आजकल नीति आयोग से आ रही रिपोर्टों को देखना देश की कुछ सच्चाईयों से रूबरू होना है जिसके बारे में कुछ वर्षों पहले तक बड़े-बड़े दावे किये जा रहे थे। वे दावे आज जमीन पर बिछे दिखे रहे हैं। इसी में से एक ‘विश्वगुरू’ होने का दावा था। यह शब्द काफी सारा अर्थ समेटे हुए था। मूल अर्थ तो यही था कि दुनिया हमसे सीखेगी और हमारे रास्ते को अंगीकार करेगी।
इस विशाल दायरे में निश्चित ही शिक्षा का माॅडल भी था। स्कूलों और विश्वविद्यायलयों को ‘विश्वस्तरीय’ बना देने का दावा खूब किया गया। लेकिन, नीति आयोग द्वारा हाल ही में जो रिपोर्ट जारी हुई, वह इस संदर्भ में काफी निराश करने वाला है।
भारत में शिक्षा का अर्थ आज भी मूलतः उच्च शिक्षा ही बना हुआ है जिसमें मूलतः मध्य और उच्च-मध्य वर्ग की भागीदारी रहती है। उच्च वर्ग आमतौर शुरू से ही विदेशों में शिक्षा ग्रहण करने की प्राथमिकता देता रहा है। पिछले दो दशकों में मध्य और उच्च-मध्य वर्ग का जोर अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाने पर लगा है। 2016 से 2022 के बीच भारत में विदेश से आने वाले और भारत से विदेश में जाने वाले छात्रों की संख्या के आंकड़ों को देखने से यह परिदृश्य और भी साफ होगा:

(स्रोतः नीति आयोग, एआईएसएचई और विदेश मंत्रालय के आंकड़ों पर आधारित। नोट-भारत में आने वाले छात्र एआईएसएचई में दर्ज होते हैं जहां 2022 तक के आंकड़े उपलब्ध है।)
2016 से 2020 की तुलना में 2021 और 2022 में भारत से विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में आई वृद्धि दुगने से से थोड़ी ही कम रह गई। लेकिन, भारत आने वाले विदेशी छात्रों की तुलना में भारत से विदेश पढ़ने जाने वाले छात्रों की बीच का अनुपात काफी बड़ा दिखता है।
यहां यह ध्यान में रखना होगा कि 2019 से कोविड की महामारी शुरू हो चुकी थी और 2020 और 2021 में इसने चरम रूप ले लिया था। भारत में बड़े पैमाने पर लाॅकडाउन ने सिर्फ उद्योग ही नहीं शिक्षा को भी ठप्प कर दिया था। शिक्षा पर प्रभाव सबसे लंबे समय तक देखा गया। इस दौरान ऑनलाईन पंजीकरण की संख्या में वृद्धि हुई और विदेशी शिक्षा संस्थानों ने इसमें बढ़त हासिल की।
भारतीय छात्रों ने ऐसे विश्वविद्यालयों को अधिक तरजीह दी। इस दौरान छात्रों को विदेश यात्रा और वहां जाकर पंजीकृत होने की जरूरत नहीं थी। इस मामले भारत के शिक्षण संस्थान विदेशी छात्रों को आकर्षित करने में सफल होते हुए नहीं दिखे। ऐसा लगता है कि भारत में ऑनलाईन सुविधा प्रदान करने वाली संरचना की कमी एक कारण रही होगी।
भारत में देश के भीतर ही छात्रों को शिक्षित करने के लिए इंटरनेट, लैपटाॅप और स्मार्ट फोन की सुविधा और शिक्षा को प्रसारित करने के लिए आधारभूत संरचना की कमी पर काफी बात हो चुकी है। भारत में दुनिया से आने वाले छात्रों की संख्या हिस्सेदारी में 1 प्रतिशत से भी कम के पायदान पर है जबकि अमेरीका में यह हिस्सेदारी 15 से 16 प्रतिशत तक है। इसे आंकड़ों में देखना अच्छा होगा:

(स्रोतः नीति आयोग ग्लोबल मोबिलिटी कम्पैरिजन)
भारत के ज्यादातर छात्र कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जाते हैं। अमेरिका ने हाल के दिनों में विदेशी छात्रों के पंजीकरण पर कई तरह के प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए हैं जिससे वहां पर विदेशी छात्रों की हिस्सेदारी प्रभावित हुई है। नीति आयोग ने भारत में विदेश से छात्रों की हिस्सेदारी न बढ़ने के पीछे कई कारणों को बताया है। इसमें से कुछ को देख लेना चाहिए:
1. चंद अभिजात्य संस्थानों को छोड़कर विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की कमी।
2. अंतर्राष्ट्रीय मानकों वाले पाठ्यक्रम और अंतर्विषयक अध्ययन की सुविधा में कमी।
3. नियामक जटिलताएं जिसमें वीसा की सुविधा और संस्थागत मंज़ूरियाँ।
4. बाहर से आने वाले छात्रों के लिए रहने, संचालन और माहौल के साथ अनुकूलता में कमी।
5. भारत के विश्वविद्यालयों की अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति की कमी।
यहां हम मुख्यतः नीति आयोग की रिपोर्ट और उस पर की गई टिप्पणियों तक सीमित रहना चाहते हैं। इसके बाहर जाकर यदि हम स्थिति का अध्ययन करें तब स्थिति बेहद भयावह दिख रही है। खासकर, भारत के विश्वविद्यालयों में शिक्षा की पूरी प्रणाली को जिस तरह से बदला जा रहा है और पाठ्यक्रमों पर शासक समूहों द्वारा जिस तरह से पूर्वाग्रहों को लादा जा रहा है, उससे आने वाले दिनों में विश्वस्तरीय तो दूर ‘लोकल’ स्तर पर भी यह दोयम दर्जे से नीचे चली जाने वाली है।
गाय, गोबर और धूप-बत्ती अब शिक्षा संस्थानों में पाठ्यक्रम बनकर शिक्षा के सामान्य मानकों को भी गहरे दलदल में फंसा देने की ओर ले जा रहे हैं। भारत की शिक्षा व्यवस्था और उसकी संरचना को दुनिया के नक्शे पर रखकर देखने से यह साफ है हमारी शिक्षा प्रणाली ‘विश्वगुरू’ की भूमिका के पायदान पर काफी नीचे है। भारत के छात्र सीखने और भविष्य की चिंता को हल करने के लिए विदेशी शिक्षा संस्थानों के प्रति अधिक आकर्षित हैं।
नालन्दा, विक्रमशिला और तक्षशिला के प्राचीन विश्वविद्यालयों को नाम रटने से तो हम कतई विश्वगुरू नहीं होने वाले हैं। इन प्राचीन विश्वविद्यालयों को याद करते समय यह याद रखना होगा यह ‘गुरूकुल’ नहीं थे, ये बौद्ध शिक्षण संस्थान थे जहां दार्शनिक चिंतन का विकास हो रहा था। यहां असहमतियों पर हमला नहीं हो रहा था। ये वे संस्थान थे जिनके प्रवेश द्वारों पर ‘आओ, बात रखो और सुनने का धैर्य रखो’ लिखा होता था।
यहां की शिक्षण के दर्शन में ‘कार्य, कारण और निवारण’ की तर्कपद्धति और चिंतन व्यवस्था थी जिसमें ‘आस्था’ निर्णायक पक्ष नहीं था। आज जब भारत के अंदर एक कुलपति भरे मंच से एक साहित्यकार को अपमानित करने के आजाद हो गया है और भारत को प्यार करने वाले विदेशी शिक्षकों को देश की जमीन से वापस कर दिया जा रहा हो, तब हमें अपनी कमजोरियों की ओर जरूर ध्यान देना होगा।
दरअसल, हम शिक्षा के मामले में लगातार पतित होने को अभिशप्त होते जा रहे हैं। न तो हममें भारत के अतीत को देखने की कूवत है और न ही हम वर्तमान की चुनौतियों से निपटने की स्थिति में हैं। हम एक ऐसे ठहराव में फंसते जा रहे हैं जहां से अब दुर्गंध आने लगी है। यह दुर्गंध हमें जरूर ही परेशान कर रही है और हमें चिंता में भी डाल रही है। हमें जरूर ही इस पर गौर करना चाहिए।
(इस लेख के आंकड़े इंडिया टुडे के अंग्रेजी डिजिटल प्लेटफार्म से लिये गये हैं जो उन्होंने नीति आयोग की रिपोर्ट से उठाए हैं। इसकी प्रस्तुति 10 जनवरी, 2026 को रोशनी चक्रबर्ती ने की है। आंकड़ों के लिए आभार।)
(अंजनी कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)