न्यायपालिका में निष्पक्षता खतरे में, वकीलों के बहिष्कार से न्याय में देरी : जस्टिस ओका

न्यायिक प्रणाली में निष्पक्षता के घटते मानकों पर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभय एस. ओका ने कहा कि कानूनी पेशे का सर्वोच्च गुण, निष्पक्षता, तेजी से लुप्त हो रही है।

तेलंगाना उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ (टीएचसीएए) द्वारा पिछले शुक्रवार को आयोजित “न्यायपालिका के समक्ष वर्तमान में मौजूद समस्याएं और उनके समाधान” विषय पर व्याख्यान देते हुए न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि भारत की न्याय वितरण प्रणाली कई संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रही है, जिनमें खराब केस प्रबंधन और अभियोजकों की कमी शामिल है।

न्यायमूर्ति ओका ने अधिवक्ताओं को याद दिलाया कि न्याय व्यवस्था की नींव निष्पक्षता के गुण पर टिकी है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “चाहे पेशेवर कारणों से हो या अन्य कारणों से, निष्पक्षता और उपचार की खोज न्याय के आधार स्तंभ बने रहेंगे।”

उन्होंने बताया कि भारत में अभी भी एक प्रभावी केस प्रबंधन प्रणाली का अभाव है, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी अभियोजकों की कमी इस देरी को और बढ़ा देती है।

वैवाहिक मामलों में तीव्र वृद्धि का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति ओका ने चेतावनी दी कि अनसुलझे पारिवारिक विवाद न्यायपालिका के लिए एक बड़ा तनाव बिंदु बन सकते हैं। उन्होंने कहा, “अगर हर वैवाहिक विवाद का जल्दी निपटारा नहीं किया गया, तो यह विभिन्न अदालतों में 25 से 30 मामलों तक बढ़ सकता है।”

उन्होंने यह भी कहा कि व्हाट्सएप जैसे आधुनिक संचार प्लेटफॉर्म सबूतों के साधन और गलतफहमी के स्रोत, दोनों के रूप में उभर रहे हैं।

जिला एवं ट्रायल अदालतों में खराब बुनियादी ढांचे की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि कई अदालत परिसरों में अभी भी पेयजल और शौचालय जैसी आवश्यक सुविधाओं का अभाव है।

उन्होंने जोर देकर कहा, “यह राज्य सरकारों का संवैधानिक कर्तव्य है कि वे वादियों के लिए उचित बुनियादी ढांचा और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करें।” उन्होंने देश भर में निचली अदालतों के बुनियादी ढांचे में तत्काल सुधार का आह्वान किया।

वकीलों द्वारा अदालती कार्यवाही का बहिष्कार करने के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई वादियों के प्रति घोर अन्याय है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर का हवाला देते हुए उन्होंने कानूनी बिरादरी से आग्रह किया कि वे विरोध के गैरकानूनी तरीकों को छोड़ दें और अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के लिए रचनात्मक, संवैधानिक तरीके अपनाएं।

उन्होंने सवाल किया, “ट्रायल कोर्ट में एक दिन में लगभग 5,000 मामले सूचीबद्ध हो सकते हैं। जब वकील बहिष्कार करते हैं, तो वे मामले स्थगित हो जाते हैं और इसका खामियाजा वादी पक्ष को भुगतना पड़ता है। उनका क्या कसूर है?”

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वकील मुक़दमों की सेवा के लिए होते हैं, न कि न्याय को बाधित करने वाली सामूहिक कार्रवाइयों के लिए। उन्होंने कहा, “न्याय व्यवस्था को विरोध प्रदर्शनों या बहिष्कारों का बंधक नहीं बनाया जा सकता,” और वकीलों से आग्रह किया कि वे अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखें।

इस कार्यक्रम में उच्च न्यायालय के कई वर्तमान न्यायाधीश और बड़ी संख्या में वरिष्ठ एवं कनिष्ठ अधिवक्ता उपस्थित थे। टीएचसीएए के अध्यक्ष अनुमुला जगन, उपाध्यक्ष राजेश्वर रेड्डी, और सचिव खाजा विजारथ अली एवं इंद्रसेन रेड्डी भी उपस्थित थे। ।  

Leave a Reply