पेसा नियमावली लागू होने पर गांव-गांव में उत्साह का माहौल, मनाया गया जश्न

“29 साल के लम्बे संघर्ष, तपस्या और आदिवासियों के बलिदान का परिणाम है पेसा नियमावली का अधिसूचित होना। अब राज्य के 5वीं अनुसूची वाले इलाकों की ग्राम सभाओं को असीमित संविधानिक और क़ानूनी अधिकार प्राप्त हो गए हैं। इसे कम शब्दों में कहा जाए तो ग्राम सभाओं को विधायी, कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्ति प्राप्त है।

अब तक प्राकृतिक सम्पदाओं यथा जल, जंगल, जमीन के जो अवैध दोहन, खनन, हस्तांतरण धड़ल्ले से हो रहे थे, उस पर ग्राम सभाएं सर्वसम्मति से न्याय संगत फैसले लेंगी। लातेहार के बेतला ब्याघ्र परियोजना क्षेत्र में वन विभाग अपना एकक्षत्र राज समझता था, उसे भी सम्पूर्ण वन क्षेत्र में किसी भी तरह के परियोजना संचालित करनी है, उसे ग्राम सभा से मंजूरी लेनी ही पड़ेगी।” 

उक्त उद्गार लातेहार जिले के दलदललिया में ‘पेसा नियमावली विजय दिवस’ पर आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पेसा मामले के आधार स्तम्भ समझे जाने वाले जेम्स हेरेंज के है। 

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ग्राम स्वशासन अभियान से जुड़े मिथिलेश कुमार ने पेसा नियमावली के अंतर्गत ग्राम सभाओं द्वारा किए जाने वाले प्रशासनिक प्रक्रियाओं को बताया। 

उन्होंने कहा कि “प्रत्येक ग्राम सभा अपने गांवों में ग्राम सभा सचिवालय की स्थापना करेंगे। दस्तावेजों के दुरुस्त संधारण के लिए गांव को ही सहायक सचिव का चयन करना है। ग्राम सभा बैठक का एक ही संवैधानिक पंजी होगा। जिसपर सभी तरह के ग्राम सभाओं द्वारा लिए गए निर्णयों को लिपिबद्ध किया जायेगा। जिस भी विभाग को प्रस्तावों की कॉपी लेनी होगी वो फोटो कॉपी का वास्तविक मूल्य जमा कर प्रस्तावों की कॉपी हासिल कर सकेंगे।”

करवाई ग्राम सभा की तेज तर्रार महिला शान्ति देवी ने वन विभाग द्वारा विगत 2 सालों से की जा रही प्रताड़नाओं को जोरदार ढंग से रखते हुए कहा कि “उनके वन भूमि क्षेत्र में हिरण प्रजनन केंद्र, ग्रासप्लाट, सड़क निर्माण के नाम पर कहर बरपा रहे हैं। गांव के ग्राम प्रधान में वन विभाग के आंतक के सामने झुक गए हैं। पहले पूरे 30 एकड़ में हिरण पार्क बनाकर उस पूरे क्षेत्र को तार से घेरावा कर दिया है। इसमें हमारी महुआ, कुसुम, जामुन और दूसरे प्रकार के फल फूलों से हमें वंचित किया गया।

इस वर्ष हिरण पार्क का क्षेत्रफल बढ़ाने लगा है, फिर वहां तक जाने के लिए सड़क बनाया जा रहा था। ऐसा एक-एक परियोजना करके हम आदिवासियों को ही अपने वनभूमि से बेदखल किया जा रहा है। जिसपर हम पूर्वजों के समय से सामूहिक अधिकार रहा है।”

उन्होंने बताया कि “पिछले एक सप्ताह से हम ग्रामीण वन विभाग के विरुद्ध लड़ रहे हैं। हम सबने ठान लिया है कि किसी भी कीमत पर हम वन विभाग और उसके दलालों को घुसने नहीं देंगे।”

गोइंदी गांव के बन्धु सिंह ने बताया कि “गांव में मुरहू पिपर नाम करके जंगल है, उसमें वन विभाग अवैध रूप गार्डवाल निर्माण कर रहा था। फिर हुलुक गांव में ग्रास प्लाट निर्माणाधीन हैं इस पूरे ग्रास प्लाट क्षेत्र में जितने स्थानीय जडीबुटी, लगाएं और ग्रामीणों के वृक्ष थे। उन सबको काट कर पूरी तरह साफ कर दिया गया है। इन सब परिस्थितियों से साफ है कि वन विभाग जंगल रक्षक नहीं, भक्षक और भयादोहन का विभाग बन चुका है। अब हम सब मुखर होकर ऐसे विरोधी योजनाओं का कड़ा मुकाबला करेंगे।”

भारतीय सामुदायिक कार्यकर्त्ता संघ के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द मूर्ति ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि “ग्राम सभाओं को तमाम तरह के प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन का हक़ मिलना दुनिया के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा।”

उन्होंने क़ानूनी शब्दों को भी रेखांकित करते हुए कहा कि “इसमें 90 फीसदी प्रावधानों को अनिवार्य कर दिया गया है। आम तौर पर अधिकांश कानूनों में किया जा सकता है, जैसे वाक्य लिखे होते हैं, ऐसे शब्दों से नौकरशाहों को मनमानी करने के मौके दे देते हैं।”

बरवाडीह प्रखण्ड के पूर्वी जिला परिषद सदस्य कन्हाई सिंह ने अपने जोशीले अंदाज में कहा कि “ग्राम सभाएं, गांव में जन्म, मृत्यु और शादी विवाह प्रमाण पत्र भी जारी करेंगी। जिसे मानना सरकारी अधिकारियों के लिए बाध्यकारी होगा।”  

इस अवसर पर गारू प्रखण्ड की स्वर कोकिला अमिन्ता उरांव ने “ग्राम सभा के एकेगो रजिस्टर, ग्राम प्रधान होवी गाँव के मिनिस्टर”—- जैसे गाने गाकर उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम को सफल बनाने में ग्राम प्रधान राजू उरांव, संध्या देवी, निर्मल बिरजिया, कमलेश सिंह, विमल तिग्गा, ग्राम स्वराज अभियान के विमल सिंह आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम का संचालन सोमवती देवी ने की।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में परम्परिक परिधान में सजी-धजी छोटी बच्चियां और महिलाओं द्वारा गाजे-बाजे ढोल, नगाड़े, मांदर के साथ कार्यक्रम में पधारे अतिथियों का स्वागत कर उन्हें कार्यक्रम स्थल तक ले जाया गया। 

इसी क्रम में केलसा नदी पर गांव पाहन राजेश्वर सिंह ने अपने गांव गम्हेल की आदिवासी रीति पूजा-पाठ कर जल, जंगल, जमीन के अवैध दोहन से बचाने की कामना की। उपस्थित ग्रामीणों ने ग्राम प्रधान राजू उरांव और पाहन की अगुवाई में सांकेतिक तौर पर जल संरक्षण के मद्देनजर पत्थरों को तह लगाकर बंधाई किया।

साथ ही सामूहिक फैसला लिया कि हम गांव के प्रत्येक परिवार से हर माह श्रमदान कर पानी को रोकेंगे, जिससे कि एक तरफ पानी का संरक्षण होगा, इससे आस-पास भू-जल स्थिर रहेगा, वहीं दूसरी तरफ गांव के जानवर और जंगली पशु – पक्षियों व जीव जन्तुओं को भी स्वच्छ पेयजल साल भर सुलभ होगा।

 बैठक में दलदलिया ग्राम सभा के अतिरिक्त करवाई, गोइंदी, लोहरगडा सहित अन्य ग्राम सभा के सदस्य भी मौजूद थे।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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