महिला आंदोलन दशकों और सदियों की राजनीतिक रवानगी में दुनिया भर में अलग-अलग मुक़ाम पर पहुंचा है। इसका कोई एक ढांचा नहीं है, जो समूची दुनिया में एक साथ लागू हुआ हो। इसके इतिहास की अपनी दरारें हैं और समाज की अपनी ज़िद।
ईरान की बात करते हुए हमें यह याद रखना चाहिए कि 1979 की ईरानी क्रांति के बाद वहां का जब पूरा राजनीतिक-सामाजिक ढांचा बदला, तो कई सारे क़ानून बनाए गए, जो महिला अधिकारों के ख़िलाफ़ जाते हैं, लेकिन किन सूरतेहाल में बदला यह भी देखना चाहिए।
ईरान पर बाद में आएंगे, पहले अमेरिका का एक किस्सा दोबारा सुनिए। एडवर्ड बर्नेज का नाम सुने हैं? मशहूर सिग्मंड फ़्रायड उनके मामा भी थे और फूफा भी। बर्नेज़ को पब्लिक रिलेशंस का जनक माना जाता है। तो कहानी ये है कि 1920 के दशक में जॉर्ज वाशिंगटन हिल ‘अमेरिकन टोबैको कंपनी’ के अध्यक्ष थे। कंपनी को लगा कि सिगरेट की बिक्री और ज़्यादा बढ़ाई जा सकती है। हिल ने बर्नेज़ को हायर कर लिया।
अमेरिका में मनोविश्लेषक उस वक़्त महिलाओं की आदतों पर शोध कर रहे थे। मनोविश्लेषक अब्राहम ब्रिल ने कहा था कि महिलाओं के भीतर सिगरेट पीने की दमित इच्छा रहती है, लेकिन सामाजिक दबाव के चलते वो खुले तौर पर ऐसा नहीं कर पाती।
बर्नेज़ मनोविज्ञान जानते थे और जनसंपर्क के उस्ताद तो ख़ैर थे ही। बर्नेज़ ने न्यूयॉर्क के एक महिला संगठन से संपर्क किया। कहा कि अगर ईस्टर डे परेड पर महिलाएं सड़क पर सिगरेट पीती हुईं निकलेंगी तो ये पितृसत्ता के लिए बड़ा झटका साबित होगा। स्त्रीवादी समूह को बात जंच गई। न्यूयॉर्क में बड़ा परेड निकला। सबके हाथों में जलती हुई सिगरेट थी।
बर्नेज़ ने अख़बारों में ख़बर छपवा दी, “टॉर्च ऑफ़ लिबर्टी ब्रिगेड”।
सिगरेट रातों-रात उदारता का पर्याय बन गई और ये परेड महिला अधिकार का पोस्टर। सिगरेट की बिक्री बढ़ गई। हिल ने जिस काम के लिए बर्नेज़ को हायर किया, वो सफ़ल रहा।
बुनियाद में जाएंगे, तो इसने वाक़ई स्त्री अधिकार को एक सीढ़ी ऊपर चढ़ाया कि हम अपनी मर्ज़ी से जीएंगे, लेकिन बड़े खेल में जाएंगे, तो सब कुछ बर्नेज का रचा हुआ दिखेगा।
ईरान पर आते हैं। इस्लामिक क्रांति के समय तर्क यह दिया गया कि शाह के समय का तेज़ पश्चिमीकरण, समाज को उसकी इस्लामी-सांस्कृतिक जड़ों से काट रहा है। हिजाब को महज़ कपड़ा नहीं, प्रतिरोध का प्रतीक कहा गया, पश्चिमी प्रभुत्व के बरक्स अपनी पहचान का दावा। यह दृष्टि उदार लोकतांत्रिक सोच से अलग थी, लेकिन इस्लामिक क्रांति की विचारधारा में इसे वैधता मिली।
इस ढांचे के भीतर सख़्ती भी थी, निगरानी भी। लेकिन तस्वीर का एक दूसरा सिरा भी है। इन्हीं दशकों में स्वाभाविक तौर पर दुनिया के ज़्यादातर मुल्कों की तरह वहां भी महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ी, विश्वविद्यालयों में उनकी मौजूदगी आम हुई, चिकित्सा, विज्ञान, सिनेमा, और खेल में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की। इन्हीं दौर में महिलाओं ने वहां पर अपने अधिकारों को लेकर पहले के मुक़ाबले कहीं सख़्ती से आवाज़ उठाई।
वहां पर महिलाएं लड़ रही हैं, जैसा हर जगह लड़ती रही हैं। यूरोप में मताधिकार आंदोलन सौ साल पहले सड़कों पर लाठियां खा रहा था। अमेरिका में नस्ल और जेंडर का सवाल आज भी खुला हुआ है। पश्चिम एशिया में राजनीतिक इस्लाम की अपनी जटिलताएं हैं, दक्षिण एशिया में परंपरा और आधुनिकता का घर्षण जारी है।
जब हम किसी दूसरे मुल्क की महिलाओं के नाम पर शोक या रोष ज़ाहिर करते हैं, तो संवेदना ज़रूरी है, लेकिन संदर्भ उससे भी ज़्यादा। वहां की सत्ता-संरचना, वहां का इतिहास, वहां की भू-राजनीति, वहां का सामाजिक ढांचा।
खामनेई की हत्या के बाद कुछ लोग इन सभी संदर्भों से हटकर सिर्फ़ नारे की शक्ल में कुछ बातें उछालते हुए उन लोगों को गरिया रहे हैं, जो साम्राज्यवादी नंगई में खामनेई की हत्या के बाद ईरान और खामनेई के पक्ष में बोल रहे हैं।
ईरान पर हमला भू-राजनीतिक है, लेकिन आंतरिक सामाजिक मुद्दों को उठाकर किन भू-राजनीतिक नैरेटिव को ताक़त दी जा रही है? किन शक्तियों की हरक़तों को परोक्ष रूप से जायज़ ठहराया जा रहा है?
(दिलीप खान की यह पोस्ट उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)