लखनऊ के अलीगंज स्थित एक कोचिंग सेंटर में आग लगने से 15 विद्यार्थियों की मृत्यु ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। पढ़ने-लिखने और भविष्य गढ़ने के लिए घर से निकले ये बच्चे कुछ ही क्षणों में धुएँ और लपटों के बीच घिर गए। जिन अभिभावकों ने उन्हें सपनों के साथ संस्थान भेजा था, उन्हें उनके निर्जीव शरीर प्राप्त हुए। यह केवल एक स्थानीय दुर्घटना नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय विफलता का प्रतीक है जिसमें हम बार-बार चेतावनियाँ मिलने के बावजूद सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं देते।
भारत में ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं रहीं। 2019 में गुजरात के सूरत के एक कोचिंग सेंटर में भीषण आग लगी थी, जिसमें 22 विद्यार्थियों की जान चली गई थी। उस समय पूरे देश में आक्रोश था। सर्वोच्च न्यायालय तक ने सुरक्षा मानकों को लेकर चिंता व्यक्त की, राज्यों ने निरीक्षण अभियान चलाए, अनेक अवैध इमारतों को नोटिस दिए गए और कठोर कार्रवाई के आश्वासन दिए गए। किंतु कुछ समय बाद सब कुछ फिर सामान्य हो गया।
इसके बाद दिल्ली, राजकोट, अहमदाबाद, हैदराबाद, मुंबई और अन्य शहरों में अस्पतालों, व्यावसायिक परिसरों, फैक्ट्रियों और सार्वजनिक भवनों में आग की घटनाएँ सामने आती रहीं। लगभग हर बार पाया गया कि अग्नि सुरक्षा के नियम या तो लागू ही नहीं थे या केवल कागज़ों तक सीमित थे।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर हम हर त्रासदी के बाद भूल क्यों जाते हैं? इसका उत्तर हमारी प्रशासनिक संस्कृति और सामाजिक मानसिकता दोनों में छिपा है। भारत में नियमों का निर्माण अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उनका पालन सुनिश्चित करना कठिन। भवन निर्माण उपविधियाँ, राष्ट्रीय भवन संहिता, अग्निशमन संबंधी दिशा-निर्देश और स्थानीय निकायों के प्रावधान पहले से मौजूद हैं। समस्या इन नियमों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है।
कोचिंग उद्योग का तीव्र विस्तार इस संकट को और जटिल बनाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संख्या और रोजगार के दबाव ने देशभर में हजारों निजी कोचिंग संस्थानों को जन्म दिया है। इनमें से अनेक बहुमंजिला व्यावसायिक इमारतों या परिवर्तित आवासीय भवनों में संचालित होते हैं। अक्सर संकरी सीढ़ियाँ, बंद खिड़कियाँ, अपर्याप्त वेंटिलेशन, एकमात्र निकास मार्ग, अव्यवस्थित विद्युत वायरिंग और अग्निशमन उपकरणों का अभाव देखने को मिलता है। फिर भी ये संस्थान वर्षों तक बिना किसी प्रभावी निगरानी के चलते रहते हैं।
आग स्वयं कई बार उतनी घातक नहीं होती जितना उसका धुआँ। विशेषज्ञ बताते हैं कि अधिकांश पीड़ित जलने से पहले दम घुटने या विषैले धुएँ के कारण जान गंवाते हैं। यदि भवन में पर्याप्त निकास मार्ग हों, धुआँ बाहर निकल सके, आपातकालीन संकेत स्पष्ट हों और प्रशिक्षित कर्मचारी मौजूद हों, तो बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित निकाला जा सकता है। लेकिन जब भवन की रूपरेखा ही सुरक्षा-विरोधी हो, तब मामूली चिंगारी भी सामूहिक त्रासदी का रूप ले सकती है।
यह भी विचारणीय है कि निरीक्षण तंत्र क्यों विफल होता है। क्या संबंधित अधिकारियों ने कभी भवन का निरीक्षण किया? यदि किया तो क्या कमियाँ दर्ज की गईं? यदि कमियाँ थीं तो संचालन की अनुमति कैसे मिली? यदि अनुमति नहीं थी तो संस्थान चलता कैसे रहा? इन प्रश्नों का उत्तर केवल किसी एक संचालक या एक अधिकारी में नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र में निहित है जहाँ जवाबदेही अक्सर बिखर जाती है और अंततः किसी पर भी वास्तविक दंड नहीं आता।
दुर्घटना के बाद मुआवज़े की घोषणा भारतीय प्रशासनिक प्रतिक्रिया का लगभग स्थायी हिस्सा बन चुकी है। आर्थिक सहायता आवश्यक है, किंतु वह न्याय का विकल्प नहीं हो सकती। किसी परिवार के लिए अपने बच्चे का जीवन अमूल्य होता है। ऐसे में कुछ लाख रुपये की सहायता संवेदना का संकेत तो हो सकती है, समाधान नहीं। वास्तविक न्याय तब होगा जब लापरवाही की निष्पक्ष जाँच हो, दोषियों को दंड मिले और ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संस्थागत सुधार किए जाएँ।
भारत के शहरीकरण की गति तेज है, लेकिन सुरक्षा अवसंरचना उसी अनुपात में विकसित नहीं हुई। छोटे शहरों और कस्बों में नगर निकायों के पास न पर्याप्त तकनीकी क्षमता है और न ही नियमित निरीक्षण की व्यवस्था। अग्निशमन विभागों में कर्मियों और उपकरणों की कमी की शिकायतें वर्षों से की जाती रही हैं। कई नगरों में ऊँची इमारतों तक पहुँचने वाले आधुनिक उपकरण भी उपलब्ध नहीं हैं। जब तक स्थानीय प्रशासन को संसाधन, प्रशिक्षण और स्वायत्तता नहीं मिलेगी, तब तक केवल नियम पुस्तिकाओं से सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी।
एक और महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक है। अभिभावक प्रायः कोचिंग संस्थान का चयन उसके परिणाम, फीस या प्रतिष्ठा के आधार पर करते हैं, लेकिन भवन की सुरक्षा पर कम ध्यान देते हैं। प्रवेश लेने से पहले यह पूछना असामान्य माना जाता है कि आपातकालीन निकास कितने हैं, अग्निशमन यंत्र कार्यशील हैं या नहीं, विद्युत व्यवस्था सुरक्षित है या नहीं, और क्या नियमित मॉक ड्रिल आयोजित होती है। यदि समाज सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाए, तो संस्थानों पर भी सुधार का दबाव बढ़ेगा।
शिक्षा संस्थानों को केवल ज्ञान देने वाले केंद्र नहीं, बल्कि सुरक्षित सार्वजनिक स्थल भी होना चाहिए। प्रत्येक कोचिंग सेंटर के लिए वार्षिक अग्नि सुरक्षा प्रमाणन अनिवार्य किया जा सकता है, जिसकी जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो। अचानक निरीक्षण, उल्लंघन पर तत्काल सीलिंग, भारी आर्थिक दंड और आपराधिक उत्तरदायित्व जैसी व्यवस्थाएँ प्रभावी हो सकती हैं। साथ ही प्रत्येक संस्थान में प्रशिक्षित सुरक्षा प्रभारी, स्पष्ट निकासी योजना और नियमित आपदा अभ्यास अनिवार्य होने चाहिए।
प्रौद्योगिकी का भी बेहतर उपयोग किया जा सकता है। डिजिटल अग्नि सुरक्षा ऑडिट, ऑनलाइन अनुपालन प्रणाली, जीआईएस आधारित भवन मानचित्रण, सेंसर आधारित अलार्म और वास्तविक समय में निगरानी जैसी व्यवस्थाएँ पारदर्शिता बढ़ा सकती हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित जोखिम विश्लेषण भविष्य में उच्च जोखिम वाले भवनों की पहचान करने में भी सहायक हो सकता है।
किंतु अंततः तकनीक से अधिक आवश्यक है राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक ईमानदारी। यदि निरीक्षण केवल औपचारिकता रहेगा, प्रमाणपत्र सुविधा के आधार पर जारी होंगे और नियमों का उल्लंघन करने वालों को संरक्षण मिलता रहेगा, तो कोई भी कानून प्रभावी सिद्ध नहीं होगा।
लखनऊ की यह त्रासदी हमें एक असुविधाजनक सत्य का सामना करने के लिए बाध्य करती है—भारत में अनेक दुर्घटनाएँ प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही से निर्मित होती हैं। वे नियति नहीं, बल्कि टाली जा सकने वाली घटनाएँ हैं। हर बार हम मोमबत्तियाँ जलाते हैं, श्रद्धांजलि देते हैं, जाँच आयोग गठित करते हैं और फिर कुछ महीनों बाद सब भूल जाते हैं। इस विस्मृति की सबसे बड़ी कीमत वे परिवार चुकाते हैं जिनके घरों के चिराग बुझ जाते हैं।
अब समय आ गया है कि सुरक्षा को विकास का विरोधी नहीं, बल्कि उसका अनिवार्य अंग माना जाए। शिक्षा, व्यापार और शहरी विस्तार तभी सार्थक हैं जब वे नागरिकों के जीवन की रक्षा भी कर सकें। यदि लखनऊ की इस घटना के बाद भी देश ने कठोर और स्थायी सुधारों का मार्ग नहीं चुना, तो भविष्य में किसी अन्य शहर की किसी अन्य इमारत से उठता धुआँ फिर यही प्रश्न पूछेगा—क्या हमने पिछली त्रासदियों से वास्तव में कुछ सीखा था?
इन 15 मासूम बच्चों की स्मृति का सबसे बड़ा सम्मान शोकसभा नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था का निर्माण होगा जिसमें किसी अभिभावक को अपने बच्चे को पढ़ने भेजते समय उसकी सुरक्षा के लिए भयभीत न होना पड़े।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)