अभी हाल में ही दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने फ्रंट पेज पर भारत के सन्दर्भ में एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इस रिपोर्ट का शीर्षक था -”परछाइयों से सत्ता तक: भारत का भविष्य अब चुनाव नहीं, संगठन तय कर रहा है।”
जाहिर है यह रिपोर्ट संघ और बीजेपी की मिली जुली राजनीति का खुलासा है जो बता रहा है कि भले ही बीजेपी सत्ता से अलग हो जाए लेकिन भारतीय समाज, संस्था और संवैधानिक संस्थाओं में जिस तरह से संघ की गहरी पैठ हो गई है, बीजेपी के सत्ता से जाने के बाद भी विपक्ष की मुश्किलें आसान नहीं हो सकती हैं।
इसके बारे में यही कह सकते हैं कि यह कोई साधारण रिपोर्ट नहीं है, यह एक चेतावनी दस्तावेज है। न्यूयॉर्क टाइम्स और गार्जियन जैसे पश्चिमी अख़बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अब मोदी सरकार का वैचारिक स्रोत नहीं, बल्कि भारत की सत्ता-संरचना का स्थायी स्तंभ बता रहे हैं। सवाल यह नहीं कि पश्चिम संघ को कैसे देखता है — सवाल यह है कि क्या भारत में सत्ता अब लोकतांत्रिक चुनावों से नहीं, बल्कि संगठनात्मक पकड़ से तय हो रही है?
रिपोर्ट बता रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वतंत्रता दिवस भाषण इस बदलाव का प्रतीक था। 11 वर्षों में पहली बार उन्होंने लाल किले से RSS को खुलकर नमन किया। यह कोई भावनात्मक श्रद्धांजलि नहीं थी, बल्कि राजनीतिक स्वीकारोक्ति थी — कि जिस संगठन को दशकों तक “परछाइयों की ताक़त” कहा जाता रहा, वह अब खुलकर सत्ता का केंद्र बन चुका है। रिपोर्ट इशारा करती है कि संघ भले ही कोई पार्टी नहीं है लेकिन वह सत्ता की फैक्ट्री है।
संघ को समझने की सबसे बड़ी भूल यह है कि उसे बीजेपी का मातृ संगठन मान लिया जाए। बीजेपी उसका सबसे सफल प्रोडक्ट है, अंतिम नहीं। 83 हज़ार से ज़्यादा शाखाएँ, हज़ारों अनुषंगी संगठन, छात्र से लेकर जज तक — यह नेटवर्क चुनाव जीतने से कहीं आगे जाकर राज्य की आत्मा पर कब्जा करने की परियोजना है। संघ नेता का यह कथन कि “अगर सत्ता हमारे पास हो, तो सब अपने-आप ठीक हो जाएगा” लोकतांत्रिक आत्मविश्वास नहीं, राज्य-अधिग्रहण की स्वीकारोक्ति है।
रिपोर्ट बता रही है कि संघ की सबसे बड़ी ताक़त उसकी सबसे बड़ी ढाल है। कोई पारदर्शिता नहीं, कोई ऑडिट नहीं, कोई जवाबदेही नहीं। “कुछ भी संघ के नाम पर नहीं, हमारे पास सिर्फ लोग हैं।” लोकतंत्र में इससे खतरनाक वाक्य शायद ही कोई हो। और मोदी एक व्यक्ति नहीं, एक प्रतीक हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया मोदी को निरंकुश शासक नहीं, एक सफल स्वयंसेवक के रूप में देखता है — जो संघ की शताब्दी-पुरानी योजना का सबसे प्रभावी औज़ार साबित हुआ।
मोदी के आने से पहले संघ का सपना था; मोदी के बाद वह राज्य नीति बन गया।अयोध्या में राम मंदिर, कश्मीर की स्वायत्तता का अंत, इतिहास की नई पाठ्यपुस्तकें, पुलिस और प्रशासन का वैचारिक संरेखण — ये अलग-अलग फैसले नहीं, एक ही वैचारिक नक़्शे की लकीरें हैं। ख़तरा यह नहीं कि मोदी बहुत शक्तिशाली हैं। ख़तरा यह है कि मोदी के बिना भी यह व्यवस्था चलती रहेगी।
संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषणों में समरसता, शांति और सह-अस्तित्व के शब्द मिलते हैं। लेकिन वही भाषण एक पंक्ति छोड़ जाते हैं —“समाज को सतर्क और संगठित रहना होगा।” यही वह ग्रे ज़ोन है, जहाँ से विजिलांटिज़्म को नैतिक लाइसेंस मिलता है। जब मुस्लिम मोहल्लों में जुलूस शक्ति-प्रदर्शन बनते हैं, चर्चों पर हमले होते हैं, ‘बीफ’ के शक में लिंचिंग होती है, या घरों पर बुलडोज़र चलता है — तब यह ‘भटके हुए तत्व’ नहीं होते।
यह उस राजनीति का ज़मीनी संस्करण होता है, जो ऊपर “संस्कृति” और नीचे “डर” पैदा करती है।उत्तर प्रदेश इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है — जहाँ मुख्यमंत्री का संदेश साफ़ है:हिंदू आस्था सार्वजनिक है, मुस्लिम आस्था निजी। यह कोई संयोग नहीं, यह नया सेक्युलरिज़्म है। तो ये कुछ बातें न्यूयोर्क टाइम्स की रिपोर्ट बता रही है।
अब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भोपाल में कई बातों का उल्लेख किया है। उनका यह बयान कई बातों का जवाब तो है ही न्यूयोर्क टाइम्स का जवाब भी है। भागवत ने कहा है कि संघ को बीजेपी के चश्मे से देखना ‘भारी भूल’, संघ कोई अर्धसैनिक संगठन नहीं। भागवत ने साफ शब्दों में कहा कि संघ को भारतीय जनता पार्टी के जरिए समझने की कोशिश करना “एक बड़ी भूल” होगी। उन्होंने यह भी खारिज किया कि संघ कोई अर्धसैनिक संगठन है। भागवत के मुताबिक, संघ का उद्देश्य समाज को जोड़ना और ऐसे संस्कार व गुण विकसित करना है, जिससे भारत दोबारा किसी विदेशी शक्ति के अधीन न जाए।
भोपाल में प्रबुद्ध नागरिकों की एक सभा को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा, “हम वर्दी पहनते हैं, मार्च निकालते हैं और दंड (लाठी) अभ्यास करते हैं, लेकिन अगर कोई इसे अर्धसैनिक संगठन समझता है, तो यह गलतफहमी है।” उन्होंने कहा कि संघ एक विशिष्ट संगठन है, जिसे किसी एक राजनीतिक दल या उससे जुड़े संगठनों के आईने से नहीं देखा जा सकता।
संघ प्रमुख ने कहा, “अगर आप संघ को बीजेपी को देखकर समझना चाहते हैं, तो यह भारी भूल होगी। यही गलती तब भी होगी, जब आप इसे विद्या भारती जैसे संगठनों के जरिए समझने की कोशिश करेंगे।” उन्होंने दोहराया कि संघ किसी के ‘रिमोट कंट्रोल’ से नहीं चलाता, बल्कि स्वयंसेवकों को मूल्यों और राष्ट्रबोध से लैस करता है।भागवत ने आरोप लगाया कि संघ के खिलाफ एक “झूठा नैरेटिव” बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आज लोग तथ्यों की गहराई में जाने के बजाय विकिपीडिया जैसी सतही जानकारियों पर भरोसा कर लेते हैं। “जो विश्वसनीय स्रोतों तक जाएंगे, वे संघ को सही मायने में समझ पाएंगे।”
इतिहास का जिक्र करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि अंग्रेज भारत पर शासन करने वाले आठवें आक्रमणकारी थे। उन्होंने सवाल उठाया कि बार-बार बाहरी ताकतें भारत को कैसे पराजित करती रहीं। “राजनीतिक गुलामी खत्म हो चुकी है, लेकिन मानसिक गुलामी अभी भी किसी हद तक बनी हुई है। इसे खत्म करना होगा।”
भागवत ने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की वकालत करते हुए कहा कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए ‘आत्मगौरव’ जरूरी है। “जो हमारे देश में बना हो और यहां के लोगों को रोजगार देता हो, वही खरीदें। ” हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि स्वदेशी का मतलब दुनिया से व्यापार तोड़ना नहीं है, बल्कि जरूरी आयात अपनी शर्तों पर होना चाहिए। संघ की वित्तीय स्थिति पर बात करते हुए भागवत ने कहा कि संगठन अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है और किसी बाहरी फंड या दान पर निर्भर नहीं है। उन्होंने पिछले सौ वर्षों में संघ को झेलनी पड़ी कठिनाइयों, प्रतिबंधों और हमलों का भी उल्लेख किया।
अपने संबोधन के अंत में भागवत ने लोगों से संघ की शाखाओं में आने की अपील की। उन्होंने कहा, “अगर मेरी बातों पर पूरा भरोसा नहीं है, तो भी ठीक है। संघ को समझने का सबसे अच्छा तरीका है—आकर देखना। जैसे चीनी की मिठास समझाने से नहीं, चखने से समझ आती है।” संघ प्रमुख के इस बयान को ऐसे समय में अहम माना जा रहा है, जब संघ और बीजेपी के रिश्तों को लेकर राजनीतिक बहस तेज है और विपक्ष लगातार संघ की भूमिका पर सवाल उठाता रहा है।
अब भागवत के बयानों का राजनीतिक विश्लेषण किया जाए तो कहा जा सकता है कि मोहन भागवत का यह बयान कि संघ को बीजेपी के चश्मे से देखना भारी भूल है” सिर्फ एक वैचारिक स्पष्टीकरण नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक संकेतों से भरा हुआ है। इसे मौजूदा सत्ता-संतुलन, आगामी चुनावी चक्र और संघ–भाजपा संबंधों के बदलते समीकरणों के संदर्भ में देखना ज़रूरी है।
पिछले एक दशक में बीजेपी और संघ को लगभग एक ही राजनीतिक इकाई की तरह देखा जाने लगा है। सरकार के फैसलों—चाहे वे CAA हों, राम मंदिर हो या पाठ्यक्रम में बदलाव—का सीधा नैरेटिव संघ पर डाल दिया गया। भागवत का बयान दरअसल यह संदेश देता है कि सरकार की हर नीति की नैतिक जिम्मेदारी संघ पर न डाली जाए। बीजेपी की राजनीतिक मजबूरियाँ और संघ का दीर्घकालिक सामाजिक एजेंडा एक नहीं हैं,यह डिस्टेंसिंग विदाउट डाइवोर्स की राजनीति है।
संघ का यह बयान ऐसे वक्त आया है जब 2026–27 में कई राज्यों में चुनाव हैं। 2029 लोकसभा की तैयारी अभी से शुरू मानी जा रही है। और बीजेपी को कुछ राज्यों में एंटी-इनकम्बेंसी और सामाजिक असंतोष का सामना है। ऐसे में संघ जानता है कि अगर बीजेपी हारती है, तो संघ की सामाजिक स्वीकार्यता भी प्रभावित होती है। इसलिए संघ खुद को ‘ऑल-वेदर आइडियोलॉजिकल बॉडी’ के रूप में पुनः स्थापित करना चाहता है—जो किसी एक पार्टी की किस्मत से बंधी न हो।
विपक्ष लंबे समय से कहता रहा है कि “देश संघ के रिमोट कंट्रोल से चल रहा है। ”भागवत का यह कथन कि “संघ स्वयंसेवकों को रिमोट से नहीं चलाता” उसी आरोप का संस्थागत खंडन है।राजनीतिक रूप से इसका अर्थ है संघ पॉलिसी-मेकर नहीं, माइंड-शेपर है। सत्ता में जो है, उसकी असफलताओं की जवाबदेही संघ नहीं लेगा।
संघ के 100 साल पूरे होने पर भागवत का देशभर में संवाद कोई संयोग नहीं है। यह एक सॉफ्ट रीब्रांडिंग एक्सरसाइज है। अर्धसैनिक छवि से दूरी,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर ज़ोर स्वदेशी, आत्मगौरव, मानसिक स्वतंत्रता जैसे शब्दों का चयन और यह शहरी, मध्यवर्ग और नॉन-हार्डकोर समर्थकों को साधने की रणनीति है।
संघ प्रमुख का बयान बीजेपी के लिए एक सूक्ष्म संदेश भी है “संघ को शील्ड की तरह इस्तेमाल मत करो।”अगर सरकार अलोकप्रिय होता है। संघ दूरी बनाएगा, नैरेटिव बदलेगा और जरूरत पड़ी तो नई राजनीतिक संरचनाओं के लिए स्पेस छोड़ेगा। भारतीय राजनीति में यह नया नहीं है—जनसंघ से बीजेपी तक का सफ़र इसका उदाहरण है।
भागवत की “मानसिक गुलामी” वाली टिप्पणी पश्चिमी उदारवाद ,सेक्युलरिज़्म की मौजूदा व्याख्या और उपभोक्तावादी संस्कृति पर वैचारिक हमला है। यह संघ की लॉन्ग टर्म आइडियोलॉजिकल वॉर का हिस्सा है, जो सरकारों से लंबी उम्र वाला होता है।मोहन भागवत का यह भाषण बीजेपी से सार्वजनिक दूरी ,संघ की वैचारिक स्वायत्तता की घोषणा और आने वाले राजनीतिक उतार-चढ़ाव के लिए पोजीशनिंग डॉक्यूमेंट है। संघ साफ कर रहा है—सरकारें आती-जाती रहेंगी, संघ रहेगा।
(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)