इस पर ज़ोर देने की जरूरत नहीं है कि इजरायल-अमेरिका -ईरान युद्ध में भारत की प्रतिक्रिया काफी कमज़ोर रही है। सरकार अपनी आज़माई हुई तिकड़मों पर लगी हुई है। एक राष्ट्र के रूप में, भारत की बदली हुई विचारधारात्मक अवस्थिति हमें इजरायल-अमेरिका-ईरान युद्ध को शायद तार्किक रूप से न देखने दे। आखिर, राष्ट्र अपने मूल्यों पर ही टिके होते हैं।
इंग्लैंड, अमेरिका और अधिकतर पश्चिमी देश, लंबे समय तक तथाकथित सभ्यता-निर्माण, “श्वेत आदमियों का बोझ”, मिशनों के लिए जाने गए हैं। इस नारे में ढंका हुआ होने के कारण ही, औपनिवेशिक कपट उन्हें दुनियाभर में की गई लूट और हत्याओं की ग्लानि से मुक्त करता है। दुनिया भर में चले उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों ने पश्चिम के कुशलतापूर्वक निर्मित कपट को बेपर्द और ध्वस्त किया।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में चला भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष इसलिए अद्वितीय है कि इसने एक वैकल्पिक नैरेटिव का निर्माण किया जो प्रभुत्वशाली औपनिवेशिक आदर्शों को चुनौती देता है। भारतीय संघर्ष अहिंसा, समानता और करुणा जैसे महान मूल्यों में रचा बसा है। आरएसएस और उसका हिंदुत्व भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा के बिल्कुल विपरीत रहा है।
हिंदुत्व का दर्शन राष्ट्र-राज्यों और एक प्रजाति, धर्म या समुदाय पर दूसरे की श्रेष्ठता के औपनिवेशिक सिद्धांतों की ही एक दरिद्र नकल है। लेकिन जो बल हिंदुत्व को गति प्रदान करता है वह है समाज के प्रभुत्वशाली तबकों के प्रति उसकी निष्ठा। इसमें क्या अचरज कि हिंदुत्व ताकतें अपने औपनिवेशिक आकाओं के साथ गठजोड़ में हैं। वे ही जमींदारों, सूदखोरों और पूंजिपतियों के संरक्षक थे। हिंदुत्व ताकतों का उनके साथ गठबन्धन स्वाभाविक था।
उपरोक्त समझदारी इस संकट को उचित संदर्भ में व्यक्त करना संभव बनाती है। संकट के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी धर्म का जिक्र करने से बचे हैं, और लोगो की सलामती के बयानों तक ही खुद को सीमित रखा है। ईरान युद्ध के संदर्भ में वे इसे धार्मिक नैरेटिव देने के जोखिम से वाकिफ हैं। ये नैरेटिव पड़ोसी देशों, पाकिस्तान और बांग्लादेश में काम करता है। लेकिन यहां यह काम नहीं करेगा।
हालांकि, आरएसएस मशीनरी इज़राइल के इस्लामोफोबिया के समर्थन में अपनी पूरी शक्ति खर्च कर रही है। लेकिन मोदी का रुख विरोधाभासी है। एक तरफ वे भारत में ऊर्जा संकट की उपस्थिति को नकार रहे हैं और विपक्षियों पर अफवाह फैलाने का आरोप लगा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, उनका कहना है कि हर युद्ध वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करता है, जो बदले में हमें भी प्रभावित करता है। वे यूक्रेन युद्ध का जिक्र कर ये दावा करते हैं कि इसने यूरिया की कीमतों को प्रभावित किया है।
स्पष्टतः, यूक्रेन युद्ध का जिक्र अमेरिकियों को शांत करने के उद्देश्य से किया गया है। यह अमेरिका समर्थक रुख का एक संकेत है। क्या यह भी मोदी का ट्रंप के प्रति कथित समर्पण का उदाहरण है? खाड़ी के देशों पर ईरान के हमले की निंदा करने के लिए बने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव की मोदी सरकार भी सह प्रायोजक थी।
इजरायल-अमेरिका के ईरान पर हमले से ठीक पहले मोदी की इज़रायल यात्रा इजरायल-अमेरिका धुर से मिलने की खुली घोषणा थी। ईरान पर आक्रामकता, डेढ़ सौ स्कूली बच्चियों की हत्या, ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्लाह खमेनेई की हत्या की निंदा से बचना, एक नई नीति की पुष्टि है।
राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने इस संकट का अलग विश्लेषण किया है और प्रधानमंत्री पर इसे पैदा करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि भारतीय हित आज विदेश नीति का मार्गदर्शन नहीं कर रहे हैं। इसकी जड़ में मोदी का ट्रंप के प्रति समर्पण है। इस अभिव्यक्ति की अपनी सीमाएँ हैं। ऐपस्टाइन फाइल्स के कथित असर और उसके नतीजे में मिलने वाला ब्लैकमेल तात्कालिक कारण हो सकते हैं, लेकिन बुनियादी मार्गदर्शक सिद्धांतों का स्रोत हिंदुत्व की विचारधारा ही है।
यह विचारधारा घरेलू स्तर पर प्रभुत्व और असमानता का समर्थन करती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्चस्ववादी और जैनोफोबिक ताकतों के साथ गठबंधन करती है। औपनिवेशिक काल से ही वे ऐसा करते आ रहे हैं। भारत तभी स्वतंत्र विदेश नीति अपना सकता है जब वह विश्व मामलों में वर्चस्व-विरोधी रुख अपनाए। एपस्टीन फाइलों ने भारतीय विदेश नीति के दक्षिणपंथी झुकाव को उजागर किया है।
इससे पता चलता है कि नेतृत्व किस प्रकार ट्रंप सरकार के साथ गठबंधन करने के लिए बेताब था। इससे यह भी पता चलता है कि वह इजरायली गठबंधन में शामिल होने का कितना इच्छुक था। इजरायल एक सैन्यवादी राज्य है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की उसे कोई परवाह नहीं है। गाजा में हुए नरसंहार ने उसका असली चेहरा बेनकाब कर दिया है। इजरायली रक्षा बलों ने अस्पतालों, स्कूलों, शरणार्थी शिविरों और खाद्य वितरण केंद्रों को निशाना बनाया।
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने नेतन्याहू को मानवता के खिलाफ अपराधों का आरोपी घोषित किया है। प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा, ईरान पर हमले से कुछ घंटे पहले हुई, जिसने हमें ईरान-इजरायल युद्ध में घसीट लिया।
पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू, अटल बिहारी वाजपाई के साथ अन्य भी स्वतंत्रता संघर्ष की विचारधारा का सम्मान करते थे। यही कारण था कि वे गुटनिरपेक्ष नीति का पालन करते थे। इस नीति ने संप्रभुता के हनन और नस्लभेद का विरोध और हथियारों की होड़ से परहेज किया। यह नीति एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था का समर्थन करती थी।
महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की इस संबंध में स्पष्ट दृष्टि थी। यह युद्ध के खिलाफ खड़ी रही और कभी भी आक्रमणकारी का पक्ष नहीं लिया।
द्वितीय विश्व युद्ध इसका क्लासिक उदाहरण है। कांग्रेस फासीवाद के विरुद्ध थी। इसने मित्र देशों के प्रति सहानुभूति भी दिखाई। लेकिन इसने ब्रिटिशर्स के युद्ध प्रयासों का बहिष्कार किया। इसने घोषणा की कि स्वतंत्र भारत जापान और जर्मनी की फासीवादी ताकतों के खिलाफ़ लड़ेगा। और ब्रिटिश साम्राज्य के अधीनस्थ राज्य के रूप में नहीं लड़ेगा।
कांग्रेस पार्टी भारतीय राष्ट्र की संप्रभुता और स्वतंत्रता के लिए खड़ी थी। हिंदुत्व ताकतें फासीवाद के साथ सहानुभूति रखती थी, पर फिर भी ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का समर्थन करती थी। इस विरोधाभास पर हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हिंदुत्व के लिए भारतीय राष्ट्र की संप्रभुता के लिए कोई सम्मान नहीं था। उनकी अवस्थिति भारत के प्रभुत्वशाली वर्गों का समर्थन करती थी। युद्ध प्रयासों से उद्योगपतियों को लाभ मिलता था।
बारीकी से देखने पर ये उजागर होता है कि इजरायल पक्षीय अवस्थिति उद्योग धंधों को फायदा पहुंचाती है। हम उन लोगों को जानते हैं जो इजरायल के साथ हमारे रिश्ते से लाभान्वित हो रहे हैं। ऊर्जा संकट आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा रहा है, लेकिन मोदी सरकार की रुचि भारतीय उद्योगपतियों के एक हिस्से को फायदा पहुंचाने में ही है। मोदी के राष्ट्रवाद का मूल में यही है। जरूरत है, अपने राष्ट्रवाद की पुनः खोज करने की।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और राजनीति, समाज, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर लिखते हैं। मूल अंग्रेज़ी में लिखा उनका यह लेख बिज़बज़ से साभार। अनुवाद : शुभम रौतेला। मूल अंग्रेजी लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)