लखनऊ। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिजनौर के तत्कालीन एसपी संजीव त्यागी की मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रती भाषा वाली वायरल ऑडियो की फॉरेंसिक जाँच कराने के आदेश का स्वागत किया है। उन्होंने बिजनौर में 2019 में सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनकारियों पर पुलिस फ़ायरिंग जिसमें दो लोग मारे गए थे को भी न्यायिक जाँच के दायरे में लाने की मांग की है जिसमें संजीव त्यागी की भूमिका संदिग्ध थी। उन्होंने वर्तमान में बस्ती में डीआईजी पद पर तैनात संजीव त्यागी को तत्काल निलंबित करने की मांग भी की है।
शाहनवाज़ आलम ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा देहरादून निवासी इस्लामुद्दीन अंसारी के ख़िलाफ़ बिजनौर पुलिस द्वारा दायर फ़र्ज़ी मुकदमे को ख़ारिज करते हुए की गई टिप्पणी कि “यह पुलिस द्वारा अपनी शक्तियों का दुरुपयोग था”, उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा क़ायम गुंडाराज की पोल खोल देता है। विदित हो कि उत्तराखंड भाजपा के नेता इस्लामुद्दीन अंसारी ने बिजनौर एसपी संजीव त्यागी की वायरल ऑडियो को उन्हें फॉरवर्ड करके उनसे पूछा था कि क्या यह उनकी आवाज़ है?
जिसके बाद पुलिस ने उनपर सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने के फ़र्ज़ी आरोपों में मुकदमा दर्ज कर दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन फ़र्ज़ी मुकदमों को ख़ारिज करने से इनकार कर दिया जिसके बाद वो सुप्रीम कोर्ट गए। जिसने ना केवल मुकदमे को पुलिस द्वारा उत्पीड़न बताते हुए ख़ारिज कर दिया बल्कि संजीव त्यागी को फोरेंसिक जांच के लिए अपने आवाज़ का सैंपल देने का निर्देश भी दे दिया।
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि न्यायपालिका के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि जिस मुकदमे को सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्ट्या ही पुलिस की शक्ति का दुरुपयोग बताते हुए ख़ारिज कर दिया उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किस आधार पर सुनवाई योग्य मान लिया था। इससे स्पष्ट होता है कि हाईकोर्ट के कुछ जज राज्य की भाजपा सरकार के दबाव या वैचारिक प्रभाव में काम कर रहे हैं जो सरकार के मुस्लिम विरोधी नैरेटिव को अदालती संरक्षण देते हैं।
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि यह ऐसा पहला मामला नहीं है जहाँ अल्पसंख्यक वर्ग से जुड़े व्यक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए पीड़ित को राहत दी हो। इससे पहले एक ईसाई व्यक्ति के ख़िलाफ़ दर्ज धर्मांतरण के फ़र्ज़ी मुकदमे में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रोहित रंजन अग्रवाल ने ज़मानत याचिका ख़ारिज करते हुए ईसाई धर्म पर सांप्रदायिक टिप्पणी की थी। जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ़ आरोपी को ज़मानत दी बल्कि हाईकोर्ट की उक्त टिप्पणी को भी फ़ैसले से हटाने का निर्देश दिया था। इसके अलावा शेखर यादव और रवि दिवाकर का भी उदाहरण है जिसमे से पहले ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ सांप्रदायिक टिप्पणी की थी और दूसरे ने अपने फ़ैसले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा की थी। जिसे हाईकोर्ट को फ़ैसले से हटाने का निर्देश देना पड़ा था।
उन्होंने कहा कि इन उदाहरणों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के कुछ जजों के साम्प्रदायिक मानसिकता को उजागर कर दिया है ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को इलाहाबाद हाईकोर्ट के सांप्रदायिक जजों की स्क्रूटनी करके उन्हें न्यायपालिका से बाहर निकालने के लिए कमेटी बनानी चाहिए।
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि संजीव त्यागी मामले में सुप्रीम कोर्ट को जांच के दायरे को बढ़ाते हुए 2019 में बिजनौर में हुए सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन में शामिल नागरिकों पर फ़ायरिंग जिसमें अनस और सुलेमान नाम के युवाओं की मौत हुई थी, को भी शामिल करना चाहिए। क्योंकि जिस वायरल ऑडियो की फोरेंसिक जांच का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया है उसमें संजीव त्यागी ने पुलिसकर्मियों को कहा था कि उन्हें मुख्यमंत्री की तरफ़ से प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग का निर्देश दिया गया है। जो संदेह उत्पन्न करता है कि पुलिस पर प्रदर्शनकारियों की हत्या करने का दबाव सीधे मुख्यमंत्री ने दिया था या एसपी ने झूठ बोलकर अपने अधीन पुलिसकर्मियों को हत्या के लिए उकसाया था।
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को यह भी संज्ञान में रखना चाहिए कि कारवाँ मैगज़ीन को दिए गए इंटरव्यू में संजीव त्यागी ने स्वीकार किया था कि प्रदर्शन के ख़िलाफ़ पुलिस कार्यवाही में पुलिस बल के बाहर के निजी लोग भी शामिल थे। जिनके आरएसएस और भाजपा से जुड़े होने का प्रमाण कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने 27 जनवरी 2020 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सौंपा था।
कांग्रेस नेता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को संजीव त्यागी द्वारा इंटरव्यू में स्वीकार किए गए इस तथ्य को भी संज्ञान में रखना चाहिए कि सुलेमान की हत्या पुलिस ने आत्मरक्षा में की थी। जबकि सुलेमान के पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ था और पुलिस ने सुलेमान के पेट पर गोली मारी थी जो आत्मरक्षा के बजाए हत्या करने के उद्देश्य से किया गया था। वहीं इस इंटरव्यू में त्यागी ने यह भी स्वीकार किया है कि अनस की हत्या दंगाइयों ने की थी क्योंकि उसके पेट से 32 एमएम बोर की गोली निकली थी जबकि पुलिस अमूमन 9 एमएम बोर की गोली इस्तेमाल करती है।
जिससे यह सवाल उठता है कि क्या ये दंगाई पुलिस के साथ शामिल आरएसएस और भाजपा के लोग थे जिन्होंने 32 एमएम बोर की गोली से अनस की हत्या की थी। वहीं उसी इंटरव्यू में संजीव त्यागी ने मदरसे में पढ़ने वालों को ब्रेनवाश किया हुआ भी बताया था जिससे मुसलमानों के प्रति उनके नफ़रती मानसिकता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के संविधान के अभिरक्षक होने के कारण उसकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वो संविधान की भावना के विपरीत आचरण करने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्यवायी करे।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)