे।
लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें मात्र कानून मंत्रालय तक सीमित कर रखा था, जबकि कैबिनेट के ज्यादातर कांग्रेसी मंत्रियों के पास कई-कई भारी-भरकम मंत्रालय थे। अंततः बाबा साहेब ने 1951 के 27 सितम्बर को नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। प्रधानमंत्री नेहरू ने इस्तीफे में उठाये मुद्दों पर उनसे विचार-विमर्श भी नहीं किया। ऐसा लगा मानो सरकार चलाने वाले लोग उनके इस्तीफे का इंतजार ही कर रहे थे!
सन् 1952 के पहले आम चुनाव में बाबा साहेब ने बम्बई के नार्थ सेंट्रल सीट से अपनी उम्मीदवारी का पर्चा भरा। संविधान की प्रारूप-लेखन समिति के अध्यक्ष और पूर्व कानून मंत्री अम्बेडकर के विरूद्ध कांग्रेस ने एक ऐसे उम्मीदवार को खड़ा किया जो एक समय बाबा साहेब को ‘अपना भगवान’ कहता था। इस चुनाव में कांग्रेस के नेता एस के पाटिल और कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता एस ए डांगे ने मिलकर बाबा साहेब को हराने की योजना बनाई।
चूंकि यह एक आरक्षित सीट थी, इसलिए यहां बाबा साहेब के खिलाफ कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकता था। खोजबीन के बाद कांग्रेस ने यहां से चमार समुदाय के एक दलित नेता को महार समुदाय से आने वाले डॉ. अम्बेडकर के खिलाफ अपना उम्मीदवार बनाया। इनका नाम था-नारायण राव काजरोल्कर। उम्मीदवार खोजने से लेकर बाबा साहेब की हार सुनिश्चित करने में सर्वाधिक सक्रिय भूमिका कांग्रेस के एस के पाटिल और कम्युनिस्ट पार्टी के एसए डांगे की रही। दिल्ली से नेहरू जी की इस सीट पर खास नजर जरूर थी।
शुरू में बिल्कुल नहीं लग रहा था कि ऐसा होगा पर नतीजा आया तो संविधान का प्रारूप बनाने वाले अम्बेडकर चुनाव हार चुके थे। उन्हें अपना ‘रहनुमा और भगवान’ बताने वाले नारायण राव काजरोल्कर 14374 वोटों के अंतर से चुनाव जीत गये। बाबा साहेब को 123576 वोट मिले और काजरोल्कर को 137950 वोट। बाबा साहेब की इस चुनावी पराजय पर उनकी धर्मपत्नी डा सविता अम्बेडकर ने बहुत भावुक होकर लिखा हैः’ इससे साबित हुआ कि कांग्रेस में उद्भट विद्वान, योग्य और या क्षमतावान व्यक्ति के लिए जगह नहीं बची है। हम सब आश्वस्त थे कि साहेब चुनाव आसानी से जीत जायेंगे और फिर केंद्र की नई कैबिनेट में उन्हें जगह भी मिलेगी। साहेब को भी ऐसा ही विश्वास था। उनको और हम सबको लगता था कि नेहरू अपनी अगली कैबिनेट में बाबा साहेब को रखकर देश के चमकीले भविष्य के लिए उनकी बौद्धिक क्षमता और अनुभव का उपयोग करना चाहेंगे। पर कांग्रेस की चालबाजी ने संविधान के निर्माता को ही हरा दिया। डांगे जैसे एक ‘सारस्वत ब्राह्मण कम्युनिस्ट’ की भी इसमें भूमिका रही।'(Baba Saheb: My Life with Dr Ambedkar by Savita Ambedkar, Penguin, 2024, page-173)
कुछ अन्य स्रोत बताते हैं कि पाटिल और डांगे के अलावा वीडी सावरकर भी डॉ. अम्बेडकर को हराने में अपने तईं सक्रिय थे। कांग्रेस और सावरकर के प्रयासों का मतलब तो समझा जा सकता है पर एसए डांगे जैसे कम्युनिस्ट ने अम्बेडकर को हराने में इतनी ताकत क्यों लगाई? इसके पीछे ट्रेड यूनियनों की अंदरूनी राजनीति थी या डांगे के अंदर छुपा उनका सारस्वत ब्राह्मणवाद था, जो डॉ. अम्बेडकर जैसे बड़े विद्वान के वजूद से परेशान था? कुछ साल पहले मैंने बिहार के कटिहार में अम्बेडकर साहित्य के गंभीर अघ्येता और पुणे विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हरी नरके से हुई एक मुलाकात में इस बाबत पूछा तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा: ‘महाराष्ट्र हो या पूरा देश एसए डांगे की पूरी कम्युनिस्ट-राजनीति के केंद्र में ‘ब्राह्मणों की सर्वोच्चता’ का पहलू हमेशा अहम रहा।’ पर इतिहास कितना निर्मम है।
चुनाव हो या कोई अन्य आंदोलनात्मक कार्यक्रम, कम्युनिस्टों को भी आज कल हर जगह डॉ. अम्बेडकर के नाम का सहारा लेना पड़ता है। कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं को जरूर सोचना चाहिए कि देश के किसी भी कोने का कम्युनिस्ट आज एसए डांगे के नाम पर वोट नहीं मांग सकता। डांगे की जन्मभूमि और कर्मभूमि- महाराष्ट्र में भी उनका नाम लेकर कोई वोट नहीं मांगता, जबकि बीते कुछ दशकों से बाबा साहेब का नाम हर जगह लिया जा रहा है। बिहार के बेगूसराय जिले के बखरी निर्वाचन क्षेत्र में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार सूर्यकांत पासवान के चुनावी सोशल मीडिया पेज पर बाबा साहेब की तस्वीर के साथ उनके चुनाव अभियान का महत्वपूर्ण पोस्टर इस बात का ठोस प्रमाण है।
(उर्मिलेश लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)