पेसा नियमावली 2025 को लेकर राज्य के आदिवासी समुदाय और आदिवासी संगठनों में असंतोष क्यों?

झारखंड सरकार द्वारा 2 जनवरी 2026 को अधिसूचित पेसा नियमावली 2025 को लेकर प्रदेश के आदिवासी संगठनों में गहरा असंतोष व्याप्त है।

आदिवासी समन्वय समिति सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इस नियमावली को पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 (पेसा एक्ट) की मूल भावना के विरुद्ध बताते हुए मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा और तत्काल सुधार की मांग की है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि 23 दिसंबर 2025 को मंत्रिपरिषद से स्वीकृत यह नियमावली आदिवासी स्वशासन को सशक्त करने के बजाय राज्य नियंत्रण और नौकरशाही हस्तक्षेप को बढ़ावा देती है, जो संविधान की पाँचवीं अनुसूची के विपरीत है।

पेसा एक्ट 1996 ग्राम सभा को सर्वोच्च संस्था का दर्जा देता है, लेकिन नई नियमावली में ग्राम सभा की भूमिका को केवल सलाहकारी बनाकर उसकी संवैधानिक शक्तियों को सीमित कर दिया गया है। ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि झारखंड नियमावली 2025 का आधार झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 की धारा 131 को बनाया गया है, जो पेसा अधिनियम से असंगत है और उच्च स्तरों को निचली इकाइयों में हस्तक्षेप का अधिकार देता है।

इसके साथ ही लघु वन उपज जैसे तेंदू पत्ता और बांस पर ग्राम सभा के पूर्ण स्वामित्व के बजाय वन विभाग एवं राज्य एजेंसियों का नियंत्रण बनाए रखा गया है। आदिवासी संगठनों ने भूमि अधिग्रहण में केवल एक-तिहाई कोरम की व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इससे ग्राम सभा की पूर्ण सहमति की भावना कमजोर होगी और कॉर्पोरेट हितों को लाभ पहुंचेगा। वहीं परंपरागत आदिवासी नेतृत्व -मांझी, मुंडा, मानकी आदि को हाशिये पर रखकर सरकारी सचिवों को नियंत्रण देना आदिवासी संस्कृति और स्वायत्तता का हनन है।

संगठनों ने यह भी आरोप लगाया कि ड्राफ्ट नियमावली पर प्राप्त 262 सुझावों में से मात्र 145 को शामिल किया जाना आदिवासी समाज की आवाज को दबाने का प्रमाण है। झारखंड में देश की लगभग 40 प्रतिशत खनिज संपदा होने के कारण इस नियमावली से कॉर्पोरेट और भूमि माफियाओं को लाभ मिलने की आशंका जताई गई है, जिससे आदिवासी समुदायों के जल-जंगल-जमीन पर अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।

आदिवासी समन्वय समिति के संयोजक लक्ष्मीनारायण मुंडा ने कहा कि यदि पेसा एक्ट 1996 की मूल भावना के अनुरूप नई नियमावली नहीं बनाई गई, ग्राम सभा को पूर्ण स्वायत्तता और वीटो पावर नहीं दी गई तथा परंपरागत शासन व्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया, तो आदिवासी असंतोष और तेज होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि सरकार द्वारा शीघ्र हस्तक्षेप नहीं किए जाने की स्थिति में आदिवासी समुदाय लोकतांत्रिक तरीके से सड़क पर उतरने को बाध्य होंगे।

बता दें कि विगत 23 दिसंबर को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में आयोजित राज्य कैबिनेट की बैठक में ही पेसा नियमावली पर सहमति बन गई थी, लेकिन दो मंत्रियों की ओर से कुछ बिंदुओं पर असहमति के कारण उस पर सरकार के शीर्ष स्तर पर फिर से विचार किया गया।

इसमें मंत्रियों की ओर से प्रस्तावित बदलाव को स्वीकार कर लिया गया और मुख्यमंत्री ने इस पर अपनी सहमति भी दे दी। मंत्रिमंडल निगरानी एवं संबंध में विभाग ने मुख्यमंत्री की सहमति मिलने के बाद इसे पंचायती राज विभाग को भेज दिया, जहां से इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई।

झारखंड सरकार द्वारा मंजूर किए गए पंचायत विस्तार अनुसूचित क्षेत्र नियमों को लेकर आदिवासी बुद्धिजीवी मंच ने कड़ी आपत्ति जताई है। मंच ने साफ किया है कि ये नियम संसद द्वारा 1996 में बनाए गए पेसा अधिनियम के अनुरूप नहीं हैं और इन्हें चुनौती देने के लिए झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा।

आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के राष्ट्रीय संयोजक विक्टर माल्टो ने प्रेस बयान में कहा कि राज्य सरकार ने एक बार फिर पंचायत राज की उसी व्यवस्था को लागू करने की कोशिश की है, जिसे संसद के 1996 के अधिनियम ने अनुसूचित क्षेत्रों के लिए अलग ढंग से परिभाषित किया था। उनके अनुसार, यह सीधे तौर पर संसदीय कानून की भावना के खिलाफ है।

विक्टर माल्टो ने बताया कि झारखंड बुद्धिजीवी मंच द्वारा दायर याचिका में झारखंड हाईकोर्ट ने अपने आदेश के पैरा 12 में स्पष्ट कहा था कि झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 को संसद के 1996 के अधिनियम के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद राज्य सरकार ने नियम बनाते समय उसी तीन-स्तरीय पंचायत राज व्यवस्था को आधार बनाया।

समाजिक कार्यकर्ता, आदिवासी मामलों के जानकार और पीएनबी ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान सरायकेला के पूर्व निदेशक वाल्टर कन्डुलना जो वर्तमान में अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून-96 को लागू कराने हेतु लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं, का कहना है कि पेसा नियमावली–2025 को लेकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर यह नियमावली “रूढ़िजन्य विधि” और “परंपरागत प्रणाली” पर आधारित है या नहीं जैसी बहस चल रही है।

यह बहस न तो पेसा कानून की आत्मा को पकड़ती है, और न ही अनुसूचित क्षेत्रों की संवैधानिक विशिष्टता को।

कन्डुलना कहते हैं कि असली बहस का प्रश्न यह नहीं है कि “परंपरा को कितनी जगह दी गई है?” बल्कि असली बहस यह है कि “सरकार ने पेसा कानून के क्रियान्वयन के लिए कौन सा प्रशासनिक ढांचा चुना है? आदिवासियों की ‘पारंपरिक व्यवस्था’ को या अन्य व्यवस्था को?”

वह कहते हैं कि बहस का केंद्रीय मुद्दा यह होना चाहिए कि झारखण्ड के अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि, जल, जंगल और खनिज संसाधनों तथा उनके भीतर पैदा होने वाला आर्थिक आधार का संवैधानिक मूल्य किसके हैं? ग्राम-समुदाय के, राज्य सरकार के, या केंद्र सरकार के हैं?

यदि पेसा वास्तव में “स्वशासन” का कानून है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि पारंपरिक ग्राम-सभाएं भूमि अतिक्रमण और भूमि हस्तांतरण को कैसे रोकेंगी?
“गौण खनिजों” और “लघु वन उपज” पर वास्तविक नियंत्रण कैसे रखेंगी?
स्थानीय बाजार, हाट-बाजार और व्यापारिक तंत्र को कैसे संचालित करेंगी?
यहां सबसे महत्वपूर्ण है, क्या आदिवासी समाज के पास अपने गांवों की उन्नति के लिए कोई स्वायत्त दृष्टि, ठोस कार्यक्रम और स्वतंत्र वित्तीय व्यवस्था है या नहीं?

कन्डुलना कहते हैं कि भारतीय संविधान में प्रशासनिक प्राधिकार के ‘स्पष्ट और अलग-अलग क्षेत्र’ निर्धारित किए गए हैं जो इस प्रकार हैं –
1.केंद्र — भाग-5
2. राज्य क्षेत्र — भाग-6
3. केंद्र शासित प्रदेश — भाग-8
4. अनुसूचित क्षेत्र — भाग-10 + पांचवीं अनुसूची
5. जनजातीय क्षेत्र — भाग-10 + छठी अनुसूची

(इनकी ऐतिहासिक उत्पत्ति 1874 से 1935,  तथा संविधान-सभा की बहसों और 26 जनवरी 1950 के राष्ट्रपति आदेशों से जुड़ी है, इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।)

इसके अलावा —
6. 73वें संविधान संशोधन से — भाग-9 (पंचायतें)
7. 74वें संविधान संशोधन से — भाग-9A (नगरपालिकाएं)

वाल्टर कन्डुलना सवाल करते हुए कहते हैं कि यदि अनुसूचित क्षेत्र आज भी वास्तविक और जीवित संवैधानिक इकाई हैं, तो यह प्रश्न अनिवार्य रूप से उठता है कि भाग-9 के अनुच्छेद 243(एम) तथा भाग-9ए के अनुच्छेद 243(ज़ेडसी) किस उद्देश्य से संविधान में जोड़े गए हैं? क्योंकि ये अनुच्छेद स्पष्ट रूप से कहते हैं कि पंचायती राज और नगरपालिकाओं की व्यवस्था अनुसूचित क्षेत्रों पर स्वतः लागू नहीं होगी।

यहीं से असली सवाल खड़े होते हैं।
■ अनुच्छेद 243(एम)(4)(बी) के अंतर्गत बना पेसा कानून–1996 संविधान के किस प्रशासनिक ढांचे का अनुसरण करता है? भाग-6 (राज्य)?, भाग-9 (पंचायत)? या भाग-10 (पांचवीं अनुसूची)?

■ क्या झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम–2001 वस्तुतः संविधान के भाग-6 (राज्य प्रशासन) का ही विस्तार नहीं है?

■ यदि हाँ—तो फिर पेसा कानून–1996 झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम–2001 का विस्तार कैसे हो सकता है? जबकि 2025 की नियमावली स्वयं यह स्वीकार करती है कि वह झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम–2001 की धारा 131(1) के अंतर्गत बनाई गई है और धारा 131(1) साफ-साफ कहती है कि नियमावली केवल इस अधिनियम (जेपीआरए-2001) के “प्रयोजनों को पूरा करने” के लिए बनाई जा सकती है।

तो क्या पेसा कानून को जेपीआरए -2001 के “प्रयोजन” में समाहित करना संविधान के साथ धोखा नहीं है?

वे कहते हैं कि जेपीआरए-2001 की अनुसूचित क्षेत्रों में वैधता पर एक और गंभीर तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है, अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित राष्ट्रपति का आदेश। 26 जनवरी 1950, 31 दिसंबर 1977, 11 अप्रैल 2007 और झारखण्ड राज्य गठन 15 नवंबर 2000, इन तिथियों के आलोक में यह प्रश्न अपरिहार्य हो जाता है कि क्या झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम 2001 अनुसूचित क्षेत्रों में प्रारंभ से ही असंवैधानिक नहीं था?

क्या पेसा कानून की नियमावली ‘राज्य के पंचायती राज विभाग द्वारा बनाई जा सकती है?’ पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत ‘राज्यपाल की विशेष जिम्मेदारी’ और ‘जनजातीय परामर्शदात्री परिषद’ की भूमिका को क्यों और किस आधार पर दरकिनार किया गया है?

वाल्टर कन्डुलना बताते हैं कि पेसा नियमावली–2025 पर बहस यदि केवल “परंपरा बनाम आधुनिकता” तक सीमित रही, तो यह बहस सत्ता के लिए सुविधाजनक और ‘आदिवासी स्वशासन’ के लिए घातक होगी।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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