बिहार चुनाव 2025: रोजगार और पलायन से ज्यादा अहम हैं महिलाओं को दिया 10 हजार

पटना। बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है। जिससे साफ है महिलाओं का वोट ही जीत हार को तय करता है। पिछले कुछ चुनावों से हर राज्य में चुनाव से पहले महिलाओं के लिए तरह-तरह की आर्थिक सहायता वाली योजनाओं को लॉन्च किया जाता है। जिसका नतीजा पिछले विधानसभा चुनाव में देखने को भी मिला हैं। पिछले साल हुए झारखंड विधानसभा चुनाव  से पहले माईयां सम्मान योजना के तहत प्रतिमाह 2500 देने का ऐलान किया गया था। जिसने झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई है।

बिहार चुनाव से ठीक पहले ही मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत परिवार की किसी एक महिला को 10 हजार रुपए देने का ऐलाना किया था।  जिससे महिलाएं अपना कोई काम कर शुरु कर सकें।  अब यह योजना बिहार चुनाव में की महिला वोटर्स के लिए निर्णायक भूमिका निभा रही है।

जनचौक की टीम ने बिहार विभिन्न हिस्सों की महिलाओं से इस योजना के बारे बातचीत की है। जिसमें कुछ महिलाओं को पैसे मिले और कुछ को नहीं। इसका चुनाव पर कितना असर होगा यह भी जरुरी मुद्दा है।

रोजगार को लेकर नाराज

ऊषा देवी मोकामा के हाथीदह की रहने वाली हैं, जो किसी वक्त फैक्ट्रियां का हब हुआ करता था। सड़क के किनारे ही पासवान टोले में उसका घर है। कच्चे मकान में कुछ बकरियां है। जो ऊषा की जीविका का साधन है।

दस हजार रुपए के बारे में पूछने पर कहती हैं “मुझे दस हजार मिले थे मैंने अपने पति को देकर खेत में धान की बुआई करवा दी है। बकरी लेने के बारे में सोची थी, लेकिन अभी कुछ दिन पहली ही मेरी बकरियां चोरी हो गई। यह घटना बहुत आम हो गई है। इसलिए खेत में लगाना मुझे सही लगा”।

वोट किसे देंगी इस बारे में पूछने पर वह कहती हैं कि जब समय आएगा तब देखा जाएगा कि वोट किसे करना है। लेकिन ऊषा की सरकार से नाराजगी है कि मोकामा एक किसी जमाने में एक औद्योगिक शहर था। लेकिन पिछले दस सालों में सभी तीन से चार सरकारी कारखाने पूरी तरह बंद हो गए हैं। जिसके कारण लोगों को बाहर कमाने के लिए जाना पड़ता है या गुजारे के लिए यहीं कोई छोटा-मोटा काम करना पड़ता है।

ऊषा के अनुसार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार काम अच्छा कर रहे हैं। लेकिन शराबबंदी के बाद भी उसका कोई खास असर नहीं हैं। लोग खुलेआम शराब पी रहे है।

ऊषा  के बगल में खड़ी उसकी पड़ोसी का भी यही कहना है “वह कहती हैं कि मैंने दस हजार रुपए से बकरियां खरीद ली हैं। जैसे ही इससे बच्चे होंगे मेरा बिजनेस शुरु हो जाएगा”।

इससे पहले भी मेरे पास बकरियां थी। हमने उनसे पूछा महागठबंधन की तरफ से हर महीने 2500 रुपए देने की बात कही गई है। वह कहती हैं फिलहाल जो 10 हजार मिला है। मैं उससे खुश हूं आगे के बारे में ज्यादा नहीं सोचना है। जिसने हमारी मदद की है उसका साथ देगें।

महिलाएं पार्टियों के लिए जरुरी मुद्दा

चुनाव में एनडीए ने अपने संकल्प पत्र में महिलाओं के लिए आर्थिक रुप से मजबूत करने के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत दो लाख की वित्तीय सहायता की घोषणा की है। इसके साथ ही एनडीए का लक्ष्य एक करोड़ महिलाओं को लखपति दीदी बनाना है और सफल महिला उद्यमियों को आगे मदद देने के लिए मिशन करोड़पति भी शुरु किए जाने की बात है।

वह दूसरी ओर पहले चरण के चुनाव से पहले तेजस्वी यादव ने सत्ता में आने पर जीविका दीदियों को 30,000 रुपये मासिक वेतन और स्थायी नियुक्ति देने का वादा किया गया है।

महिलाओं के लिए विभिन्न पार्टियों द्वारा की घोषणा पर वरिष्ठ पत्रकार नचिकेत्ता नारायण का कहना है  ‘नीतीश सरकार ने जिस तरह से महिलाओं को 10-10 हजार रुपए बांटे हैं यह अप्रत्यक्ष रुप से महिलाओं का वोट खरीदा जा रहा है।‘

पैसे नहीं मिलने से नाखुश महिलाएं

इनमें ऐसी भी महिलाएं हैं जिन्हें यह रकम नहीं मिली है। नीलम देवी बेगूसराय की रहने वाली हैं। उन्हें यह सरकारी मदद नहीं मिली है।

हमने उनसे पैसे मिलने के बारे में पूछा तो वह कहती है, मुझे और मेरे घर में किसी भी महिला को 10 हजार रुपया नहीं मिला है। मिलता तो अच्छा होता। पति ड्राइवर हैं कुछ मदद हो जाती। वोट करने के बारे में पूछने पर वह कहती हैं परिवार में जिस पर सहमति बनेगी उसे वोट देंगे।

हमें फील्ड में रिपोर्टिंग के दौरान कई महिलाएं मिलीं जिन्हें पैसा नहीं मिला है। मीना देवी किशनगंज बस स्टैंड के एक होटल में रोटी बनाती हैं। पति और बेटा दोनों ही पंजाब में काम करते हैं। वह अकेली यहां रहती हैं।

मैंने उनसे जब 10 हजार के बारे में पूछा तो वह कहती हैं ‘हमलोगों को सरकार के द्वारा कोई मदद नहीं मिलती हैं। छोटी जाति के लोगों को कौन पैसा देता हैं, न ही हमारे तक कोई सरकारी मदद सही से पहुंच पाती हैं’।  

अररिया की बेलवा पंचायत की मुस्लिम महिलाओं के बीच नीतीश कुमार के लिए नाराजगी देखने को मिली। फुड़की इसी पंचायत के बाढ़ प्रभावित इलाके में रहती हैं। वह बताती हैं ‘मैं जीविका दीदी के साथ काम करती हूं जब वोट आता है तब जीविका दीदियों को वोट देने के लिए सरकार कहती है, लेकिन जब पैसा देने की बारी आई तो मुझे कुछ नहीं मिला है। जब मैं पिछले लंबे समय से इससे जुड़ी हुई है। जिसके कारण मैंने बकरी और मुर्गा पालने का काम शुरु किया था’।

वह बड़े गुस्से में कहती हैं ‘न हमें इंदिरा आवास मिला है और न ही बाकी सुविधा हमें मिल रही हैं हमलोग सिर्फ वोट कर रहे हैं और कुछ नहीं’।

रिपोर्टिंग के दौरान हमने बेगूसराय की कुछ मुस्लिम महिलाओं से इन पैसों के बारे में पूछा उनका जवाब था ‘हमें सरकार का कोई पैसा नहीं चाहिए’। ये बोलते वक्त उनके चेहरे पर गुस्सा था।

कुछ दिनों पहले बेगूसराय के सांसद गिरिराज सिंह ने कहा था ‘मुसलमान केंद्रीय योजनाओं का लाभ उठाते हैं और उन्हें वोट करते हैं, नमक हराम हैं।

मुसलमानों का एक हिस्सा नीतीश कुमार का भी समर्थक है। लकिन एनडीए के लोगों का ऐसा बयान कहीं न कहीं मुस्लिम महिलाओं के वोट का नुकसान कर सकता है।

आपको बता दें कि 2000 से 2020 तक महिला मतदाताओं की संख्या तो बिहार में लगातार बढ़ी ही है, उनका वोटिंग प्रतिशत भी बढ़ता गया है। साल 2000 के चुनाव में 70.71 फीसदी पुरुष मतदाताओं की तुलना में महिला मतदान 53.28 फीसदी था।

पांच साल बाद हुए चुनाव में पुरुष वोटिंग 49.95 फीसदी थी, तो महिला वोटिंग 42.52 फीसदी थी. लेकिन 2010 के चुनाव में महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में अधिक वोटिंग की थी- तब महिलाओं ने 54.49 फीसदी वोटिंग की थी, जबकि पुरुषों की वोटिंग 51.12 फीसदी थी. वर्ष 2015 और 2020 में भी वोटिंग प्रतिशत के मामले में महिलाएं पुरुषों से आगे रहीं। इसी को देखते हुए नीतीश सरकार महिलाओं के लिए कई योजनाएं चला रही हैं, तो तेजस्वी यादव भी लगातार महिला वोटरों को लुभाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

फिलहाल इस योजना के तहत नीतिश कुमार 21 लाख महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपये का भुगतान किया गया है। आचार संहिता के कारण जिन महिलाओं को पैसे नहीं मिले हैं। उन्हें दिसंबर के मिल जाएंगे। इसका फॉर्म भरने की कोशिश आखिरी तारीख नहीं है। 

(पटना से पूनम मसीह की रिपोर्ट।)

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