अमेरीकी दबाव में स्पेशल इकाॅनाॅमिक जोन अब घरेलू बाजार की खोज में हैं

विश्व व्यापार संगठन के उदय के साथ भारत जैसे देश में स्पेशल इकाॅनाॅमिक जोन को एक नयी आर्थिक अवधारणा की तरह पेश किया गया था। हालांकि, इससे मिलती जुलती आर्थिक अवधारणा और उत्पादन की व्यवस्था पहले से चली आ रही थी। लेकिन, वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों में इन्हें अलग से रेखांकित किया गया।

इन्हें आर्थिक समृद्धि के वाहक की तरह विभिन्न सरकारों ने पेश किया और समय-समय पर इन्हें पर्याप्त अधिकार भी प्रदान किये गये। इनकी स्थापना के समय यह साफ किया गया था कि ये मूलतः निर्यात आधारित इकाईयां हैं और इनका उत्पादन घरेलू बाजार के लिए नहीं होगा। इन्हें विदेशी पूंजी हासिल करने वाली आधारभूत इकाई की तरह पेश किया गया।

हालांकि, स्पेशल इकाॅनाॅमिक जोन को मजदूरों और राष्ट्रीय संप्रभुता पर एक हमले की तरह देखा गया। लेकिन, हाल की खबरों से लग रहा है कि ये आर्थिक इकाईयां जिन कामों में लगाई गई थीं, उसे पूरा कर पाने अक्षम साबित हो रही हैं और तबाह होने के इंतजार में हैं।

खबर आ रही है कि स्पेशल इकाॅनाॅमिक जोन अमेरीका द्वारा टैरिफ बढ़ा दिये जाने से काफी दबाव में हैं। उनका निर्यात तेजी से घटा है जिससे इस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। ऐसे में नीति आयोग और उद्योग मंत्रालय इस जोन को बचाने के लिए उन्हें घरेलू बाजार में उतारने की नीति पर काम कर रहा है।

एसईजेड को विभिन्न तरह के कर लाभ हासिल हैं जिसमें करमुक्त आयात और करमुक्त भंडारण की सुविधा दी गई है। इसके साथ ही उन्हें घरेलू बाजार में मौसमी मांग के आधार पर उत्पादन करने और उन्हें आपूर्ति करने की भी छूट दी गई है।

हालांकि एसईजेड की समिति की मांग घरेलू बाजार में नियमित उत्पादन की भी थी जिससे वे खुद को बचाये रख सकें। एसईजेड समिति की मांग वित्तीय प्रबंधन और इस दिशा में सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाओं में सुधार करने को लेकर भी है जिसका मूल अर्थ सरकार की ओर से अधिक वित्तीय सुविधाओं को हासिल करना है।

ऐसा लगता है कि अमेरीकी टैरिफ के दबाव का मामला नया है और संभव है कि इसका असर इस क्षेत्र पर पड़ा हो। लेकिन, सच्चाई यही है भारत में एसईजेड का संकट लंबे समय से चला आ रहा है।

इंडियन एक्सपे्रेस में 5 नवम्बर को रवि दत्त मिश्रा की रिपोर्ट में उल्लेख आया है कि 2019 में हीरे और माणिक्य से जुड़े एसईजेड की संख्या 500 थी जो 2021-22 में घटकर 360 हो गई। इस अवधि में इस क्षेत्र की निर्यात में 15.7 प्रतिशत की गिरावट आई। यही वह समय था जब मेहुल चैकसी जैसी परिघटनाएं सामने आईं।

इन परिघटनाओं के पीछे बाजार की तबाही छिपी रही और आर्थिक संकट के तत्व बहस से बाहर रहे। जिस एसईजेड के बारे में यह दावा किया गया था कि विश्व बाजार की प्रतियोगिता से भारत में नई तकनीकी विकास होगा उसी एसईजेड में इस दिशा में किये गये प्रयास नगण्य दिखाई दे रहे हैं।

खासकर हीरे और माणिक्य की ये इकाईयां शोध और विकास में मुख्यतः बनी-बनाई तकनीकों पर काम करती आ रही हैं। इसका अर्थ यह भी है कि ये मूलतः परम्परागत श्रमिकों की क्षमता पर निर्भर हैं और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए भी कोई निवेश नहीं कर रही हैं।

ऐसी स्थिति को कपड़ा बाजार में काम कर रही एसईजेड इकाईयों में भी देखा जा सकता है। भारत इस क्षेत्र में बांग्लादेश और वियतनाम से भी पिछड़ता जा रहा है जबकि चीन से वह वैश्वीकरण के पहले दौर में ही पिछड़ गया था।

दरअसल, भारत के एसईजेड विदेशी निवेश के मामलों में काफी पीछे बने रहे हैं। भाजपा की मोदी सरकार, जब मजदूरों को पांच किलो अनाज पर निर्भर करने तक लेकर चली आई, उस दौर में भी भारत में इस क्षेत्र में विदेशी निवेश बांग्लादेश और वियतनाम से पिछड़ता गया है।

भारत के मजदूर पर कहर ढ़ाने और उनकी वास्तविक आय को न्यूनतम आय से भी नीचे तक ले जाने के बावजूद विदेशी निवेश में कमी से साफ है कि मसला सस्ते श्रम की उपलब्धि का नहीं है। यह मसला भारत के पूंजीपति वर्ग का है और भारत के आर्थिक विकास की समस्या की जड़ में वही है।

भारत का पूंजीपति वर्ग जब खुद अपनी अक्षमता से रूबरू हो रहा था तब भी उसने मजदूरों पर ही दोष डालने में गुरेज नहीं किया। वह उनसे और मेहनती होने, 70 घंटे काम करने और देशभक्त होने की मांग करने लगा। लेकिन, वह उनकी मजदूरी बढ़ाने के लिए तैयार नहीं हुआ। वह अपनी अक्षमता को स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ।

ठीक वैसे ही जैसे भारत में दस साल से राज कर रही भाजपा की सरकार और उसके प्रधानमंत्री मोदी अपनी असफलता को स्वीकार करने से भागते रहे हैं और सारा दोष इतिहास के मत्थे मढ़ने और जनता पर ही डाल देने की नीति अपनाते रहे हैं। यही भारत के राजनीतिक अर्थशास्त्र की मूल गति है जो चली आ रही है।

भारत का पूंजीपति वर्ग भारत में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को विकसित करने में हमेशा से अक्षम रहा है, यह मूलतः सटोरिया और सूदखोर प्रवृत्ति का रहा है, जिसकी रूचि संपदा बटोरने, उसे भोगने और मजदूर-किसानों के उत्पाद के अधिशेष का हड़प लेने की रही है। आज भी वह इसी पर कायम है। 

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