सत्ता के मायालोक में सत्य का माया-जाल बेहद भ्रामक होता है। जितना भी नाप-तौलकर समझने की कोशिश करे कोई, फिर भी यह पहचानना बेहद मुश्किल होता है कि किसकी आवाज किसके गले से निकल रही है और कौन-सा चेहरा किस चेहरे का मोहरा है।
फिलहाल स्थिति यह है कि लद्दाख के विश्व-प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की 20 दिनों से जारी कठोर भूख हड़ताल ने आंदोलन को नई गति दी है। इससे शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता, मंत्री-स्तरीय जवाबदेही तथा शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस छिड़ गई है। 20 जुलाई का ‘संसद चलो’ कार्यक्रम इस आंदोलन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। स्वास्थ्य को लेकर बढ़ते जोखिम को देखते हुए सभी पक्षों से संयम, संवाद और रचनात्मक समाधान की अपेक्षा की जाती है।
इस बीच खबर है कि सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य को देखते हुए अदालती हस्तक्षेप से सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवाया गया है।
समझा जाता है कि पुलिस ने जंतर-मंतर के धरना स्थल को खाली किये जाने का प्रशासनिक प्रयास किया जाना है या किया जा रहा होगा। यह आंदोलन अब राजनीतिक जोखिम के क्षेत्र में पहुंच गया है। वास्तविक स्थिति का पता तो 20 जुलाई 2026 से शुरू होनेवाले संसद के मानसून सत्र जंतर-मंतर का संसद चलो पर गहरी नजर टिकाये रखनी चाहिए। इसके के बारे में पहले से कुछ भी धारणा बनाना ठीक नहीं है।
इस बीच कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कारणों से जीवन की स्थितियों में बहुत तेजी से बदलाव जारी है — सकारात्मक और नकारात्मक पर बात अलग से की जा सकती है।
फिलहाल यह कि बदलाव और तेज बदलाव हो रहा है। बदलाव नियम है। बदलाव को रोका नहीं जा सकता है। बदलाव का स्वागत ही किया जाना चाहिए। जी, हर हाल में बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए। मनुष्य भयावह-से-भयावह का स्वागत करता आया है।
स्वागत की मेधा से ही मनुष्य भयावह-से-भयावह को मनोरम-से-मनोरम बनाता आया है। इन सब के बावजूद, इस बार जो बदलाव आ रहा है वह स्वागत की मेधा से मनोरम नहीं बनाया सकेगा। ऐसा इसलिए कि इस के पहले के बदलाव में मनुष्य और प्रकृति की सहयोगी और समवायी भूमिका रही है। प्रकृति के खिलाफ कुछ हद तक जाने की, कुछ करने की न सिर्फ अनुमति, बल्कि शक्ति भी मनुष्य को खुद प्रकृति से ही मिलती रही है।
इस के पहले जिस मनुष्य से प्रकृति का संबंध था वह प्राकृतिक मनुष्य था! व्यक्ति मनुष्य और मनुष्य जाति का — मनुष्यता — का, पारस्परिक और सामाजिक संबंध था! मनुष्य और प्रकृति के बीच का संबंध अब मशीनी या कृत्रिम बन गया है। इस बार के जारी बदलाव में प्रकृति का भिड़ान प्राकृतिक मनुष्य से नहीं, बल्कि कृत्रिम मनुष्य से हो रहा है।
प्राकृतिक मनुष्य के आगे-पीछे, ऊपर-ऊपर-नीचे, दायें-बायें यानी चारो तरफ कृत्रिम सत्ता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का जबरदस्त घेराव है। कुल मिलाकर यह कि इस बार के बदलाव में प्राकृतिक सत्ता और कृत्रिम मनुष्यता आमने-सामने है। प्रकृति की जरूरतों, पर्यावरण संतुलन का ख्याल प्राकृतिक मनुष्य कुछ-न-कुछ तो रखता ही आया है; लेकिन प्राकृतिक मनुष्य पता नहीं क्या घमायेगा (पसीना बहायेगा) या क्या कमायेगा!
मनुष्यता बदल रही या बंट रही है
व्यवस्था की क्रिया-प्रतिक्रिया की जटिल प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता पर काबिज होकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता से शक्ति संपन्न लोगों का सत्ता-समूह के शक्ति संपन्न और सशक्त लोगों की हवस से मनुष्य जाति दो भाग में बंट रहा है — प्राकृतिक मनुष्य और कृत्रिम मनुष्य! मशीन में लगा पुर्जा सशक्त यानी पावर का हिस्सा है, जिस की भूमिका पावर की सक्रियता को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होती है।
दूसरा शोकेस में रखा पुर्जा जो शक्ति यानी पावर का हिस्सा बनने के योग्य तो है लेकिन वह पावर का हिस्सा नहीं है और इस तरह से पावर की सक्रियता के सुनिश्चित होने या रहने में उस की कोई भूमिका नहीं है। योग्य के भी पावर का हिस्सा बनने की स्थिति का न होना व्यवस्था की नाकामी है। जबकि जान-बूझकर किसी आधार पर किसी व्यक्ति को पावर हिस्सा न बनने देना या छीन लेना व्यवस्था संचालकों के द्वारा की गई वंचना है, किया गया अत्याचार है।
भारत में दोहरी स्थिति है। व्यवस्था की नाकामी भी है, व्यवस्था का अत्याचार भी है। बदलाव की नई बयार के बीच व्यवस्था संचालकों की नाकामी और व्यवस्था के अत्याचार दोनों को जैसे पांव में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से पहिया और पंख लग गये हैं। तो यह है स्थिति के भयावह होने के कई कारणों में से कुछ कारण।
लोकतंत्र बदल रहा है
भयावह-से-भयावह भारत ही नहीं पूरी दुनिया में लोकतंत्र का स्वरूप बदल रहा है। इस समय इस बदलाव को ठीक से समझना जरूरी है। असल में जीवनयापन के स्वरूप में बदलाव आया है। प्रत्याशाओं में बदलाव आया है। उत्पादन और आय-व्यय में बदलाव आया है। मनुष्य के मूल चरित्र और जीवनयापन शैली में हुआ आमूलचूल बदलाव अब छिपा हुआ नहीं है। अर्थात जब सब-कुछ बदल रहा है तब बदलाव को सावधानी से समझने की कोशिश करनी चाहिए।
जीवन और जनजीवन के अधिक-से-अधिक प्रसंगों के साथ-साथ जन-से-जन के सरोकार में आ रहे बदलावों को समझे बिना लोकतंत्र के बदलते रूपों को समझना मुश्किल ही है। क्योंकि बदलाव में अंतर्निहित अनिवार्य तत्वों के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों की आनुपातिकता को भी समझना मुश्किल है।
समझना मुश्किल, न समझना खतरनाक
इन तमाम परिस्थितियों को समझना जितना मुश्किल है, समझना उस से अधिक जरूरी है।
समाज में व्यक्ति का जीवन स्वार्थ के कई स्तरों पर, कई संभागों में बंटा होता है। जाहिर है कि समाज भी इसी के अनुसार विभिन्न स्तरों पर विभिन्न संभागों में विभिन्न स्वार्थों बंटा होता है। स्वार्थों की भिन्नताओं के चलते हर समय व्यक्तियों और व्यक्तियों के छोटे-छोटे सामाजिक-समूहों के बीच चुप्पा संघर्ष चलता रहता है।
छोटे-छोटे सामाजिक-समूहों के बीच निरंतर चलते आये संघर्षों से संगठित अन्याय का सामाजिक क्षेत्र बन जाता है। भारतीय परिस्थिति में संगठित अन्याय के सामाजिक क्षेत्र परंपरागत तरीकों से धार्मिक भ्रामकताओं में फंसकर टिके रहते हैं, टिकाये रखे जाते हैं!
बड़े स्तर पर शासक समूहों के स्वार्थों में चुप्पा संघर्ष बहुत जल्दी बड़े टकरावों यहां तक कि युद्ध में बदल जाता है।
हिंसा का विकल्प
हिंसा, प्रतिहिंसा, अशांति और अराजकता को लोकतंत्र शांति, सहमति, सह-अस्तित्व और सामाजिक समवाय से सफलतापूर्वक बदलने में कामयाब न हो, तो लोकतंत्र को फेल समझा जायेगा। लोकतंत्र के फेल होने से अशांति और अराजकता फैलती है या फिर अशांति और अराजकता फैलने से लोकतंत्र फेल होता है — यह यूथिफ्रो दुविधा है! यानी, क्या कोई कार्य देवता के द्वारा स्वीकार किये जाने के कारण पवित्र होता है! या फिर देवता उसे स्वीकार ही इसलिए करते हैं कि वह पहले से ही पवित्र है!
शासक समूहों का संघर्ष अंततः खूनी संघर्षों से जनजीवन हिंसा-प्रतिहिंसा के माहौल में फंसकर परेशानियों से घिरा रहता था! इन परेशानियों से मुक्ति के लिए राष्ट्रों की और राष्ट्रों में लोकतंत्र की व्यवस्था को सब से बेहतर व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया गया। लेकिन हिंसा-प्रतिहिंसा का दौर तेज-धीमी गति से जारी ही रहा है!
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति!
सभ्यता में स्वार्थ पर लगाम लगाने का कोई तरीका काम नहीं करता है। जब तक स्वार्थों का सिरा राष्ट्रों से जुड़ा था, तब तक थोड़ी-बहुत गनीमत थी। उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने लोकतांत्रिक नेताओं के निजी और निजी लोगों के स्वार्थों को पंख लगा दिया। व्यापक स्तर पर लोकतंत्र चुनावी तानाशाही में बदल गया।
चुनावी तानाशाही में बदलते ही लोकतंत्र का फेल होना अनिवार्य ही हो जाता है। आज दुनिया लोकतंत्र के लोकविरोधी हो जाने के कारण वास्तविक और व्यावहारिक अर्थों में लोकतंत्र विहीन हो चुका है या फिर होनेवाला है। करोड़ों डॉलर का सवाल यह है कि लोकतंत्र के पूरी तरह से फेल होने के बाद अब क्या होगा और क्या-क्या?
लोकतंत्र से लोक तिरोहित!
लोक के प्रति शास्त्र के सम्मान का ध्येय वाक्य है — यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं। नाऽचरणीयं नाऽचरणीयं। लोक के प्रति सत्ता के बदले हुए रुख और रवैये के चलते लोकतंत्र से लोक तिरोहित! विकल्प है — लोकतंत्र में लोक निश्छल सम्मान!
20 जुलाई 2026 से भारत की राजनीति और लोकतंत्र नई करवट लेगा, इंतजार करें!
(प्रफुल्ल कोलख्यान लेखक, आलोचक, सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)