“भूगोल राजनीति को प्रभावित करता है,” राजनीतिक भूगोल के जनक फ्रेडरिक रैटज़ेल का ये कथन अगर कहीं सच साबित होता दिख रहा है, तो वो है बिहार।
ये कहें कि यहां की मिट्टी में आंदोलन का डीएनए है – जयप्रकाश नारायण से लेकर आज के जेन-ज़ी तक, हर दौर में किसी न किसी ने व्यवस्था को हिलाया है। आज बिहार का माहौल उसी बेचैनी से भरा है। एक नई पीढ़ी की आकांक्षाओं का प्रतीक, जो बदलाव के लिए उतावली है, जो सिर्फ सत्ता के नहीं, व्यवस्था के परिवर्तन की बात कर रही है।
यह वही ऊर्जा है, जो इतिहास में जयप्रकाश आंदोलन के रूप में देखी गई थी और आज जेन-ज़ी के रूप में लौट आई है। 2014 में जब ‘युवा शक्ति’ का नारा गूंज रहा था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही वर्षों में वही युवा जेन-ज़ी के रूप में राजनीति की धारा को मोड़ने की ताकत रखेंगे। अब सवाल ये है कि क्या ये नई पीढ़ी बिहार में फिर से वही कमाल दिखाने वाली है? क्या यह जेन-ज़ी नीतीश कुमार के साथ खड़ा होगा या फिर पारंपरिक वोट बैंक और समीकरणों को पलट देगा? क्या यह पीढ़ी राजनीति के पुराने ढर्रे को चुनौती देगी? देखें तो हमारे सामने सवालों का अंबार खड़ा है, लेकिन जवाब आने वाले कुछ दिनों में खुद इतिहास लिखेगा।
खैर, हम मुद्दे पर वापस आते हैं। बिहार में महागठबंधन की तरफ से तेजस्वी यादव एक युवा सीएम के चेहरे के तौर पर उभरे हैं, जो अपनी उम्र से ज़्यादा अपने तेवर से युवा दिखाई देते हैं। दूसरी ओर, भाजपा की ओर से सम्राट चौधरी को “युवा चेहरा” बताकर प्रोजेक्ट किया जा रहा है, उम्र के लिहाज से देखें तो यह थोड़ा हास्यापद भी लगता है। इसी से आप संकेत समझ सकते हैं बिहार में जेन-ज़ी की क्या ताकत है, जहां दोनों प्रमुख दल अपने-अपने लीडर को युवा चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे हैं।
इसकी सबसे बड़ी वजह है बिहार में युवा आबादी का मतदाता अनुपात, जो देश के बाकि राज्यों के मुताबिक सबसे अधिक है। इस बार के विधानसभा चुनाव में हर चौथा वोटर जेन-ज़ी है। करीब 25% यानी 1.63 करोड़ मतदाता (20 से 29 आयु वर्ग) युवा हैं, जिनमें हजारों पहली बार वोट डालने वाले हैं।
इस लिहाज से जेन-ज़ी एनडीए और महागठबंधन दोनों के लिए टारगेट ग्रुप हैं। इस तस्वीर को हम पिछले विधानसभा चुनाव 2020 से भी समझ सकते हैं।
सीएसडीएस के पोस्ट पोल सर्वे 2020 के मुताबिक, 18 से 35 साल के 46% युवाओं ने बेरोजगारी को देश का सबसे बड़ा मुद्दा माना था। यानी लगभग हर दूसरा युवा उस समय वोट देते वक्त अपनी नौकरी और भविष्य की चिंता लेकर बूथ पर पहुंचा था।
खास बात ये है कि 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं के बीच एनडीए और महागठबंधन को लेकर वोटर प्रतिशत लगभग बराबर था। 18 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में 36% युवाओं ने एनडीए का समर्थन किया था, जबकि 37% ने महागठबंधन को वोट दिया। यानी मुकाबला कांटे का था, लेकिन जब इन आंकड़ों को लिंग के आधार पर देखा गया तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई।
युवा पुरुष मतदाताओं में राजद को बढ़त मिली। 39% युवा पुरुष मतदाताओं ने महागठबंधन को समर्थन दिया, जबकि 33% ने एनडीए को वोट किया।
वहीं, इसी आयु वर्ग की महिला मतदाताओं में रुझान उलट गया। 36% महिलाओं ने महागठबंधन को वोट दिया, जबकि 40% ने एनडीए को अपना समर्थन दिया।
युवा पुरुष मतदाताओं के वोट प्रतिशत में 6 प्रतिशत का गठबंधन को लाभ है, वहीं युवा महिला मतदाताओं में 4 प्रतिशत का एनडीए को लाभ है। अगर किसी से पूछा जाए कि बताओ 6 बड़ा या 4 ? वो बिना सोचे 4 बोल देगा, जोकि सही है। लेकिन मैं यहां 4 को 6 से बड़ा मानता हूं। इसकी वजह है वोटर टर्न आउट।
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुल वोटर टर्नआउट लगभग 57% रहा, जिसमें महिलाओं का मतदान 59.7% और पुरुषों का 54.6% था। ये जो 5 प्रतिशत का अंतर है, यही 4 को 6 से बड़ा बना देता है।
बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां महिलाओं का वोटर टर्न आउट, पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा रहता है, इसकी सामान्य सी वजह है। पुरुष, महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा पलायन करता है और जब चुनाव होते हैं तो वोट करने घर मुश्किल से ही आ पाता है। साल 2010 के बाद देखा भी गया है कि महिला मतदाताओं का वोटर टर्न आउट पुरुष मतदाताओं की अपेक्षा लगातार बढ़ता रहा है।
और यही वोटर टर्नआउट नीतीश कुमार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक वरदान साबित हुआ है क्योंकि महिलाओं की बढ़ी हुई भागीदारी ने उनके सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल को जमीन दी और सत्ता में उनकी पकड़ को मजबूत बनाए रखा। इस बार भी महिलाओं का वोटर टर्न आउट ही तय करेगा कि सत्ता का ताज किसके सिर सजने जा रहा है।
लेकिन अगर पिछली बार की तरह इस बार भी यही रुझान 2025 में भी जारी रहा तो नए मतदाताओं में से ज्यादा वोट डालने वाली 18 से 25 वर्ष की युवा महिलाएं होंगी, जो नतीजों का रुख बदलने की ताकत रखती हैं।
वहीं दूसरी तरफ युवाओं में मतदान की प्राथमिकताएं चाहे अलग हों, लेकिन लगभग सभी आयु वर्गों में इस बात पर एक आम सहमति है कि नीतीश सरकार युवाओं के हितों की रक्षा करने में नाकाम रही है।
यही खास वजह है, जिससे दोनों प्रमुख गठबंधन इस वर्ग को अपने पक्ष में करने की कोशिश में हैं, इन पहलों से स्पष्ट है कि बिहार की बदलती राजनीति में युवा मतदाता एक बदलाव का नया चेहरा गढ़ने जा रहे हैं।
इसी बीच नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का मछुआरा समुदाय के साथ एक तालाब में उतरकर मछली पकड़ना उस जुड़ाव का प्रतीक है, जो आज के युवा राजनीति से देखना चाहते हैं। दिलचस्प यह भी है कि तेजस्वी यादव भी अब पारंपरिक कुर्ता-पायजामा राजनीति से निकलकर टी-शर्ट मूवमेंट की तरफ बढ़ चुके हैं, जो इस नई पीढ़ी के तेवर और उनके लाइफ़स्टाइल दोनों से मेल खाता है। खैर, 10 दिन बाद जब चुनाव समाप्त हो जाएगा, तब साफ हो जाएगा कि यह जेन-ज़ी लहर” किस दिशा में बहने वाली है।
~ प्रत्यक्ष मिश्रा पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं। वह गवर्नेंस और पॉलिसी पर नजर रखते हैं।