हुंह, कानून ही तो है!’

‘कोई जाति का सवाल तो नहीं उठाता, लेकिन भेदभाव करते हैं,’ करीब बाइस साल की उस लड़की के चेहरे पर जितनी गंभीरता थी, उतनी ही मायूसी भी थी। बात छिड़ी यूजीसी से जुड़े नए कानून की जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा रखी है। उसका कहना था कि आजकल जब भी इंस्टा (इंस्टाग्राम) खोलो, लोग यह कहते मिल जाते हैं कि यूजीसी कानून लाकर सरकार ने बहुत घटिया काम किया है। तो मैं जानना चाहती हूं कि ये यूजीसी कानून है क्या?

आज की तारीख में यह सवाल किसी भी नौजवान लड़के या लड़की के मन में उठ सकता है, लेकिन इस लड़की के साथ खास बात यह है कि खबर या सूचना के ज्यादातर प्रामाणिक स्रोत उसकी पहुंच से बाहर हैं। अखबार घर पर आता नहीं, खरीद भी ले तो पढ़ नहीं सकती, क्योंकि अक्षर ज्ञान नहीं है। टीवी घर पर है, लेकिन वहां न्यूज देखना किसी की प्राथमिकता में नहीं। ले-देकर उसके हिस्से में मोबाइल ही एक ऐसा टूल है जिसका इस्तेमाल करते हुए वह देश-दुनिया से जुड़ी रह सकती है।

मगर यहां भी, वाट्सऐप के मैसेजेस और इंस्टा के रील जैसे ज्ञान के दुश्मन बने हुए हैं। इन सबके बावजूद अगर उसने इतनी जिज्ञासा बचा रखी है कि पड़ोस की टीचर दीदी के पास कभी-कभार वक्त निकाल कर बैठती है और उससे उन मुद्दों को समझने का प्रयास करती है जो उसे उलझा देते हैं तो इसे मामूली बात तो नहीं कह सकते।

सो, यह गैर-मामूली बातचीत टीचर दीदी और उस लड़की के बीच चली, जो दिल्ली-एनसीआर की एक बस्ती में रहती और आसपास की कोठियों में झाड़ू-पोछा का काम करते हुए घर चलाने में मां-पिता की मदद भी करती है। यूजीसी के नए कानून को लेकर शुरू हुआ हालिया विवाद तो टीचर दीदी ने समझा दिया, पर उसे यह समझ में नहीं आया कि इस कानून को लेकर लोग इतने गुस्से में क्यों दिख रहे हैं? गुस्सा तो उसे आना चाहिए जिसे बेवजह गाली सुननी पड़ती है, जिसके साथ भेदभाव किया जाता है।

और ऐसे लोगों का गुस्सा कानून की मांग करेगा। पर यहां तो लोग इस बात पर आग बबूला हैं कि भेदभाव रोकने वाला कानून क्यों बना दिया गया।

इस जिज्ञासा के जवाब में टीचर दीदी का जो स्पष्टीकरण था, उसमें जाति का सवाल प्रमुखता से आया। यहां इस लड़की के अपने जीवनानुभव का सीधा मेल नहीं बैठ रहा था। उससे उसके आसपड़ोस या कामकाज की दुनिया में किसी ने कभी सीधे तौर पर जाति नहीं पूछी, फिर भी भेदभाव का दंश उसे अच्छी तरह मालूम था। उसने बताया, कुछ पूछे बगैर ही वे मुझे अपने से नीचा मान लेते हैं।

एकाध घरों में इज्जत देते हैं, वहां मैं भैया-दीदी वगैरह के साथ कुर्सी, सोफा, पलंग जहां चाहूं बैठ सकती हूं, जो चाहे खा सकती हूं, लेकिन ज्यादातर घरों में अंदर घुसते ही पता चल जाता है कि यह मेरी दुनिया नहीं है। कई बार तो फर्श पर बैठने को कहते हैं, चाय वगैरह भी दूसरी कप या ग्लास में देते हैं…

टीचर दीदी इस पर उबल पड़ीं, ‘अरे क्यों बर्दाश्त करती हो ऐसा? ये तो कानूनन गलत है, संविधान के बिल्कुल खिलाफ है इस तरह का बर्ताव…’

‘दीदी, कानून-संविधान तो पता नहीं, लेकिन ये तो मैं जानती हूं कि अगर एक बार भी कुछ बोलूं तो खड़े-खड़े निकाल देंगे। जो हजार-दो हजार मिलता है महीने का, वह तो बंद होगा ही, हो सकता है चोरी का इल्जाम भी लग जाए उसी समय। और फिर दूसरी कोठियों में काम मिलना और भी मुश्किल। पता नहीं यूजीसी कानून में ऐसा क्या है कि लोग इतना खौफ खा रहे हैं।’

(संलग्न रेखाचित्र एआई की मदद से)

(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)

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