गढ़वा जिला प्रशासन द्वारा निहत्थे ग्रामीणों पर किया गया लाठीचार्ज वन अधिकार कानून का उल्लंघन, मानवाधिकार हनन : तथ्यान्वेषण दल 

रांची। जिला गढ़वा के रंका प्रखण्ड अंतर्गत ग्राम विश्रामपुर में 7 मार्च को हुई पुलिस लाठीचार्ज की घटना को एक तथ्यान्वेषण दल ने वन अधिकार कानून 2006 का उल्लंघन, पुलिसिया बर्बरता और मानवाधिकार का हनन बताया है।

गढ़वा के होटल कृष्णा हरि में बुधवार, 11 मार्च को अखिल भारतीय आदिवासी महासभा की ओर से आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तथ्य अन्वेषण दल ने कहा कि प्रशासन द्वारा प्रस्तावित शहीद नीलाम्बर-पिताम्बर उत्तर कोयल परियोजना (मण्डल डैम) के लिए ग्रामीणों को उनकी इच्छा के विरुद्ध वनभूमि से विस्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

दल ने घटनास्थल का दौरा कर पीड़ित ग्रामीणों, प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय लोगों से बातचीत की और घटना से सम्बंधित फोटो-वीडियो और समाचार रिपोर्टों का अध्ययन किया है।

घटना के बारे में तथ्यान्वेषण दल ने बताया कि 7 मार्च को दिन के लगभग 11.30 बजे जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी लगभग 40 गाड़ियों के काफिले के साथ विश्रामपुर पंचायत भवन पहुँचे और बन्द कमरे में गोपनीय बैठक की। ग्रामीणों को बैठक में शामिल नहीं होने दिया गया। जब अधिकारियों का काफिला प्रस्तावित पुनर्वास स्थल की ओर बढ़ा तो ग्रामीणों ने केवल यह जानने के लिए रास्ता रोका कि अधिकारी किस उद्देश्य से आए हैं? 

ग्रामीणों में अधिकतर महिलाएँ थीं और वे निहत्थे थी l इसी दौरान पुलिस ने बिना किसी चेतावनी के धक्कामुक्की करते हुए लाठीचार्ज कर दिया। इसका सबसे असंवैधानिक पक्ष यह था कि मौके पर महिला पुलिसकर्मी भी मौजूद नहीं थीं l इस घटना में 14 ग्रामीण घायल हुए, जिनमें महिलाएँ और एक 12 वर्षीय बच्चा भी शामिल है। तीन लोगों को गंभीर चोट लगने के कारण गढ़वा सदर अस्पताल में इलाज कराना पड़ा।

वनाधिकार कानून के उल्लंघन के मुख्य बिंदु पर प्रकाश डालते हुए तथ्यानषण दल ने बताया कि उक्त घटना निम्नलिखित क़ानूनी प्रावधानों का घोर उल्लंघन करती है:

• वन अधिकार कानून 2006 की धारा 3(1)- जो आदिवासी और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनकी पारम्परिक वनभूमि और संसाधनों पर अधिकार प्रदान करती है।

• धारा 4 (5)- जिसके अनुसार वन अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया पूरी होने से पहले किसी भी वन निवासी को उसकी भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता।

• वन अधिकार नियमावली 2008 – जिसके अनुसार वनभूमि से जुड़े मामलों में ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है।

तथ्यान्वेषण दल का कहना है कि ग्राम सभा द्वारा वनभूमि देने से स्पष्ट इनकार किए जाने के बावजूद प्रशासन द्वारा दबाव बनाना कानून की अवहेलना है। पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल पर बताते हुए दल ने कहा कि, निहत्थे ग्रामीणों और महिलाओं पर लाठीचार्ज करना अत्यधिक बल प्रयोग है। महिला पुलिसकर्मियों की अनुपस्थिति में महिलाओं पर बल प्रयोग करना क़ानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है। यह कार्रवाई मानवाधिकारों का गंभीर हनन है।

तथ्यान्वेषण दल ने कुछ प्रमुख मांगे रखी –

1. निहत्थे ग्रामीणों और महिलाओं पर लाठीचार्ज करने वाले दोषी अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ निष्पक्ष जाँच कर कठोर कार्रवाई की जाए। 

2. घायल ग्रामीणों को उचित मुआवजा और बेहत्तर चिकित्सा सुविधा प्रदान की जाए।

3. वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधानों का पालन करते हुए ग्राम सभा की सहमति के बिना किसी भी प्रकार का पुनर्वास या वनभूमि का उपयोग तत्काल रोका जाए।

4. आदिवासी समुदाय के वनाधिकार, आजीविका अधिकार और मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।

तथ्य अन्वेषण दल एवं अखिल भारतीय आदिवासी महासभा ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन द्वारा ग्रामीणों के अधिकारों की अनदेखी कर जबरन पुनर्वास का प्रयास किया गया तो क्षेत्र में व्यापक जनांदोलन खड़ा होगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।

तथ्यान्वेषण टीम के सदस्यगणों में फिलिप कुजूर, केन्द्रीय सचिव-अखिल भारतीय महासभा, सुनील मिंज, केन्द्रीय सदस्य – अखिल भारतीय महासभा, बिश्राम बाखला, 20 सूत्री अध्यक्ष, बड़गड़ प्रखण्ड, माणिकचन्द कोरवा, सामुदायिक वन प्रबंधन फेडेरेशन – गढ़वा, दयाकिशोर मिंज, सदस्य – सामुदायिक वन प्रबंधन फेडेरेशन – गढ़वा, आर्गेन केरकेट्टा, सदस्य – सामुदायिक वन प्रबंधन फेडेरेशन गढ़वा, लखन उराँव, रंका प्रखण्ड अध्यक्ष – अखिल भारतीय महासभा, रामलखन सिंह, ग्राम सभा सदस्य – कर्री ग्राम और कविता सिंह खेरवार, केन्द्रीय सदस्य -अखिल भारतीय महासभा शामिल थे।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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