इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रयागराज पॉक्सो मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अग्रिम जमानत दी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आज प्रयागराज पाक्सो  मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को अग्रिम जमानत दे दी है। इससे पहले 27 फरवरी को जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की पीठ ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया था और निर्देश दिया था कि अंतिम फैसला होने तक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य की गिरफ्तारी न की जाए।

इसके साथ ही कोर्ट ने आवेदकों, पीड़ितों और शिकायतकर्ता तीनों पक्षों को इस मामले के लंबित रहने तक मीडिया में कोई भी साक्षात्कार देने पर रोक लगा दी है।

गौरतलब है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर पाक्सो  एक्ट और भारतीय न्याय संहिता के तहत आरोप लगाए गए हैं। उन पर आरोप है कि प्रयागराज में आयोजित हालिया माघ मेला के दौरान नाबालिगों के साथ यौन शोषण किया गया।

इस मामले में एफआईआर फरवरी को प्रयागराज के झूंसी थाना में रात 11:37 बजे दर्ज की गई थी। यह एफआईआर प्रयागराज की विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा संबंधित थाना प्रभारी को तत्काल मामला दर्ज करने के निर्देश देने के कुछ घंटों बाद दर्ज हुई। एफआईआर में में पॉक्सो एक्ट की धाराएं 3, 5(l), 4(2), 6, 16, 17 और 51 शामिल हैं। इनमें धारा 5(l) सहपठित धारा 6 के तहत नाबालिग के साथ गंभीर यौन उत्पीड़न के लिए न्यूनतम 20 साल की सजा, जो आजीवन कारावास तक बढ़ सकती है, का प्रावधान है।

आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने इस मामले में विशेष न्यायाधीश का दरवाजा खटखटाया था, यह आरोप लगाते हुए कि स्थानीय पुलिस ने पहले दी गई शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की।

शिकायत में कहा गया है कि दो नाबालिग—एक लगभग 14 वर्ष की और दूसरी 17 वर्ष 6 महीने की—को माघ मेला 2025-26 के दौरान आरोपियों द्वारा यौन शोषण का शिकार बनाया गया। यह भी आरोप है कि यह कृत्य धार्मिक सेवा और शिष्यत्व के नाम पर किए गए।

27 फरवरी को न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया था और निर्देश दिया था कि अग्रिम जमानत आवेदन के अंतिम निपटारे तक अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में डॉक्टर ने अनिर्णायक राय दी है कि यौन हमले की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। एफएसएल रिपोर्ट मांगी गई है। इससे स्पष्ट होता है कि डॉक्टर की ओर से पीड़ित पर यौन उत्पीड़न की बात नहीं कही गई है। हाईकोर्ट ने विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि की धारणा आरोप तय होने से पहले जमानत के चरण में लागू नहीं की जा सकती।

अदालत ने यह भी माना कि विशेष परिस्थितियों में आवेदक अग्रिम जमानत के लिए सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं, भले ही उन्होंने पहले सत्र न्यायालय में आवेदन न किया हो। इसी के साथ कोर्ट ने दोनों आवेदकों को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और दो प्रतिभूतियों पर अग्रिम जमानत दे दी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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