…क्योंकि नेहरू ने संघ की सामाजिक –आर्थिक सोच पर किया था कुठाराघात!

इस बार का 10 जून  स्वाधीन भारत के इतिहास का एक खास दिन रहा, जिसका इंतज़ार खासतौर से भाजपाइयों को लम्बे समय से था। कारण, इस दिन प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार लम्बे समय तक सेवा देने वाले वाले निर्वाचित(चुने हुए) प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहर लाल नेहरु के रिकॉर्ड की बराबरी कर उन्हें पीछे छोड़ दिया था। पंडित नेहरु 13 मई 1952 से 27 मई 1964 तक लगातार 4,398 दिनों तक देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री रहे थे।

पहली बार 26 मई 2014 को शपथ लेने वाले नरेंद्र मोदी 10 जून 2026 को 4,399 दिन पूरे कर नेहरु के ऐतिहासिक रिकॉर्ड से आगे निकल गए थे। इस रिकॉर्डतोड़ कार्यकाल को भाजपा ने अपने विपुल प्रचारतंत्र के जरिये एक बड़ी उपलब्धि मानते हुए उन्हें नेहरु से भी बड़ा प्रधानमंत्री बताने का सिलसिला शुरू कर दिया लेकिन वे मोदी को नेहरु से बड़ा बताने की होड़ में वे भूल गए कि पंडितजी कुल 16 वर्ष 286 दिन अर्थात 6130 दिनों तक भारत के प्रधानमत्री रहे।

वह 17 अगस्त 1947 से लेकर 27 मई 1964 को अपने निधन के दिन तक प्रधान मंत्री रहे। यदि केवल निर्वाचित प्रधान मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल की बात की जाय तो उन्होंने 13 मई 1952 से लेकर 27 मई 1964 तक यानी 4,398 दिनों तक देश की सेवा की. नेहरु उन दिनों चुनाव जीतकर प्रधान मंत्री बनते थे, जब लोकत्रंत्र जीवित था। चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और बाकी संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र थीं।

मोदी ने चुनावी सफलता लोकतंत्र की हत्या करके हासिल की है। उन्होंने  सत्ता निर्वाचन आयोग, सुप्रीम कोर्ट, ख़ुफ़िया एजेंसियों, जांच एजेंसियों को संघ के कब्जे में करने के साथ लोकतंत्र को बंधक बना कर अर्जित की है। ऐसे में नेहरु से उनकी तुलना हास्यास्पद है। उनके रिकॉर्ड पर इतराने वाले भूल गए कि वे 2019 में हारने वाले थे। वह तो पुलवामा हमले और बालाकोट एयर स्ट्राइक के जरिये राष्ट्रवाद का कृत्रिम सैलाब पैदा कर चुनावी वैतरणी पार कर लिए।

जहाँ तक 2024 का प्रश्न है मोदी बहुमत से दूर रह गए थे। वह तो किसी तरह दूसरे दलों की बैसाखियों के सहारे पीएम बनने का अवसर पा गए! वहीँ पंडित नेहरु 1952 में 364, 1957 में 371 और 1962 में 361 लोकसभा की सीटें जीतकर अपने जीवन के शेष दिन तक निर्विवाद रूप से सबसे लोकप्रिय पीएम के रूप में रिकॉर्ड कायम किये!   , 

बहरहाल 10 जून के बाद नेहरु से मोदी को बड़ा बताने की होड़ लगाने वाले भक्त इस तथ्य की भी अनदेखी कर गए कि अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ते हुए नेहरु 3,259 दिनों तक  जेल में रहे। वे यह भी भूल गए कि 15 अगस्त 1947 को अन्तरिम सरकार के प्रमुख के रूप में नेहरु का कार्यकाल नए भारत के निर्माण की बुनियाद खड़ा करने वाला कार्यकाल साबित हुआ। इस काल में संविधान का निर्माण और उसे लागू  करने का ऐतिहासिक कार्य हुआ।

इसी दौर में 500 से अधिक देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय हुआ, जिससे अखंड  भारत की नींव पड़ी। इसी काल  में प्रशासनिक और पुलिस सेवाओं का पुनर्गठन तथा योजना एवं चुनाव आयोग का गठन किया गया। इसके अतिरिक्त ऐसे ढेरों बुनियादी काम हुए, जिस पर आजाद भारत का महल खड़ा हुआ। किन्तु नेहरु की इन सब उपलब्धियों की अनदेखी करते हुए अंधभक्त मोदी को बड़ा बनाने में जुटे रहे।

बहरहाल 10 जून को पीएम के रूप रिकॉर्ड कायम करने वाले यशस्वी मोदी कुछ दिन बाद अपनी विराट उपस्थिति दर्ज कराने फ़्रांस पहुंचे, जहाँ 15 से 17 जून तक जी- 7 सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने की। इसमें जी- 7 के प्रमुख सदस्य देशों- कनाडा, फ़्रांस(मेजबान), जर्मनी, इटली, जापान, इंग्लैंड और अमेरिका – सहित भारत, ब्राजील, केन्या , दक्षिण अफ्रीका और मिस्र को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था।

फ्रांस में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ पर्ची के साथ भारत के प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने जिस तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, वह शर्मसार करने वाली रही। सोशल मीडिया पर मोदी को पर्ची वाला पीएम से लेकर और  क्या-क्या नहीं कहा गया। इस दौरे में जो मोदी ने भारत की जो तौहीन करायी उससे लगा, अब अंधभक्त शांत हो जाएँगे और नेहरु से उनकी तुलना  करने की हिमाकत नहीं करेंगे।

लेकिन शर्म को घोलकर पी जाने वाले भाजपाई कहां मानने वाले थे। लिहाजा 19 जून को एक कथित भाजपाई विद्वान सांसद ने एक बड़े अख़बार में ‘संभव नहीं नेहरु से मोदी की तुलना‘ शीर्षक से एक बड़ा सा लेख लिखकर फ़्रांस से भद्द पिटवाकर लौटे मोदी को फिर बड़ा बताने का दुसाहस कर डाला!                  

खैर! महत्व इस बात का नहीं कि कार्यकाल के रूप में किसने रिकॉर्ड बनाया। महत्त्व इस बात का है कि प्रधानमंत्री बनकर नेहरु और मोदी ने क्या किया। इतिहास बताता है कि 1947 से 1952 तक नेहरु का कार्यकाल नए भारत के निर्माण का स्वर्णिम काल रहा। अंग्रेज़ों ने लूट-खसोट कर जिस देश की बाग़डोर कांग्रेस को सौंपी थी, 1947 में उस देश में सुई तक नहीं बनती थी; सारा देश राजा- रजवाड़ों के झगड़ों में बंटा हुआ था।

देश के मात्र पचास गाँवों में बिजली थी! किसी गाँव में नल नही थे। पूरे देश में मात्र दस बाँध थे। सीमाओं पर मात्र कुछ सैनिक : चार विमान और बीस टैंक थे! देश की सीमाएँ चारों तरफ़ से खुली थीं और खजाना खाली था। ऐसी बदहाल दशा में भारत नेहरु को मिला था! लेकिन नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेस ने देखते ही देखते कुछ ही दशकों में देश का कायाकल्प कर दिया।

नेहरु ने 1950 में योजना आयोग का गठन किया। मिश्रित अर्थ व्यवस्था के मॉडल को अपनाते हुए उन्होंने कृषि और भारी उद्योगों (जैसे भिलाई और राउरकेला स्टील प्लांट, भाखड़ा नागल  बाँध का संतुलित विकास किया। नेहरु वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने परमाणु उर्जा कार्यक्रम, अन्तरिक्ष अनुसन्धान की शुरुआत की और देश में उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थानों, जैसे भातीय प्रोद्योगिकी संसथान आइआइटी की नींव रखी। 

मोदी 2014 में हर साल युवाओं को 2 करोड़ नौकरियां देने और प्रत्येक आदमी के खाते में 15 लाख जमा कराने के वादे के साथ सत्ता में आए लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे देश में बेरोजगारी दूर हो, भारत का विकास हो। आज जीडीपी के मामले में बांग्लादेश जैसा पिछड़ा मुल्क हमसे आगे हो गया है। मोदी ने 100 स्मार्ट सिटी बनाने का वादा किया था लेकिन इस दिशा में वह पूरी तरह जीरो साबित हुए।

पिछले 12 सालों में चीन 800, दक्षिण कोरिया 80 प्लस, वियतनाम 41, ताइवान 22 स्मार्ट सिटी बना चुका है: मोदी का रिकॉर्ड जीरो है। एक जमाना था जब आम जनता राशन की दुकान या मतदान केन्द्रों पर लाइन में दिखाई पड़ती थी। अब ऐसा लगता है कि नोटबंदी के बाद से लाइन में लगना भारत की नियति बन गई है।

कहीं रोजगार के लिए लाइन, कहीं गैस के लिए तो कहीं पेट्रोल के लिए लाइन:  बिना लाइन में लगे कुछ होने को नहीं है, यही मोदी राज की उपलब्धि है। बहरहाल देशहित में किये गए कार्यों के हिसाब से पीएम के रूप में मोदी की उपलब्धियां, नेहरु के समक्ष लिलिपुट जैसी है, बावजूद इसके संघी राष्ट्रवादी नेहरु के खिलाफ विष-वमन करते रहते हैं। यह आज से नहीं नहीं, गोलवलकर के जमाने से होता रहा है। ऐसा क्यों, यह यह एक गहन मनोवैज्ञानिक अध्ययन का विषय है, जिसे समझने का अबतक शायद सही प्रयास नहीं हुआ! 

क्यों संघियों के निशाने पर रहे पंडित नेहरु?

अब जहां तक मोदी सहित तमाम संघियों द्वारा पंडित नेहरु को  निशाने पर लेने का प्रश्न है, अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक नेहरु धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री थे। उनके लिए बिना भेदभाव वाली धर्मनिरपेक्षता आस्था का मूलमंत्र तत्व था। यही उनकी विचारधारा का मूल भी था। उन्होंने यह पूरी तरह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि भारत कभी हिन्दू राष्ट्र या ‘हिन्दू पाकिस्तान’  न बने।

इसके लिए वह हमेशा हिन्दुत्ववादी ताकतों से उलझते रहते थे। उन्हें  हाशिये पर डालने, यहाँ तक कि उन्हें बहिष्कृत करने की हर संभव कोशिश करते थे। नाथूराम गोडसे के महात्मा गांधी की ह्त्या ने हिन्दू साम्प्रदायिकता को हर मोड़ पर चुनौती देने के उनके संकल्प को और मजबूत कर दिया। वो इसे बहुलवादी , बहु- धार्मिक भारत के अपने विचार के बिलकुल विपरीत मानते थे। उस समय आरएसएस के लिए नेहरु सबसे बड़े ‘शत्रु’ थे, जिनसे वे वैचारिक और राजनीतिक स्तर पर बेहद नफरत करते थे। 

जहाँ आरएसएस अतीत और प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथों का महिमामंडन करना चाहता है , वहीं नेहरु तर्क और विज्ञान पर आधारित आधुनिक समाज निर्माण करना चाहते थे। संघियों  के आदर्श गोलवलकर नेहरु को अपना प्रमुख विरोधी मानते थे। वो उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मानते थे, जो हिंदुत्व को लोगों के बीच स्वीकार्यता हासिल करने  से रोक रहे थे। बहरहाल आम राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा नेहरु विरोध के पीछे जो कारण गिनाये जाते हैं, वे आंशिक रूप से ही सही हैं।

पर, असल कारण कुछ और है और वह कारण है भाजपा के पितृ संगठन संघ के हिन्दू राष्ट्र निर्माण के पीछे क्रियाशील आर्थिक और सामाजिक सोच है,  जिसकी राह में नेहरु ने एवरेस्ट सरीखा अवरोध खड़ा किया और परवर्तीकाल में उनकी भावी पीढ़ी के इंदिरा, राजीव, सोनिया और राहुल गांधी ने उस अवरोध को बड़ा कर दिया। इसका अतिक्रमण करना भाजपा के लिए कठिन है।

हिन्दू राष्ट्र की राह में नेहरु-गांधी परिवार ने कैसे अवरोध खड़ा कर दिया, इसे समझने के लिए सबसे ज़रूरी है हिन्दू राष्ट्र निर्माण के पीछे संघ की आर्थिक–सामाजिक सोच को जानना।मुख्यधारा के राजनीतिक विश्लेषक अज्ञानतावश या इच्छाकृत रूप से इसकी अनदेखी करते रहते हैं।

संघ की विशेष सामाजिक-आर्थिक सोच  

काबिले गौर है कि किसी भी राजनीतिक संगठन के निर्माण के पीछे सामाजिक- आर्थिक सोच का होना बहुत जरुरी है। यह सोच संगठन को दिशा देती है, उसकी नीतियों को प्रभावित करती है और उसे समाज में एक मजबूत जगह बनाने में मदद करती है। सारांश में कहा जा सकता है सामाजिक-आर्थिक सोच किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक शक्ति है, जो संगठन को सही दिशा में ले जाती है, उसके लक्ष्यों को निर्धारित करती है, उसे जनता का समर्थन हासिल करने में मदद करती है और उसे स्थिरता प्रदान करती है !

संघ भले ही घोषित तौर पर अराजनीतिक संगठन हो पर उसकी गतिविधियाँ राजनीति से प्रेरित रही हैं। राजनीतिक लक्ष्य साधने के लिए ही उसने पहले जनसंघ और बाद में भाजपा को जन्म दिया। जाहिर है उसकी भी सामाजिक-आर्थिक सोच रही, जिसे राजनीतिक विश्लेषकों के साथ गैर-भाजपा दलों और बुद्धिजीवियों ने सामने लाने में नहीं के बराबर रूचि ली। यदि उन्होंने ईमानदारी से हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के पीछे सामाजिक-आर्थिक सोच को सामने लाने का प्रयास किया होता, तो प्रायः 90 प्रतिशत वंचित हिन्दू आबादी के सिर से हिन्दू राष्ट्र का भूत उतर उतर गया होता!

अधिकांश विद्वानों के मुताबिक़ हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा, जिसे हिंदुत्व के रूप में भी जाना, भारत में एक राजनीतिक विचारधारा है जो हिन्दू धर्म-संस्कृति और पहचान पर आधारित एक राष्ट्र राज्य की स्थापना की वकालत करती है। इसके पीछे की आर्थिक-सामाजिक सोच में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर, पारम्परिक मूल्यों का संरक्षण और एक मजबूत एकीकृत हिन्दू समुदाय का निर्माण करना है।

कुल मिलाकर हिन्दू राष्ट्र के पीछे क्रियाशील सामाजिक-आर्थिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए इसका हजारों साल पुरानी वर्ण – व्यवस्था को लागू  करना रहा  है। वर्ण – व्यवस्था के ज़रिये संघ हिन्दू राष्ट्र में अपनी सामाजिक- आर्थिक सोच को जमीन पर उतारना चाहता है, इसका संकेत हिंदुत्व के महानायक सौ साल से अधिक समय से दे रहे हैं। आज से शताधिक वर्ष पूर्व हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को परिभाषित करने वाले  विनायक दामोदर सावरकर ने इस बात पर जोर दिया था कि राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पश्चिम से उधार ली गई अवधारणाओं  के बजाय प्राचीन देशी विचारों पर आधारित होनी चाहिए। 

जाहिर है उन्होंने वर्ण- व्यवस्था आधारित प्राचीन हिन्दू व्यवस्था द्वारा राजनीतिक- आर्थिक व्यवस्था परिचालित करने का निर्देश दिया था। हिन्दू राष्ट्र के अग्रणी विचारक प्रो. बिनॉय कुमार सरकार ने 1920 के आसपास अपनी पुस्तक ‘ बिल्डिंग ऑफ़ हिन्दू  राष्ट्र ‘ में हिन्दू राज्य की संरचना और हिन्दू राज्य की सामाजिक – आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के लिए जो दिशा निर्देश प्रस्तुत किया था वह कौटिल्य, मनु और शुक्र जैसे विचारकों और महाभारत पर आधारित था। 

जाहिर है सरकार महोदय ने भी मनुवादी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की कामना की थी। प्राचीन वर्ण – व्यवस्था द्वारा ही भविष्य के भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था चले, इसके प्रबल पैरोकार ‘बंच ऑफ़ थॉट्स‘ के लेखक और आरएसएस के दूसरे प्रमुख एमएस गोलवलकर  भी रहे। जिनकी आर्थिक सोच पर भाजपाइयों के गर्व का अंत नहीं ह।

‘एकात्म मानववाद’  के रूप में भारतीय जनसंघ और आज की भाजपा के राजनीतिक दर्शन को सामने लाने वाले पंडित दींन दयाल उपाध्याय ने सामाजिक- आर्थिक मुक्ति के साधन के रूप में साम्यवाद और पूंजीवाद को अस्वीकार करते  कहा था कि हिन्दुओं की आर्थिक मुक्ति, भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर आधारित एक न्यायसंगत और आत्मनिर्भर आर्थिक प्रणाली के माध्यम से ही संभव हो सकती है!

स्पष्ट है कि पंडित उपाध्याय भी वर्ण- व्यवस्थाधारित सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था के हिमायती थे। हिंदुत्व के प्रातः स्मरणीय  इन मनीषियों की सोच का प्रतिबिम्बन ही संघ के हिन्दू राष्ट्र की सामाजिक – आर्थिक सोच में हुआ है। संघ अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिये जिस हिन्दू राष्ट्र के सामाजिक- आर्थिक विचार को जमीन पर उतारना चाहता है, उसके संविधान का मसौदा 2025 के महाकुम्भ में सामने आ चुका है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि हिंदू राष्ट्र में कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था को विधिक रूप दिया जाएगा!

संघ आखिर क्यों वर्ण-व्यवस्था लागू  करना चाहता है, इसे जानने के लिए कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था की विशेषता जान लेना जरुरी है। दैवीय- सृष्ट वर्ण- व्यवस्था उस हिन्दू धर्म का प्राणाधार है, जिसका संघ अघोषित रूप से ठेकेदार बने बैठा है। जिसे हिन्दू धर्म कहा जाता उसका अनुपालन कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था के जरिये होता रहा है। जिस वर्ण- व्यवस्था को संघ हिन्दू राष्ट्र में लागू करना चाहता है, वह वर्ण- व्यवस्था मूलतः शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक – के बंटवारे की व्यवस्था रही।

इसमें शक्ति के समस्त स्रोत सिर्फ उच्च वर्ण के पुरुषों के मध्य वितरित हुए और दलित, आदिवासी, पिछड़ी और आधी आबादी से युक्त 90 % हिन्दू आबादी ही सदियों से शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत रही। इन  90 % वंचित हिन्दुओं के लिए शक्ति के स्रोतों का भोग अधर्म व निषिद्ध रहा। हिन्दू राष्ट्र में इसी धर्माधारित व्यवस्था के जरिये संघ 90 % वंचित हिन्दू आबादी को शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत करने और सारा कुछ उच्च वर्ण पुरुषों के हाथ में देने का सपना लिए 1925 से अपनी गतिविधियाँ चलाता रहा है।

90 % वंचित हिन्दुओं को शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत करने की संघ की साजिश पर नेहरु ने आजाद भारत में अपनी नीतियों से सबसे बड़ा हमला कर उसके मंसूबों पर पानी फेर  दिया! 

बहुतों का पता नहीं कि सावरकर-हेडगेवार-गोलवलकर सहित अन्य असंख्य हिंदुत्ववादी नायकों ने आधुनिक भारत में शुक्र, कौटिल्य, मनु जैसे विचारकों का विधान लागू करने का जो सपना देखा था, उस पर सबसे बड़ा प्रहार करने वाले भारतीय संविधान के निर्माण के पृष्ठ में नेहरु की विराट भूमिका रही।

उन्होंने 13 दिसंबर 1946  को संविधान सभा में ‘उद्देश्य प्रस्ताव ‘ नाम से जो प्रस्ताव पेश किया वह भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों को निर्धारित करने वाला रहा और बाद में भारत संविधान की प्रस्तावना का आधार बना। उनका उद्देश्य प्रस्ताव 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से अपनाया गया और 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत और अधिनियमित किया गया।

नेहरु के उस प्रस्ताव में कहा गया था : सभी भारतीयों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक निष्पक्षता; पद और अवसर की समानता, कानून के समक्ष समानता ; और अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था, उपासना, व्यवसाय, संघ और कार्य की बुनियादी स्वतंत्रता – कानून और सार्वजानिक नैतिकता के अधीन – की गारंटी दी जानी चाहिए।

नेहरु का यह उद्घोष संघ की मनुवादी सोच के खिलाफ एक क्रान्तिकारी घोषणा  था, जिसे संघी आज तक भूल नहीं पाए है और अपना आक्रोश समय- समय पर जाहिर करते रहते हैं। जवाहरलाल नेहरु ने आधुनिक भारत के निर्माण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने योजना आयोग की स्थापना करने के साथ, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा दिया। भारत के विकास में असाधारण योगदान देने वाली तीन पंच वर्षीय योजनाओं की शुरुआत करने वाले पंडित नेहरु की नीतियों से देश में कृषि और उद्योग के नए युग की शुरुआत हुई, जिसने वर्ण-व्यवस्था द्वारा सदियों से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत हिन्दू तबकों के जीवन में बड़ा बदलाव लाने में बुनियादी काम किया!

नेहरु के हिन्दू राष्ट्र विरोधी विचार का अनुसरण उनके परिवार के बाद के लोग भी करते रहे और राहुल गांधी हिन्दू राष्ट्र की राह में एवरेस्ट बनकर खड़े हो गए हैं! आज जहाँ संघ हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग – मुख, बाहु – जंघे – से जन्मे 7.5% लोगों के हाथ में शक्ति के समस्त स्रोत देने पर अमादा है, वहीं नेहरु के वंशधर राहुल गांधी शक्ति के स्रोतों में जितनी आबादी- उतना हक़ लागू कर हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को छिन्न-भिन्न करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस क्रम में मार्क्स का वर्ग-संघर्ष भारत में एक नया रूप अख्तियार करता प्रतीत हो रहा है!       

(लेखक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के विचार विभाग के चेयरमैन हैं।) 

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