रात के सन्नाटे में उठे किसी एक प्रश्न की तरह यह पूरा विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ था। उसके पीछे वर्षों से जमा होती बहसें थीं—पत्रकारिता की खोजी रिपोर्टें, वकीलों के बयान, अदालतों में चली कार्यवाहियाँ, और लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था मानी जाने वाली न्यायपालिका की पारदर्शिता पर उठते प्रश्न।
जब भी न्यायपालिका के बारे में कोई चर्चा होती है तो वह सामान्य राजनीतिक बहस नहीं रहती, क्योंकि न्यायपालिका केवल एक संस्था नहीं बल्कि संविधान की उस आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है जिस पर पूरा गणराज्य खड़ा है। यही कारण है कि जब किसी वकील, पत्रकार या शोधकर्ता ने न्यायिक व्यवस्था की चुनौतियों या आरोपों की चर्चा की, तो वह तुरंत राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गई।
पिछले तीन दशकों में यह बहस कई अलग-अलग घटनाओं से गुजरती हुई आगे बढ़ी—कभी अदालतों के भीतर, कभी संसद में, और कभी पत्रिकाओं और मीडिया की रिपोर्टों में।
1993 में भारत की न्यायिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब सुप्रीम कोर्ट ने उस ऐतिहासिक फैसले में, जिसे आम तौर पर “सेकंड जजेज केस” कहा जाता है, न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को नया स्वरूप दिया। इस फैसले के बाद कॉलेजियम सिस्टम अस्तित्व में आई, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों का समूह उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के लिए नियुक्तियों की सिफारिश करता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कार्यपालिका के संभावित प्रभाव से सुरक्षित रखना था। लेकिन जैसे-जैसे यह प्रणाली लागू होती गई, वैसे-वैसे इसके बारे में अलग-अलग विचार सामने आने लगे। कुछ लोगों ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता की मजबूत ढाल कहा, जबकि कुछ विशेषज्ञों ने यह प्रश्न उठाया कि यदि नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया गोपनीय रहेगी तो पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठेंगे।
1990 के दशक के बाद न्यायपालिका के बारे में सार्वजनिक बहसों में एक नया मोड़ तब आया जब अलग-अलग पत्रकारों और लेखकों ने न्यायिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर शोध आधारित लेख लिखने शुरू किए। इस क्रम में खोजी पत्रकारिता की कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने न्यायपालिका से जुड़े विवादों और आरोपों की चर्चा की।
उदाहरण के लिए खोजी पत्रिका तहलका ने कई वर्षों तक विभिन्न सार्वजनिक संस्थाओं पर विस्तृत रिपोर्टें प्रकाशित कीं। इसी पत्रिका को 2009 में दिए गए एक इंटरव्यू में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने वह बयान दिया जिसने राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा था कि उनके विचार में पिछले सोलह या सत्रह मुख्य न्यायाधीशों में से लगभग आधे पर भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं। यह बयान तुरंत ही व्यापक चर्चा का विषय बन गया।
इस बयान के बाद मामला अदालत तक पहुँचा और सर्वोच्च न्यायालय में उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू हुई। अदालत ने उनसे पूछा कि वे अपने कथन के समर्थन में क्या आधार प्रस्तुत कर सकते हैं। इसी दौरान उनके पिता, पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने भी अदालत में हस्तक्षेप करते हुए एक सीलबंद सूची प्रस्तुत की जिसमें उन मुख्य न्यायाधीशों के नाम बताए गए थे जिनके बारे में उन्होंने संदेह व्यक्त किया था।
उस सूची को सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन इस घटना ने न्यायपालिका की पारदर्शिता को लेकर बहस को और तेज कर दिया। अदालत की कार्यवाही में यह भी कहा गया कि न्यायपालिका के बारे में लगाए गए आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि वे संस्थागत विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं।
इसी समय पत्रकारिता जगत में भी न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर विस्तृत विश्लेषण सामने आए। उदाहरण के लिए खोजी पत्रकारिता के लिए प्रसिद्ध पत्रिका कारवाँ में लेखक अतुल देव ने जुलाई 2019 के अंक में एक लंबा लेख प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था “इन सुआ कॉसा” इस लेख में उन्होंने न्यायपालिका और कॉलेजियम सिस्टम की पृष्ठभूमि का विस्तृत विश्लेषण किया।
लेख में विभिन्न मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल के दौरान उठे विवादों और आरोपों का उल्लेख करते हुए यह बताया गया कि 1990 के दशक के बाद न्यायपालिका से जुड़े कई मामलों ने सार्वजनिक चर्चा को जन्म दिया। लेख में यह भी कहा गया कि न्यायिक संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल उनके संवैधानिक अधिकार से नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास से भी बनती है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी भारत की न्यायपालिका पर समय-समय पर चर्चा होती रही है। जर्मनी के सार्वजनिक प्रसारक डॉयचे वेले ने कई रिपोर्टों में भारतीय न्यायपालिका की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। इन रिपोर्टों में यह बताया गया कि विभिन्न समय पर अलग-अलग न्यायाधीशों या न्यायिक अधिकारियों पर आरोप लगाए गए, हालांकि उनमें से कई मामलों में अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचना कठिन रहा।
इस प्रकार की रिपोर्टें यह दिखाती हैं कि लोकतांत्रिक देशों में न्यायपालिका पर चर्चा केवल घरेलू मुद्दा नहीं रहती बल्कि अंतरराष्ट्रीय विमर्श का भी हिस्सा बन जाती है।
इसी बीच न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और चुनौतियों पर बहस का एक नया अध्याय 2026 में सामने आया जब एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक एक्सप्लोरिंग सोसाइटी : इंडिया एंड बियोंड – वॉल्यूम 2 सार्वजनिक विवाद का केंद्र बन गई।
इस पुस्तक में न्यायिक व्यवस्था की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा गया था कि न्यायपालिका के सामने कई समस्याएँ हैं—मामलों का भारी लंबित बोझ, न्यायाधीशों की संख्या की कमी, और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों की चर्चा। यह सामग्री सामने आते ही राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हो गई।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। फरवरी 2026 में अदालत की पीठ ने, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत कर रहे थे, इस पुस्तक के आगे के प्रकाशन और प्रसार पर रोक लगाने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि पुस्तक की भाषा न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित कर सकती है और इसलिए इस पर विस्तृत जांच आवश्यक है।
अदालत ने एनसीईआरटी के अधिकारियों से स्पष्टीकरण भी मांगा और यह जानने का प्रयास किया कि पुस्तक के उस अध्याय को किस प्रक्रिया के तहत तैयार किया गया था।
इस घटनाक्रम पर सरकार की प्रतिक्रिया भी सामने आई। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सार्वजनिक रूप से कहा कि सरकार न्यायपालिका का सम्मान करती है और इस मामले की जांच की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि विवादित अध्याय की समीक्षा की जाएगी और यदि उसमें किसी प्रकार की त्रुटि पाई जाती है तो उसे संशोधित किया जाएगा। इसके बाद एनसीईआरटी ने पुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा लिया और यह घोषणा की कि अध्याय को नए सिरे से तैयार किया जाएगा।
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक पाठ्यपुस्तक का विवाद नहीं था। इसने एक व्यापक प्रश्न को जन्म दिया—लोकतांत्रिक समाज में संस्थाओं के बारे में आलोचनात्मक चर्चा की सीमा क्या होनी चाहिए। क्या छात्रों को न्यायपालिका की चुनौतियों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए, या ऐसी चर्चा केवल विशेषज्ञों और कानूनी मंचों तक सीमित रहनी चाहिए।
इस बहस में अलग-अलग मत सामने आए। कुछ विशेषज्ञों का कहना था कि लोकतंत्र में संस्थाओं की चुनौतियों को समझना शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए, जबकि अन्य लोगों ने कहा कि पाठ्यपुस्तकों में संस्थाओं का उल्लेख अत्यधिक सावधानी और संतुलन के साथ किया जाना चाहिए।
न्यायपालिका की नियुक्ति-प्रणाली को लेकर भी बहस लगातार जारी रही है। कॉलेजियम सिस्टम के समर्थकों का कहना है कि यह व्यवस्था न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करती है। दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि नियुक्ति-प्रक्रिया के कारणों को अधिक स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए। कई बार यह भी कहा गया कि पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नियुक्तियों से संबंधित जानकारी और मानदंडों को सार्वजनिक करना आवश्यक है।
इन सभी घटनाओं को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत में न्यायपालिका को लेकर चल रही बहस केवल आरोपों या विवादों की कहानी नहीं है। यह उस व्यापक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें संस्थाओं की भूमिका, उनकी पारदर्शिता और उनकी जवाबदेही पर लगातार चर्चा होती रहती है। लोकतंत्र में संस्थाओं की प्रतिष्ठा केवल उनके अधिकार से नहीं बल्कि उस विश्वास से बनती है जो जनता उनके प्रति महसूस करती है।
जब किसी संस्था के बारे में कठिन प्रश्न उठते हैं तो वह केवल आलोचना नहीं होती; वह लोकतंत्र के भीतर चल रही आत्म-परीक्षा का हिस्सा होती है। न्यायपालिका ने भारत के संवैधानिक इतिहास में अनेक ऐतिहासिक फैसलों के माध्यम से नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की है। लेकिन इसके साथ-साथ पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर उठते प्रश्न यह भी याद दिलाते रहते हैं कि किसी भी संस्था की विश्वसनीयता समय-समय पर होने वाले संवाद और सुधार से ही मजबूत होती है।
लोकतंत्र में संस्थाएँ स्थिर नहीं होतीं; वे निरंतर विकसित होती हैं। कभी अदालतों के भीतर, कभी संसद में, और कभी पत्रकारिता की रिपोर्टों में उठते प्रश्न उसी विकास प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। इतिहास बताता है कि किसी भी संस्था की वास्तविक शक्ति उसके अधिकार में नहीं बल्कि उस विश्वास में होती है जो समाज उसके प्रति रखता है। यही विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है—और उसे बनाए रखने के लिए पारदर्शिता, संवाद और जिम्मेदारी तीनों का साथ आवश्यक होता है।
(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स – एलसीपीआर – के संयोजक हैं।)