जातक कथाएं बुद्ध के जीवन से जुड़ी कथाएं हैं। ये कथाएं मुख्यतः बुद्ध के पूर्वजन्म से जोड़कर कही, लिखी गई हैं। ऐसे में ये कथाएं बुद्ध के जीवन के पहले की लोक-कथाओं और उस समय के जीवन से जाकर जुड़ जाती हैं और अपने साथ पूर्ववर्ती जीवन और उसकी प्रगतिशील परम्परा को जोड़ते हुए आगे बढ़ती हैं।
ये कथाएं भारत में लिखी और संग्रहित की गईं। लेकिन, उनका यह रूप उपलब्ध नहीं हुआ। ये श्रीलंका से होते हुए बाद के समय में पुनः भारत आईं और अनुदित हुईं। लेकिन, इनका चित्रण भारत के प्रमुख बौद्ध स्थलों में हुआ। भरहुत, सांची, अजन्ता जैसे बौद्ध स्थलों पर इनके चित्रण को देखा जा सकता है।
इन जातक कथाओं में से एक छदंत जातक-कथा का चित्रण कई स्थलों पर लगातार विकासमान तौर तरीकों से हुआ है। इस कथा के मूल में एक हाथी है जिसकी दो पत्नी हैं। वह विशाल जंगल में हजारों हाथियों के साथ रहता है। उसे सभी प्यार करते हैं और वह सभी की भलाई के लिए हमेशा तत्पर रहता है। समस्या उसकी दो पत्नियों की है। इसमें से एक ईर्ष्या से भरी होती है। वह एकल प्यार के आग्रह में है। वह इसी आग्रह और ईर्ष्या और बदले की भावना के साथ प्राण त्याग देती है।
वह प्राण त्यागते समय अपने पति हाथी को मार डालने का संकल्प लेती है और वहां से दूर एक राजसी परिवार में पुनर्जन्म लेकर काशी के राजकुमार के साथ ब्याह करती है। एक दिन उसी के आग्रह पर काशी के राजा उस हाथी के छह दांतों को लाने के लिए शिकारियों को भेजते हैं।
जैसे ही हाथी उस शिकारी के जाल में फंस जाता है और शिकारी द्वारा छह दांतों की मांग को समझता है, वह अपनी विदा हो चुकी पत्नी का स्मरण करता है। वह जान चुका होता है कि यह उसकी पत्नी ही है जो उसके प्राण लेना चाहती है। वह अपने हाथियों को आगे बढ़ने से रोक देता है और उस शिकारी को अपने दांत को काटने में सहयोग करता है। इसके बाद, जब उस दांत को काशी के राजा की पत्नी को दिया जाता है, वह संताप में चली जाती है और प्राण त्याग देती है।
यह जातक कथा पत्थरों पर अलग-अलग समय में अलग-अलग रूपों में चित्रित किया गया है। भरहुत में यह चित्रण मूलकथा के काफी करीब है तो अजन्ता तक जाते-जाते यह एक भिन्न रूप ले लेता है। यह मूल कथा बुद्ध के जन्म के पूर्व समय की है जब राजा एक वरिष्ठ सदस्य है, वह संरक्षक और आदेश देने की भूमिका में आ रहा था लेकिन अपने परिवेश से बाहर नहीं था। इस समय तक निजत्व, विग्रह, ईर्ष्या और संघर्ष की अवधारणाएं तेजी से पनप रही थीं।
सामाजिक और आर्थिक समुदायों और वर्गों का जन्म संघर्ष की अनिवार्यता लेकर आ रही थी। छदंत जातक-कथा के हाथी, जो राजा है, में पूर्व के समानता, उदात्तता, उत्सर्ग और अपनत्व की भावना भरी हुई है। वह नये समाज में पनप रहे विग्रह, ईर्ष्या और संघर्ष को खत्म करने के लिए अपने प्राण का उत्सर्ग करने के लिए तैयार हो जाता है।
जातक-कथाओं में बोधिसत्व की अवधारणा बुद्ध की अपने समय की निष्ठाओं और उससे बनने वाली संवेदनाओं को अभिव्यक्त करती हैं। बौद्ध दर्शन सामाजिक और आर्थिक जीवन से बनने वाले विभिन्न भावों और व्यवहारों को संबोधित है। छदंत जातक कथा में हाथी एक ऐसे समाज के सामने खुद को होम कर देता है जो आने वाले समय में और भी विकराल होता चला गया। लेकिन, उसका यह प्राणोत्सर्ग इस समाज पर हमेशा बने रहने वाले संदेश में बदल जाता है।
इस हाथी की निष्ठा अपने समय के समाज के प्रति था जिसमें समाज के प्रति प्राणोत्सर्ग एक उदात्त मूल्य था। यह मूल्य उसकी अपने समाज के प्रति गहरी संवेदना से पैदा हुआ था। लेकिन, उसका यह प्राणोत्सर्ग नये समाज की दहलीज पर एक त्रासद-कथा की तरह सामने नहीं आती है, बल्कि यह बोधिसत्व की अवधारणा में बदलकर बौद्ध दर्शन की आधारभूमि में बदल जाती है।
भरहुत में इस जातक-कथा का चित्रण बुद्ध के समय से काफी बाद का है। इस कथा का चुनाव चित्रण की दृष्टि से जीवन का एक नये अविष्कार की तरह था। जनपद और गणराज्यों के खत्म होने, मगध साम्राज्य के तेजी से फैलने, ग्रीक, शक और सीथियन समूहों का भारत नये तरह का साम्राज्य बनाने की जो गहमा-गहमी है, उसका सारा भार किसानों और आदिवासी समुदायों पर पड़ रहा था, नगर बस और उजड़ रहे थे।
इस गहमा-गहमी में इन व्यापार और नगर पथों पर बनने वाले बौद्ध-स्थलों पर कारीगर इस जातक कथा से एक संदेश दे रहे थे। वे अपने सृजन में राजा के जीवन निष्ठा की उस संवेदना को उकेर रहे थे जो उदात्त था। वे पतित होते समाज में उदात्त होने का संदेश दे रहे थे।
इस जातक-कथा का बोधिसत्व की अवधारणा में आना और बाद के समय में चित्रण की परम्परा में स्थापित होना सामाजिक जीवन की मूल्य अवधारणा में लगातार बने रहने के संकट की ओर इशारा करता है। जीवन के मूल्य का मूल स्रोत की तलाश पर काफी कुछ लिखा जा चुका है।
खासकर दूसरे विश्वयुद्ध के समय से ही मार्क्सवादी चिंतन में सांस्कृतिक अवधारणा का प्रभाव तेजी से बढ़ा। मार्क्सवाद की वर्ग-अवधारणा, पार्टी और उसकी संरचना के प्रति निष्ठा को लेकर काफी हमले हुए और उसके साथ जुड़ी निष्ठा को ‘जड़ सिद्धांत’ की तरह पेश किया। इसका सीधा परिणाम पूरे यूरोप में कम्युनिस्ट पार्टियों के बिखर जाने में देखते हैं।
कम्युनिस्ट पार्टियों का थोड़े समय के लिए उभार 1950 के दशक में होता है और फिर 1970-80 के दशक में दिखता है। ये मुख्यतः लातिन अमेरीका और दक्षिण एशियाई देशों में ही उभरकर आ सके। लेकिन, मार्क्सवादी चिंतन पर दूसरे विश्वयुद्ध के समय यूरोप में उभरे मार्क्सवादियों का चिंतन प्रभावी रहा और उनके असर को यहां बिखर रहे मार्क्सवादी आंदोलन में देखा जा सकता है।
यहां एक बार फिर छदंत जातक-कथा की ओर देखते हुए यह पूछना जरूरी है कि जीवन के मूल का स्रोत कहां है? यह कथा इस स्रोत का आधार इतिहास की निरन्तरता और जीवन के प्रति निष्ठा को रेखांकित करता है। जीवन के प्रति निष्ठा ही हमारी संवेदना को निर्मित करती है। ये संवेदनाएं ही हमारी आकांक्षा, हमारे सपने और जीवन में कार्य और कार्यपद्धतियों की ओर ले जाती हैं।
हम आज के शासक वर्ग की जीवन निष्ठाओं को देख सकते हैं जिसमें उनकी संवेदनाएं आम मेहनतकश लोगों और युवाओं के प्रति कितना ही निष्ठुर और भयावह रुख अपना रहे हैं। वे बने-बनाए घरों पर बुलडोजर लेकर दौड़ रहे हैं। वे लोगों के संगठित होने, बोलने तक का अधिकार छीन रहे हैं। वहीं, वे पूंजीपतियों के लिए पूरी तरह बिछ जाने के लिए तैयार हैं।
उनके जीवन की निष्ठाएं हीं उनकी उस संवेदनाओं को जन्म दे रही है जो भाषा में निष्ठुर, अश्लील और नफरत पैदा करती हैं और भ्रम की स्थितियों को बनाती हैं, हिंसा पैदा करती हैं।
यह जातक कथा हम सभी से यह पूछती है कि हमारी जीवन के प्रति क्या निष्ठा है, हमारे जीवन मूल का स्रोत क्या है, हमारी संवेदनाएं क्या हैं और हमारे कार्य और कार्य-पद्धतियां क्या हैं? हमारी संवेदनाओं की भाषा क्या है? इस भाषा वाला हमारा समाज कहाँ हैं, हमारे लोग कहां है?
आज एक बिल, अधिनियम, कानून बनाकर एक नागरिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बने रहने वाले हमारे संगठित होने का अधिकार छीन लिया जाता है और अधिक काम के लिए बाध्य कर दिया जाता है, तब यह जरूर पूछना होगा कि यह कैसे हुआ? पार्टी, संगठन को ‘जड़ सिद्धांत’ बताने वाले ज्ञान लेने और मार्क्सवाद में संशोधन करते-करते खुद से जरूर पूछना चाहिए कि हम आज कहां खड़े हैं? हमारे पास बचा क्या है?
यह जातक कथा जीवन के प्रति गहरी निष्ठा की मांग करती है। उससे पैदा होने वाली संवेदना को जीवन में उतारने की मांग करती है। यह मूल्य को उदात्त बनाने और इस रूप देने की मांग करती है। यह अपने समय से संवाद करने और फिर नये रूपाकार देने की मांग करती है। यह सर्जना और जीवन के प्रति पक्षधर होने की मांग करती है। जीवन के प्रति निष्ठा रखने वाले और इसके लिए प्राण का उत्सर्ग कर देने वालों के प्रति सम्मान और उससे संवाद की मांग करती है।