सूरत के नासिर नगर ध्वस्तीकरण मामले में हाईकोर्ट सख्त, कहा: कानूनी प्रक्रिया के बिना एक भी मकान नहीं तोड़ा जा सकता

अहमदाबाद। गुजरात में सूरत के नासिर नगर स्थित रानीतालाब क्षेत्र में हुए ध्वस्तीकरण मामले की सुनवाई करते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की और कहा कि “कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना एक भी मकान नहीं तोड़ा जा सकता।”

न्यायमूर्ति निखिल एस. करियल ने सुनवाई के दौरान सूरत महानगरपालिका (एसएमसी) और उसके अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि “यदि बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए मकानों को तोड़ा गया है, तो इसकी सीधी जवाबदेही संबंधित अधिकारियों की होगी।”

हाईकोर्ट ने मामले में सूरत महानगरपालिका सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने यह भी कहा कि जिन मकानों को तोड़ा गया है, उनके प्रभावित निवासियों के पुनर्वास और वैकल्पिक आवास की व्यवस्था के बारे में भी जानकारी दी जाए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि 30 मई 2025 को नासिर नगर में सूरत मनपा और प्रशासनिक अधिकारियों ने स्थानीय निवासियों को किसी प्रकार का नोटिस दिए बिना, न तो आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया और न ही पर्याप्त समय दिया। इसके बावजूद देर रात लगभग 150 से अधिक मकानों को ध्वस्त कर दिया गया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि सूरत मनपा द्वारा यह कार्रवाई किस प्रकार की गई। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि ध्वस्तीकरण के समय मनपा के अधिकारी और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद थे। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि कार्रवाई में प्रयुक्त मशीनरी और कर्मचारियों का नियंत्रण किसके पास था।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ध्वस्तीकरण का पूरा कार्य सूरत महानगरपालिका की देखरेख में हुआ। आरोप लगाया गया कि ध्वस्तीकरण से पहले इलाके की बिजली काट दी गई थी और निजी एजेंसी श्री राम एजेंसी के माध्यम से कार्रवाई कराई गई। इस दौरान आर्किटेक्ट रजनीकांत की मौजूदगी का भी आरोप लगाया गया।

अदालत ने यह भी पूछा कि यदि इतनी बड़ी कार्रवाई की गई थी तो उसके संबंध में कोई आधिकारिक आदेश या रिकॉर्ड क्यों उपलब्ध नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने पहले सूरत मनपा आयुक्त के समक्ष शिकायत की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया गया, परंतु पुलिस ने भी शिकायत स्वीकार नहीं की।

सूरत नासिरनगर ध्वस्तीकरण मामले में 26 याचिकाकर्ताओं ने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में राज्य सरकार, सूरत महानगरपालिका (एसएमसी), सूरत पुलिस आयुक्त, एसओजी के डीसीपी राजदीपसिंह नकुम, पुलिस और एसएमसी के कर्मचारियों तथा टोरेंट पावर को पक्षकार बनाया गया है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि एसओजी के डीसीपी राजदीपसिंह नकुम वहां किसी आधिकारिक जिम्मेदारी के बिना (अनौपचारिक रूप से) मौजूद थे, तो उन्हें अगली सुनवाई पर अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार भी इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।

नासिर नगर के इस ध्वस्तीकरण को “भूतिया डेमोलिशन” कहा गया क्यूंकि डेमोलिशन सूरत महानगर पालिका के रिकॉर्ड में ही नहीं है न ही कोई नोटिस दी गई थी न ही कागज़ी काम हुआ। 

मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होने की संभावना है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है।

(कलीम सिद्दीकी एक्टिविस्ट और पत्रकार हैं।)

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