आज चित्रकूट में जो हुआ, वह किसी “अच्छे प्रशासन” की औपचारिक तस्वीर भर नहीं है, बल्कि पूरे देश की शिक्षा-व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है। जब एक जिलाधिकारी अपनी बेटी को सरकारी आंगनबाड़ी और सरकारी विद्यालय की व्यवस्था से जोड़ सकता है, तो यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि देश के बाकी जिलाधिकारी, आईपीएस अधिकारी, सचिव, मंत्री, विधायक, सांसद और जिला न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक के न्यायाधीश अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में क्यों नहीं पढ़ाते?
यह प्रश्न व्यक्तिगत पसंद का नहीं, बल्कि सार्वजनिक नैतिकता और व्यवस्था की सच्चाई का है।
सच यह है कि शासन, प्रशासन और न्यायपालिका के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों ने कभी भी सरकारी शिक्षा को अपने बच्चों के योग्य नहीं माना। वे भाषणों में सरकारी स्कूलों की प्रशंसा करते हैं, योजनाओं की सूची गिनाते हैं, लेकिन व्यवहार में उनके बच्चे कॉन्वेंट और महंगे निजी स्कूलों में ही पढ़ते हैं। यह दोहरा चरित्र ही सरकारी शिक्षा की सबसे बड़ी बीमारी है। जो व्यवस्था अपने निर्माताओं और संचालकों के बच्चों के लिए असुरक्षित मानी जाती है, उसे गरीब और सामान्य नागरिक के बच्चों के लिए कैसे “उत्तम” बताया जा सकता है?
भारत में शिक्षा सुधार के नाम पर अनेक आयोग बने। 1964-66 का कोठारी आयोग साफ-साफ कह गया था कि देश में समान स्कूल प्रणाली होनी चाहिए, ताकि अमीर-गरीब, शासक-शासित का फर्क बचपन में ही खत्म हो जाए। उसका उद्देश्य स्पष्ट था—शिक्षा को सामाजिक समानता का औजार बनाना। लेकिन उस रिपोर्ट को लागू करने का साहस किसी सरकार ने नहीं किया, क्योंकि इसका पहला असर सत्ता में बैठे वर्ग की सुविधाओं पर पड़ता।
आयोग की रिपोर्ट कागज़ों में दबा दी गई और निजी शिक्षा को पनपने दिया गया।
इसके बाद भी शिक्षा सुधार के नाम पर समितियाँ बनती रहीं, रिपोर्टें आती रहीं, लेकिन मूल ढांचा नहीं बदला। सरकारी स्कूलों को जानबूझकर कमजोर रखा गया—कभी शिक्षक नहीं, कभी भवन नहीं, कभी संसाधन नहीं। फिर इसी कमजोरी को बहाना बनाकर कहा गया कि “बच्चे नहीं आ रहे हैं।” यह सुधार नहीं, सुनियोजित पतन की नीति थी।
नई शिक्षा नीति 2020 से यह उम्मीद की गई थी कि यह व्यवस्था की जड़ों पर वार करेगी। नीति के उद्देश्यों में लिखा गया—समग्र विकास, रटंत से मुक्ति, कौशल आधारित शिक्षा, मातृभाषा में पढ़ाई, समान अवसर। लेकिन व्यवहार में इस नीति ने सत्ता, प्रशासन और न्यायपालिका के बच्चों को सरकारी स्कूलों से जोड़ने का कोई नैतिक या कानूनी दबाव नहीं बनाया।
उल्टा यह हुआ कि प्राथमिक विद्यालय बंद किए गए, उन्हें “कंपोजिट स्कूल” के नाम पर समेट दिया गया और गाँव-मोहल्ले से स्कूल की दूरी और बढ़ा दी गई। जिसे सुधार कहा गया, वह वास्तव में सरकारी शिक्षा से पीछे हटने की प्रक्रिया बन गई।
यह एक कड़वा तथ्य है कि आज भी जिन क्षेत्रों में सबसे अधिक सुधार की जरूरत है—प्राथमिक शिक्षा, सरकारी स्कूल, आंगनबाड़ी—वहीं सबसे कम संसाधन और सबसे कम गंभीरता है। दूसरी ओर, जिन वर्गों के पास साधन हैं, वही नीति निर्माण, प्रशासन और न्याय में हावी हैं। यही कारण है कि बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार और असमानता खत्म नहीं हो रही। शिक्षा जब अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग होगी, तो समाज एक-सा कैसे होगा?
दुनिया के विकसित देशों ने यह बात बहुत पहले समझ ली थी। वहाँ मंत्री, अधिकारी और आम नागरिक एक ही तरह की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। इसलिए वहाँ सरकारी स्कूल “गरीबों के स्कूल” नहीं कहलाते, बल्कि गुणवत्ता के मानक होते हैं। भारत में हमने ठीक इसका उलटा किया—सरकारी स्कूल को गरीब के लिए छोड़ दिया और सत्ता वर्ग निजी स्कूलों में शरण लेकर सुधार का उपदेश देता रहा।
इसी पृष्ठभूमि में चित्रकूट का उदाहरण चुभता है। यह उदाहरण बताता है कि समस्या संसाधनों की नहीं, नीयत की है। अगर एक जिलाधिकारी ऐसा कर सकता है, तो बाकी क्यों नहीं? और अगर बाकी नहीं करते, तो यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता भर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति अविश्वास का सार्वजनिक स्वीकारोक्ति है, जिसे वे खुद चला रहे हैं। यही कारण है कि यह स्थिति केवल अफसोसजनक नहीं, बल्कि लज्जाजनक है।
यह लेख किसी व्यक्ति को महिमामंडित करने के लिए नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा करने के लिए है। शिक्षा सुधार तब तक खोखला नारा रहेगा, जब तक शासन-प्रशासन-न्यायपालिका के शीर्ष पदों पर बैठे लोग अपने बच्चों को उसी सरकारी व्यवस्था में पढ़ाने को तैयार नहीं होंगे, जिसे वे आम जनता के लिए पर्याप्त बताते हैं।
चित्रकूट की घटना हमें यह नहीं सिखाती कि सब कुछ ठीक हो गया है; यह हमें यह याद दिलाती है कि बाकी सब कुछ अब भी गलत है—और जब तक यह दोहरापन खत्म नहीं होगा, तब तक हर नई नीति, हर नया आयोग और हर नया सुधार केवल शब्दों का शोर बना रहेगा।
(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।)