पुणे फैमिली कोर्ट ने हाल ही में कहा कि एक महिला से उम्मीद की जाती है कि वह शादी की कसमें निभाए, अपने पति का शारीरिक और भावनात्मक रूप से ख्याल रखे, उसके लिए प्रार्थना करे और उसकी भलाई चाहे। अगर वह पति के प्रति इन ‘पवित्र’ कर्तव्यों को पूरा नहीं करती है, तो बच्चे का भविष्य उसके साथ ‘सुरक्षित’ नहीं है।
फैमिली कोर्ट के इंचार्ज जज गणेश घुले ने 16 मई को एक आदेश जारी कर एक नाबालिग लड़के की कस्टडी उसके पिता को सौंप दी। उन्होंने माँ के खिलाफ कुछ बातें कहीं, खासकर यह कि वह अपने पति के प्रति अपने ‘पवित्र’ कर्तव्यों को पूरा करने में नाकाम रही।
जज घुले ने पति के लगाए गए आरोपों में से एक पर ध्यान दिया कि पत्नी ने बालकनी से कूदने की धमकी दी थी। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता, हालांकि मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान इसे ठोस सबूतों के साथ साबित करना होगा। जज ने कहा कि यह घटना पत्नी के व्यवहार को दिखाती है और पति के खिलाफ कई मामले दर्ज करने जैसे उसके अन्य कामों से भी बहुत कुछ पता चलता है।
जज घुले ने कहा, “उसके द्वारा शुरू किए गए कई मुकदमों से साफ पता चलता है कि वह भूल गई कि याचिकाकर्ता उनके बच्चे का पिता है। वह पति से बड़ी आर्थिक मदद की उम्मीद तो करती है, लेकिन उसने सुलह करने की इच्छा का एक शब्द भी नहीं कहा। पत्नी के पति के प्रति पवित्र कर्तव्य – जैसे घर को संवारना, सम्मान बनाए रखना, पारंपरिक और धार्मिक नजरिए से भावनात्मक सहारा देना, घर का काम ठीक से संभालना, प्यार से बात करना, अच्छा माहौल बनाना – ये सब उसके लिए अनजान बातें लगती हैं।
शादी की कसमें निभाना, पति का शारीरिक और भावनात्मक ख्याल रखना, उसके लिए प्रार्थना करना और हर चीज में उसकी भलाई चाहना – ये उम्मीदें होती हैं, लेकिन उसने उसके और उसके परिवार के साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे वे सात पुश्तों के दुश्मन हों। इसलिए ऐसी महिला के साथ बच्चे का भविष्य सुरक्षित नहीं है।”
जज ने आगे कहा कि अगर बच्चा हर दिन अपने पिता के बारे में ‘जहरीली’ बातें सुनता है तो बहुत कम समय में ही पिता के साथ उसका रिश्ता खराब हो जाएगा। इसलिए जज के अनुसार, “बाप और बेटे” के इस प्यारे रिश्ते को बचाने और बच्चे के भविष्य के लिए यह बेहतर होगा कि वह अपने पिता के साथ रहे। इसके अलावा, जज ने पति-पत्नी के बीच हुई कुछ वॉट्सऐप चैट का ज़िक्र किया, जिसमें पत्नी ने पति को बताया था कि उनका बेटा उसके ‘टेढ़े-मेढ़े’ बर्ताव से डरा हुआ है। उसने बेटे को पिता को यह मैसेज करने के लिए मजबूर किया कि वह उनसे मिलना नहीं चाहता और बच्चे को धमकी दी कि अगर उसने पिता को ऐसा मैसेज नहीं किया तो वह खुदकुशी कर लेगी।
जज ने कहा, “अगर कम उम्र का बच्चा ऐसे मैसेज देखता है तो जिस व्यक्ति के खिलाफ उसके मन में ज़हर घोला जा रहा है, उसके बारे में पक्की बुरी राय बनाने में उसे ज़्यादा समय नहीं लगेगा। इसलिए बच्चे के उज्ज्वल भविष्य को बचाने के लिए, उसे तुरंत माँ से दूर करना ज़रूरी है। वरना, अपने अहंकार के कारण वह बच्चे का इस्तेमाल पिता के खिलाफ एक हथियार के तौर पर कर सकती है।” उन्होंने यह भी कहा कि इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर आखिरी चरण में ठीक से विचार किया जाएगा।
अपने 29 पेज के विस्तृत फ़ैसले में, कोर्ट ने यह भी कहा कि आम तौर पर पत्नी भावनात्मक सुरक्षा, साझेदारी और लगातार, सक्रिय प्यार पाना चाहती है। कोर्ट ने कहा कि मुख्य ज़रूरत सिर्फ़ साथ रहने के बजाय यह महसूस करना है कि उसे देखा जा रहा है, उसकी कद्र की जा रही है और उसे समझा जा रहा है। जज ने कहा, “लेकिन इस मामले में वह भौतिक चीज़ों के लिए पूरी ताकत से लड़ रही है। इसलिए मुझे उसकी कस्टडी में बच्चे का भविष्य अच्छा नहीं दिखता।”
इसके अलावा, जज ने बताया कि चूंकि यह जोड़ा कुछ समय के लिए सिंगापुर में रहा था और बच्चे को वहाँ से उसके पिता की ‘कानूनी’ कस्टडी से भारत लाया गया, इसलिए सिंगापुर की एक अदालत ने एकतरफ़ा आदेश में पत्नी को बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश दिया। जज ने गौर किया कि पत्नी ने उस आदेश को चुनौती नहीं दी और उस आदेश की ‘अवहेलना’ करती रही।
जज ने अपनी राय देते हुए कहा, “उन पर आरोप है कि कोर्ट के आदेश के बावजूद, किसी-न-किसी वजह से उन्होंने बच्चे से मिलने की इजाज़त देने से इनकार किया। वह पूरी तरह भूल गईं कि बच्चा दोनों का है। पति-पत्नी के बीच कानूनी लड़ाई में वह बच्चे का इस्तेमाल मोहरे की तरह कर रही हैं। आदेश न मानना जानबूझकर किया गया या नहीं, इस पर पूरी जांच के बाद विचार किया जाएगा, लेकिन मामले को देखने के बाद मुझे जो लगा, वह यह है कि पत्नी/मां ने कोर्ट के आदेश का सही भावना से पालन नहीं किया। एक बार जब न्यायिक आदेश पारित हो जाता है तो कोई भी व्यक्ति उसे मानने से इनकार नहीं कर सकता। संक्षेप में, मुझे लगता है कि इतनी कम उम्र के बच्चे का भविष्य ऐसे आदेश न मानने वाले व्यक्ति की कस्टडी में सुरक्षित नहीं होगा।”
इसके अलावा, जज ने कहा कि पत्नी बच्चे के साथ अपनी मर्जी से व्यवहार नहीं कर सकती और न ही अपने ससुराल वालों और यहां तक कि अपने पति को बच्चे से मिलने से रोक सकती है। आखिरकार, वह परिवार की ‘बहू’ है।
पिता के बारे में बात करते हुए, हालांकि आदेश के शुरुआती हिस्से में जज घुले ने कहा कि वह दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति पर विचार नहीं करेंगे, लेकिन आदेश के बाद के हिस्से में जज ने गौर किया कि पिता आर्थिक रूप से सक्षम दिखते हैं कि वह अपने बेटे का दाखिला कैम्ब्रिज-करिकुलम वाले स्कूल में करा सकें, और उसकी सेहत और बेहतर परवरिश का ध्यान रख सकें।
जज घुले ने कहा, “वह बच्चे की देखभाल के लिए उपलब्ध हैं। उनका हमेशा यात्रा करना उन्हें अपने ही बच्चे की कस्टडी पाने के लिए अयोग्य नहीं बनाता। बच्चे की दादी बच्चे के साथ रहने को तैयार हैं। उनके पास सिंगापुर में 3बीएचके अपार्टमेंट (गेटेड कम्युनिटी, पास में पार्क, स्कूल) है, फुल-टाइम घरेलू सहायक है, और बच्चे के लिए अलग कमरा है। ये चीजें निश्चित रूप से दिखाती हैं कि वह अपने बच्चे की परवरिश करने में काफी सक्षम हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि बच्चे के ननिहाल वाले भी उस पर बहुत प्यार लुटाते हैं। फिर भी खून का रिश्ता सबसे गहरा होता है। एक बायोलॉजिकल पिता के तौर पर याचिकाकर्ता जो सोचेंगे, (शायद) ननिहाल का कोई भी व्यक्ति वैसा नहीं सोच पाएगा।” पति के खिलाफ पत्नी के आरोपों, खासकर एक मेड के साथ कथित एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर और ऑफिस में महिला सहकर्मियों के साथ उनके व्यवहार आदि के बारे में जज ने कहा कि इन पर अंतिम सुनवाई के चरण में विचार किया जा सकता है।
बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश देते हुए जज ने कहा, “मैं फिर से कहता हूँ कि किसी के चरित्र या पवित्रता पर हल्के-फुल्के आरोप लगाना बहुत आसान है, लेकिन इसके लिए ठोस सबूतों की ज़रूरत होती है। मान भी लें कि पति का चरित्र ठीक नहीं है तो भी क्या इसका मतलब यह है कि वह एक बुरा पिता है? इसका जवाब साफ़ है – बिल्कुल नहीं… मैं पूरे सम्मान के साथ कहना चाहता हूँ कि एक माँ नौ महीने तक बच्चे को अपनी कोख में रखती है, कई शारीरिक और भावनात्मक बदलावों से गुज़रती है और प्रसव के दौरान बहुत ज़्यादा दर्द सहती है। इसलिए उसका योगदान भी बहुत कीमती है।
इसमें कोई शक नहीं, लेकिन साथ ही, भले ही पिता का अपने बच्चे के प्रति सच्चा प्यार खुलकर न दिखे, वह हमेशा मौजूद रहता है। लेकिन जब माता-पिता खुद अपने अहंकार के मुद्दों पर लड़ते रहते हैं तो कोर्ट की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह ‘पेरेंट्स पैट्रिया’ (अभिभावक) की भूमिका निभाए।” इन बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने पत्नी को आदेश दिया कि वह बच्चे की कस्टडी पिता को सौंप दे।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)