तीन राज्यों के तीन उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी को महज गुजरात की मंजलपुर सीट से संतोष करना पड़़ा! वहां भी उसकी जीत का ‘मार्जिन’ कम हो गया। गुजरात की तरह मध्यप्रदेश और बिहार भी भाजपा-शासित राज्य हैं। इनकी दो सीटों पर उपचुनाव हुए और नतीजे भाजपा के खिलाफ रहे! मध्यप्रदेश की दतिया सीट से कांग्रेस की जीत भाजपा के लिए बड़ा धक्का है। लेकिन बिहार की राजधानी पटना की बांकीपुर सीट से भाजपा की हार उसके लिए सिर्फ धक्का नहीं है, राजनीतिक रूप से विस्मयकारी भी है!
दतिया में भाजपा ने अपने एक दिग्गज नेता और राज्य के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्र को यहां से टिकट नहीं दिया। वह इस सीट से लड़ने और जीतने का लगातार दावा कर रहे थे। यहां पार्टी ने संघ-पृष्ठभूमि के एक नेता को उम्मीदवार बना दिया! कांग्रेस ने यह सीट जीत कर अपनी ताकत का एहसास जरूर कराया। मध्यप्रदेश की राजनीतिक सर्किल में इसे नरोत्तम मिश्र की ‘कलाकारी’ का नतीजा माना जा रहा है!
पर बांकीपुर में भाजपा की हार किसी ‘एक नेता की सियासी कलाकारी’ नहीं हो सकती! नतीजे और उसके आंकड़ों पर गौर करें तो प्रशांत किशोर की जीत बहुत प्रभावशाली है, साफ दिखने वाली कन्विंनसिंग जीत! ऐसी जीत लोगों के राजनीतिक रुझान में बदलाव से संभव है या फिर किसी ‘व्यवस्थित राजनीतिक कलाकारी’ से!
बांकीपुर अपेक्षाकृत अमीरों और सवर्ण मध्यवर्गीय लोगों के संख्यात्मक प्रभाव वाली सीट मानी जाती है। पर यहां हुए चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से मात्र 34% लोगों ने मतदान किया! पिछले चुनाव में 41% से कुछ ज्यादा लोगों ने मतदान किया था।
इसका क्या मतलब है? क्या भाजपा के सवर्ण वोटरों में उत्साहित नहीं था? क्या इस वर्ग का एक उल्लेखनीय हिस्सा प्रशांत किशोर की तरफ स्थानांतरित हो गया था? क्या जेएन-जी प्रोटेस्ट में शामिल किशोरों-युवाओं ने अपने मां-पिता को भी ‘मतदान किसे करें’ के सवाल पर प्रभावित किया?
यह सीट भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे से रिक्त हुई थी। नवीन अब राज्यसभा के सदस्य हैं। लगभग तीस साल से पटना शहर की इस सीट पर भाजपा का कब्जा था! लेकिन जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा प्रत्याशी को हराकर चुनावी-राजनीति में एक विधायक के तौर पर अपनी पारी की शुरुआत की! चुनाव नतीजा अपने पक्ष में आने के तत्काल बाद जारी एक बयान में स्वयं किशोर ने कहा: ‘भाजपा का 30 सालों का यह गढ़ 30 दिनों मे ही ढह गया!’
बांकीपुर में भाजपा की चुनावी हार इसीलिए सिर्फ एक उपचुनाव की हार न होकर राज्य और केंद्र स्थित उसके तमाम दिग्गज नेताओं के ‘रणनीतिक कौशल’ की विफलता का स्मारक भी बन गयी है! इस वक्त बिहार भी आधिकारिक तौर पर भाजपा-शासित राज्य बन चुका है!
आजादी के बाद पहली बार भाजपा के मुख्यमंत्री की अगुवाई में सरकार चल रही है। लेकिन मध्यप्रदेश की तरह यहां भी भाजपा अपनी एक महत्वपूर्ण परंपरागत सीट नहीं बचा पाई! वह भी एक ऐसी पार्टी से हारी, जिसने इस जीत से ही अपनी विधानमंडलीय राजनीति की पारी का प्रारम्भ किया है!
मजेदार बात कि प्रशांत किशोर चुनावी राजनीति में आने से पहले ‘चुनाव-प्रबंधकार’ थे और अपने चुनाव-प्रबंधन कौशल का उन्होंने पहला प्रयोग गुजरात में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को 2012 का विधान सभा चुनाव जिताने में किया था! वह कामयाब रहे। फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में भी मोदी-शाह ने भाजपा को जिताने के लिए अपना कौशल दिखाने का उन्हें मौका दिया!
भाजपा के अलावा उन्होंने कांग्रेस, जनता दल(यू), तेलुगु देसम पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस सहित कई दलों के लिए ‘चुनावी प्रबंधकार’ की भूमिका निभाई।
किशोर को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि राजनीतिक दलों को सलाह देते-देते उन्हें 2016-17 में ही लगने लगा था कि उन्हें भी चुनाव राजनीति में उतरना चाहिए। सन् 2018 में उन्होंने अपना राजनीतिक करियर जनता दल(यू) से शुरू किया। नीतीश कुमार ने उन्हें अपनी पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। किसी पत्रकार ने उनसे इस बारे में नीतीश से पूछा तो उन्होंने बेहिचक बोला: ‘अमित शाह जी के कहने पर न, हम इनको अपनी पार्टी में लिये!’
कुछ समय बाद नीतीश कुमार और उनकी पार्टी से किशोर का मोहभंग हो गया। फिर उन्होंने 2024 में जनसुराज नामक पार्टी बनाकर चुनावी-राजनीति में उतरने का फैसला किया।
जनसुराज पार्टी ने नवम्बर, 2025 में बिहार विधान सभा की कुल 243 में 238 सीटों पर जमकर चुनाव लड़ा पर उसे एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली। निजी तौर पर प्रशांत किशोर तब चुनाव नहीं लड़े! वह चुनाव में पार्टी के मुख्य संचालक थे। लेकिन आठ महीने बाद जब बांकीपुर सीट के लिए उपचुनाव घोषित हुआ तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी का ऐलान सबसे पहले किया।
भाजपा अपना उम्मीदवार चुनने में कुछ उधेडबुन में नजर आई! जिस उम्मीदवार का उसने नाम घोषित किया, उसे फौरन वापस भी ले लिया। फिर अपेक्षाकृत एक युवा नेता को मैदान में उतारा गया! राजननीतिक तौर पर देखें तो चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की जिम्मेदारी मुख्य विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल की थी। लेकिन उसने अपने महिला उम्मीदवार के पक्ष में खास प्रचार-अभियान नहीं चलाया! न जाने क्यों, उसके चुनाव-प्रचार में शुरू से आखिर तक सुस्ती रही!
भाजपा ने प्रत्याशी बदलने के बाद अपना प्रचार अभियान तेज जरूर किया लेकिन संगठित और व्यवस्थित प्रचार अभियान के मामले में प्रशांत किशोर सबसे आगे दिखे!
बिहार के बांकीपुर में भाजपा की हार की ज्यादा चर्चा के तीन कारण महत्वपूर्ण हैं: 1: भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा छोड़ी सीट (वह राज्य सभा के लिए चुने जा चुके हैं) पर भाजपा का हारना, 2: बहुचर्चित चुनाव-प्रबंधकार प्रशांत किशोर का उम्मीदवार बनना और जीतना! 3: दिल्ली, मुंबई और पटना सहित देश के अनेक शहरों में जुलाई 2026 के जेन-जी प्रोटेस्ट के दौरान इन तीन स्थानों पर उपचुनाव लड़े जा रहे थे! नतीजा 3 अगस्त को आया। इसलिए बहुत सारे लोगों को इस नतीजे में ‘जेन-जी प्रोटेस्ट’ की भूमिका भी दिख रही है!
विधानसभा में प्रशांत किशोर फिलहाल अपनी पार्टी के इकलौते विधायक होंगे। लेकिन बेहद तेज तर्रार होने के चलते वह निश्चय ही महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करना की हरचंद कोशिश करेंगे। उनका लक्ष्य होगा, ‘इकलौते’ होने के बावजूद अपने-आपको बिहार की राजनीति के केंद्र में लाना। क्या उनके निशाने पर सिर्फ बिहार के मुख्यमन्त्री सम्राट चौधरी होंगे या भाजपा की केंद्रीय राजनीति भी?
क्या वह केंद्रीय स्तर पर होने वाले विवादास्पद फैसलों के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की सरकार के खिलाफ विपक्ष की मोर्चाबंदी का भी हिस्सा बनेंगे? देखना होगा कि इन दो सवालों पर निकट भविष्य में प्रशांत किशोर क्या करते हैं? उनकी भावी राजनीति की तस्वीर तभी साफ होगी!
(उर्मिलेश प्रिंट और टीवी मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं और यूट्यूब चैनल UrmileshOfficial भी चलाते हैं।)