लेबनान, ग़ाज़ा और वैश्विक राजनीति का नया परिदृश्य

हाल के घटनाक्रम में चीन द्वारा इज़राइल से तत्काल लेबनान से हटने की मांग की है और यह टिप्पणी की कि “लेबनान को दूसरा ग़ाज़ा नहीं बनना चाहिए”, केवल एक कूटनीतिक बयान भर नहीं है। यह वैश्विक शक्ति-राजनीति में चीन की बढ़ती सक्रियता, नैरेटिव-निर्माण की कोशिश और पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने की एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।

चीन ने अपने बयान में “ग़ाज़ा की दुखद घटना” का उल्लेख करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उसे दोहराने से रोकने की अपील की। पहली दृष्टि में यह मानवीय चिंता का स्वर लगता है, किंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भाषा अक्सर रणनीति का माध्यम होती है। “ग़ाज़ा” का संदर्भ यहाँ केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक प्रतीक है—विनाश, मानवीय संकट और वैश्विक असहमति का।

चीन इस प्रतीक का उपयोग कर एक नैतिक उच्चभूमि ग्रहण करने की कोशिश करता दिखता है, जिससे वह स्वयं को शांति और संतुलन का पक्षधर प्रदर्शित कर सके।

पारंपरिक रूप से मध्य-पूर्व की राजनीति में संयुक्त राज्य अमेरिका का वर्चस्व रहा है, जो इज़राइल का प्रमुख समर्थक रहा है। ऐसे में चीन का यह हस्तक्षेप एक वैकल्पिक वैश्विक आवाज़ प्रस्तुत करता है। यह रुख न केवल अमेरिका की नीतियों पर अप्रत्यक्ष प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि वैश्विक संकटों में अब एकध्रुवीय व्यवस्था की जगह बहुध्रुवीय व्यवस्था आकार ले रही है।

लेबनान लंबे समय से क्षेत्रीय संघर्षों का केंद्र रहा है। हिज़्बुल्लाह और इज़राइल के बीच तनाव, तथा ईरान की इसमें अप्रत्यक्ष भूमिका, इसे और जटिल बनाते हैं। यदि यहाँ संघर्ष बढ़ता है, तो यह एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है, जिसमें कई शक्तियाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल होंगी। चीन का बयान इस संभावित विस्तार को रोकने की कूटनीतिक कोशिश भी हो सकता है—या कम से कम ऐसा दिखाने का प्रयास।

पिछले दशक में चीन ने मध्य-पूर्व में अपनी उपस्थिति मुख्यतः आर्थिक निवेश और ऊर्जा सुरक्षा के माध्यम से बढ़ाई थी। किंतु अब वह राजनीतिक और कूटनीतिक भूमिका भी निभाने की कोशिश कर रहा है—जैसे कि 2023 में ईरान-सऊदी अरब समझौते में उसकी मध्यस्थता। यह संकेत देता है कि चीन केवल “फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड” नहीं रहना चाहता, बल्कि “डिप्लोमैटिक आर्बिटर” की भूमिका भी ग्रहण करना चाहता है।

चीन के इस रुख की आलोचना भी संभव है। आलोचक यह तर्क देते हैं कि चीन स्वयं अपने आंतरिक मामलों और कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर मानवाधिकारों को लेकर सवालों के घेरे में रहा है। ऐसे में उसका यह नैतिक आग्रह एक प्रकार का “चयनात्मक नैतिकता” भी माना जा सकता है। अतः यह प्रश्न उठता है—क्या यह वास्तव में मानवीय चिंता है, या वैश्विक मंच पर प्रभाव बढ़ाने की रणनीति?

चीन ने “अंतरराष्ट्रीय समुदाय” से अपील की, किंतु वास्तविकता यह है कि यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय स्वयं विभाजित है। पश्चिमी देश, रूस, चीन, और क्षेत्रीय शक्तियाँ—सभी अपने-अपने हितों के अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं। इसी विभाजन के कारण ग़ाज़ा जैसे संकट बार-बार उत्पन्न होते हैं और उनका समाधान अधूरा रह जाता है।

चीन का यह “जागना” कई स्तरों पर देखा जा सकता है—एक उभरती वैश्विक शक्ति का सक्रिय हस्तक्षेप, पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने की कोशिश, और साथ ही एक अवसरवादी कूटनीतिक कदम। सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में “जागना” अक्सर नैतिक विवेक से कम और रणनीतिक समय-निर्धारण से अधिक जुड़ा होता है। लेबनान और ग़ाज़ा केवल भू-भाग नहीं, बल्कि वे मंच हैं जहाँ वैश्विक शक्तियाँ अपने-अपने प्रभाव, नैतिकता और हितों का प्रदर्शन करती हैं।

और शायद इसीलिए—

हर “जागरण” के पीछे

एक “गणना” छिपी होती है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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