अमेरिका में बच्चों के यौन अपराधी के रूप में कुख्यात वित्तीय कारोबारी जेफ्री एप्सटीन से जुड़ी नई फाइलों के सार्वजनिक होने के बाद अमेरिकी सत्ता, राजनीति और अभिजात सामाजिक नेटवर्क के भीतर मौजूद गहरे और असहज संबंधों पर फिर से बहस तेज हो गई है। इन दस्तावेजों में दर्ज एक महिला का बयान, जिसमें उसने डोनाल्ड ट्रंप पर यौन हमले का आरोप लगाया है, इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बना देता है।
यह मामला केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ आरोप का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस व्यापक सत्ता संरचना की ओर इशारा करता है जिसमें धन, राजनीतिक प्रभाव और सामाजिक प्रतिष्ठा अक्सर न्यायिक जवाबदेही से ऊपर दिखाई देने लगते हैं।
एफबीआई के दस्तावेजों में दर्ज महिला का कहना है कि किशोरावस्था के दौरान उसकी मुलाकात एप्स्टीन ने ट्रंप से कराई थी और उसी दौरान उसके साथ यौन हमला हुआ। हालांकि इन दस्तावेजों में महिला की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इस तरह की गवाही यह संकेत देती है कि एप्स्टीन का नेटवर्क केवल व्यक्तिगत अपराध का मामला नहीं था, बल्कि संभवतः एक संगठित शोषण तंत्र था जिसमें प्रभावशाली और शक्तिशाली लोगों के साथ उसके रिश्ते एक केंद्रीय भूमिका निभाते थे।
एप्स्टीन लंबे समय तक वैश्विक वित्तीय अभिजात वर्ग, राजनेताओं और बड़े कारोबारी घरानों के बीच सहजता से घूमता रहा। उसकी पार्टियों और निजी आयोजनों में सत्ता और पूंजी की दुनिया के अनेक बड़े नाम दिखाई देते थे। यह स्थिति अपने आप में इस सवाल को जन्म देती है कि आखिर इतने लंबे समय तक उसके अपराधों की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने क्यों नहीं आई या यदि आई तो उस पर निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हो पाई।
ट्रंप और एप्स्टीन के बीच संबंधों का इतिहास भी इसी संदर्भ में चर्चा का विषय बनता है। 1990 और 2000 के दशक में दोनों के बीच सामाजिक संबंध रहे हैं और कई तस्वीरों तथा आयोजनों में दोनों को साथ देखा गया है। ट्रंप स्वयं यह स्वीकार कर चुके हैं कि उनकी दोस्ती एप्स्टीन से रही थी, हालांकि उनका दावा है कि 2000 के दशक के मध्य में यह संबंध समाप्त हो गया था और उन्हें एप्स्टीन के यौन अपराधों की कोई जानकारी नहीं थी।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि इतने लंबे समय तक निकट सामाजिक संपर्क के बावजूद अपराधों की भनक तक न होना सहज विश्वास का विषय नहीं है। यही कारण है कि जब भी एप्स्टीन से जुड़े दस्तावेज सामने आते हैं तो ट्रंप सहित कई प्रभावशाली लोगों के पुराने संबंधों पर सवाल फिर से उठने लगते हैं।
यह पूरा प्रकरण अमेरिकी न्याय व्यवस्था और राजनीतिक संस्कृति पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। 2008 में एप्स्टीन को जो अपेक्षाकृत हल्की सजा मिली थी, वह पहले ही व्यापक आलोचना का विषय बन चुकी है। अनेक कानूनी विशेषज्ञों और पत्रकारों ने उस समय यह सवाल उठाया था कि यदि एप्स्टीन किसी सामान्य सामाजिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति होता, तो क्या उसे इतनी रियायत मिलती।
बाद में 2019 में उसकी फिर से गिरफ्तारी हुई, लेकिन उसी वर्ष जेल में उसकी रहस्यमय मौत ने मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया। उसकी मौत ने यह आशंका भी पैदा की कि उसके साथ जुड़े प्रभावशाली लोगों के नाम और उनके संभावित अपराध कभी पूरी तरह सामने नहीं आ पाएंगे।
नई फाइलों का सामने आना इस संभावना को फिर जीवित करता है कि एप्स्टीन नेटवर्क की परतें अभी पूरी तरह खुली नहीं हैं। यह भी संभव है कि अनेक पीड़ितों की गवाही और महत्वपूर्ण दस्तावेज वर्षों तक सार्वजनिक नहीं किए गए हों। यदि ऐसा है तो यह केवल किसी एक व्यक्ति की विफलता नहीं बल्कि पूरे संस्थागत ढांचे की कमजोरी को दर्शाता है, जहां सत्ता और प्रभाव न्यायिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
यही कारण है कि यह मामला केवल कानूनी जांच का विषय नहीं रह जाता बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से भी जुड़ जाता है।
अमेरिकी राजनीति की गहरी ध्रुवीकृत स्थिति इस प्रकरण को और जटिल बना देती है। ट्रंप के समर्थक ऐसे आरोपों को अक्सर राजनीतिक साजिश या तथाकथित “डीप स्टेट” की चाल के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि उनके विरोधी इसे उनके राजनीतिक और नैतिक चरित्र पर गंभीर प्रश्न के रूप में देखते हैं।
इस तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अक्सर मूल प्रश्न—यानी पीड़ितों के लिए न्याय और सत्य की निष्पक्ष खोज—पृष्ठभूमि में चला जाता है। मीडिया का एक हिस्सा भी इस मुद्दे को या तो सनसनीखेज खबर में बदल देता है या फिर अपने राजनीतिक झुकाव के अनुसार उसका चयनात्मक इस्तेमाल करता है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक वैश्विक आयाम भी है। अमेरिका स्वयं को लोकतंत्र, मानवाधिकार और नैतिक मूल्यों का सबसे बड़ा समर्थक बताता रहा है। लेकिन जब उसके सर्वोच्च पदों पर बैठे नेताओं या उनसे जुड़े प्रभावशाली व्यक्तियों पर इस तरह के आरोप सामने आते हैं और उनकी निष्पक्ष जांच को लेकर संदेह पैदा होता है, तो इससे उसकी नैतिक विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है।
दुनिया के अनेक देशों में पहले से ही यह धारणा मौजूद है कि वैश्विक सत्ता संरचना में प्रभावशाली लोगों के लिए कानून और न्याय की व्यवस्था अक्सर अलग तरीके से काम करती है।
इसलिए एप्स्टीन फाइलों का जारी होना केवल एक पुराने अपराध की कहानी को दोहराना नहीं है, बल्कि यह उस गहरे प्रश्न को फिर सामने लाता है कि आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता, धन और प्रभाव के सामने न्याय की वास्तविक क्षमता कितनी मजबूत है। ट्रंप पर लगे आरोपों की सच्चाई अंततः स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकती है, लेकिन यह प्रकरण पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि केवल व्यक्तियों की जांच पर्याप्त नहीं है।
आवश्यकता उस पूरी सत्ता संरचना की जांच की है जिसमें प्रभावशाली लोगों के लिए जवाबदेही अक्सर कमजोर पड़ जाती है। जब तक यह सुनिश्चित नहीं होता कि सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी कानून के सामने समान रूप से जवाबदेह हैं, तब तक लोकतंत्र की नैतिकता और उसकी विश्वसनीयता दोनों अधूरी ही मानी जाएंगी।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकलिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)