अभी हाल में ह्वाइट हाउस में अपने वरिष्ठ सहयोगियों के साथ एक बैठक के दौरान डॉनल्ड ट्रंप ने आपा खो दिया। ईरान को हरा पाने की हताशा उन्होंने अपनी आवाज ऊंची कर जताई। अमेरिकी टीवी चैनल एनबीसी न्यूज के हवाले से आई इस खबर को दुनिया भर के मीडिया में प्रमुखता से जगह मिली। इस खबर के मुताबिक ट्रंप ने अमेरिका के पास उपलब्ध सैन्य विकल्पों और संघर्ष के “अंतिम पड़ाव” तक पहुंचा सकने में विफलता पर अपना गुस्सा जाहिर किया।
हालांकि राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से लगातार आत्म-विश्वास प्रदर्शित करते रहे हैं, लेकिन अधिकारियों ने बताया कि ना तो ट्रंप और ना ही उनके सबसे करीबी सलाहकार वर्तमान स्थिति से संतुष्ट हैं। (1)
ट्रंप और उनके रणनीतिकारों की लाचारी समझी जा सकती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्थापित हुए सिद्धांतों को तोड़-फोड़ कर अमेरिकी साम्राज्य का बेलगाम दबदबा कायम करने की कोशिश में वेनेजुएला पर ‘सफल’ हमले और वहां के राष्ट्रपति को अगवा करने के बाद ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका के अश्वमेध अभियान का निशाना ईरान को बनाया। वहां कामयाब होते, तो अगले मुकामों से होते हुए मकसद चीन तक पहुंचना था। मगर अश्वमेधी घोड़े को ईरान ने ही बांध लिया और उसे बांधे रखने पर अडिग है। इससे कैसी सूरत बनी है, उस पर मशहूर युद्ध विशेषज्ञ और शिकागो विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रॉबर्ट ए. पेप की ये टिप्पणी खास रोशनी डालती हैः
“35 वर्षों से अमेरिका इस सैन्य सिद्धांत पर निर्भर रहाः अग्रिम अड्डे (Forward bases), वायु वर्चस्व (Air superiority), सटीक हमले (Precision strike), और द्रुतगामी विजय (Rapid victory). संभवतः ईरान युद्ध ने इन चारों स्तंभों को ध्वस्त कर दिया है। 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद से अमेरिकी रणनीति यह मान कर चली कि अपरिमित तकनीक के जरिए क्षेत्रीय विरोधियों को तीव्र गति और आसानी से पराजित किया जा सकता है। लेकिन आज सस्ती मिसाइलों और बड़े पैमाने पर निर्मित किए जा सकने वाले ड्रोन्स से अमेरिकी अड्डों, सहयोगियों, और महत्त्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निरंतर दबाव बनाए रखना संभव हो गया है। बदलाव अमेरिकी तकनीक में नहीं आया है। बदलाव उन शक्तियों ने लाया है, जो सटीक हमला करने में सक्षम हो गए हैँ।….
असल सवाल यह नहीं है कि क्या अमेरिका ईरान युद्ध में जीत पाएगा। असल सवाल यह है कि हर साल ऐसे युद्ध मॉडल पर लगभग एक ट्रिलियन डॉलर खर्च किया जा रहा है, जिसका अब अस्तित्व ही नहीं है। अगर यह बात सच है, तो मुद्दा सिर्फ ईरान नहीं है। यह हमारे समय की रणनीतिक एवं राजनीतिक पहचान तय करने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है।” (2)
प्रश्न है कि क्या युद्ध के बदले रूप एवं ‘शत्रु’ की ताकत का बिना ठोस अंदाजा लगाए अपने उतावले स्वभाव के कारण, और पीट हेगसेट जैसे अपने युद्ध-उन्मादी सहयोगियों के बहकावे में आकर अथवा इजराइल के प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतन्याहू से ब्लैकमेल होकर ट्रंप ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला बोलने का फैसला ले लिया था? जब ह्वाइट हाउस में उनके आपा खो देने खबर आई, तो उनके प्रशासन में राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी केंद्र के निदेशक रह चुके जो. केंट (जिन्होंने ईरान से युद्ध शुरू करने के निर्णय के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था) ने टिप्पणी कीः
“यही कारण है कि युद्ध से क्या हासिल करना है, वह मकसद कैसे हासिल होगा और दुश्मन की कैसी प्रतिक्रिया होगी, इसे साफ तौर पर परिभाषित किए बिना जंग की शुरुआत नहीं की जाती। पहले उन पैमानों को तय करना होता है, जिनसे बाद में मालूम हो सके कि आपने अपना मकसद हासिल कर लिया है। वरना, अंततः आप उस जगह पर पहुंचेंगे, जहां आज हम हैं- यानी बमबारी अभियान में उलझे हुए हैं, जबकि रणनीति की अभी तलाश की जा रही है।” (3)
आज सूरत यह है कि ट्रंप ने अमेरिका को ऐसे युद्ध में उलझा रखा है, जिससे अमेरिका की कमजोरियां रोज-ब-रोज दुनिया के सामने उजागर हो रही हैं। इस हकीकत के बीच खुद अमेरिकी विशेषज्ञ यह मानने लगे हैं कि अपने अश्वमेध अभियान को आगे बढ़ाने में उनका देश फिलहाल सक्षम नहीं रह गया है। इसकी वजह उसके अस्त्र भंडारों का चूक जाना है।
जुलाई के आखिर में अमेरिकी थिंक टैंक- सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि ‘हाल के हफ्तों में ईरान के साथ युद्ध अचानक तेज होने से अमेरिकी सेना का हथियारों का भंडार गंभीर रूप से खाली हो गया है। इसमें महत्त्वपूर्ण वायु रक्षा मिसाइलों का स्टॉक भी शामिल है।’ थिंक टैंक के विशेषज्ञों ने कहा कि मिसाइलों की यह कमी अन्य मोर्चों पर मुकाबला करने की अमेरिका की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। CSIS ने अनुमान लगाया है कि,
अमेरिकी भंडार में 827 से कम पैट्रियट इंटरसेप्टर और 278 से कम थाड (THAAD) बैलिस्टिक मिसाइल इंटरसेप्टर बचे हैं।
टीवी चैनल सीएनएन ने अपने तीन स्रोतों के हवाले से बताया कि CSIS के ये अनुमान सरकार के आंतरिक आंकड़ों के काफी करीब हैं।
ये आंकड़े युद्ध से पहले के भंडार में एक बड़ी गिरावट को दर्शाते हैं, जिसके अनुसार CSIS का अनुमान था कि अमेरिकी भंडार में लगभग 2,200 पैट्रियट और 452 थाड मिसाइलें शामिल थीं। ये सिस्टम दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने के लिए अमेरिकी सेना का प्राथमिक जरिया रहा है। हर इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत दसियों लाख डॉलर है।
CSIS के विशेषज्ञों ने लिखा- घटते भंडार के कारण अमेरिका और उसके गठबंधन सहयोगियों को मिसाइलों को हवा में ही मार गिराने के मामले में अब अधिक जोखिम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। (4)
अखबार ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ की एक हालिया रिपोर्ट में भी अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर पड़ रहे भारी दबाव को लेकर बड़ा खुलासा किया गया है। इस खबर के अनुसार,
यूरोप में अमेरिकी सैन्य कमान के प्रमुख जनरल एलेक्सस ग्रिनकेविच ने पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) को एक गोपनीय पत्र भेजा है।
इसमें उन्होंने चेतावनी दी है कि उनके पास भूमध्य सागर में पर्याप्त नौसैनिक बल (विशेष कर नौसेना के विध्वंसक पोत) नहीं बचे हैं, जो ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों से इजराइल की रक्षा जारी रख सकें।
जनरल ग्रिनकेविच ने स्पष्ट कहा कि पेंटागन तुरंत कम-से-कम एक और अमेरिकी नेवी डिस्ट्रॉयर तैनात नहीं करता है, तो उन्हें इजराइल की हवाई सुरक्षा करने के बजाय अपनी “मातृभूमि” (अमेरिका) और उसके प्राथमिक हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी पड़ेगी।
वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक पिछले कई महीनों से चले आ रहे युद्ध में ईरान और यमन के हूती विद्रोहियों की मिसाइलों को गिराने के लिए अमेरिकी नौसेना ने बड़े पैमाने पर अपनी उन्नत इंटरसेप्टर मिसाइलों (जैसे THAAD और Aegis सिस्टम) का इस्तेमाल किया है, जिससे उनका रक्षा भंडार तेजी से घटा है।
स्पेन (रोटा) में तैनात अमेरिकी नौसेना के जहाजों के लगातार मिशन पर रहने के कारण मेंटेनेंस (मरम्मत और रखरखाव) का दबाव बढ़ गया है, जिससे सक्रिय जहाजों की उपलब्धता कम हो गई है।
होरमुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में भी अमेरिकी नौसैनिक जहाजों की तैनाती के कारण उनके बेड़े अलग-अलग मोर्चों पर बंटे हुए हैं।
कुल मिलाकर इस खबर का संदेश है कि ईरान के साथ युद्ध अब उस मोड़ पर पहुंच रहा है, जहां दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना के संसाधनों की सीमाएं सामने आने लगी हैं। (5)
अमेरिका ने अश्वमेधी घोड़े को इस मकसद से छोड़ा था कि वह चीन के सहयोगी देशों को परास्त करते हुए अंतिम मोर्चे (चीन तक) पहुंचेगा, जो दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा और सबसे वास्तविक चुनौती बन कर उभरा है। अब दरपेश हकीकत यह है कि अमेरिका की कमजोरियों को जग-जाहिर करने में खुद चीन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
चीन ने युद्ध में ईरान को कितनी और किस रूप में मदद दी, यह अस्पष्ट है। लेकिन इस क्रम में यह जरूर साफ हुआ है कि अमेरिका की रक्षा तैयारियां फिलहाल निर्णायक रूप से चीन के भरोसे हैं। भूमंडलीकरण के दौर में अमेरिकी रक्षा कंपनियों ने अपने उत्पादन के कुछ हिस्सों की आउटसोर्सिंग चीनी कंपनियों के हाथ कर दी। अब उन्हें अहसास हुआ है कि ऐसा करके उन्होंने अपने हाथ के कुछ हिस्से काट दिए थे।
बहरहाल, उससे भी ज्यादा अमेरिकी निर्भरता रेयर अर्थ खनिजों पर चीन के लगभग पूरे वर्चस्व के कारण बनी है। चीन के रेयर अर्थ सामग्रियों के निर्यात पर रोक लगा देने का अमेरिका के रक्षा उत्पादन और उसकी सैन्य आपूर्ति शृंखला पर अत्यंत गंभीर और सीधा असर पड़ा है। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों ने इसे पेंटागन की सबसे बड़ी नाकामी बताया है। चीन के इस कदम के प्रभाव और उसके हो रहे गंभीर परिणामों पर गौर करेः
चीन ने गैलियम, जर्मेनियम, एंटीमनी, ग्रेफाइट, और हैवी रेयर अर्थ एलिमेंट्स के अमेरिका को निर्यात पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। ये मामूली खनिज नहीं हैं। ये आधुनिक सैन्य उपकरणों की रीढ़ हैं।
मसलन, एंटीमनी का उपयोग बारूद, मिसाइल सिस्टम, बख्तरबंद वाहनों, और नाइट-विज़न गॉगल्स की बैटरी बनाने में होता है।
गैलियम और जर्मेनियम F-35 लड़ाकू विमान के आधुनिक रडार, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम और सैटेलाइट कम्यूनिकेशन की चिप्स के उत्पादन के लिए अनिवार्य हैँ।
दुर्लभ मैग्नेट्स (Neodymium & Dysprosium) नौसेना के युद्धपोतों, टॉरपीडो और ड्रोन मोटर्स के निर्माण के लिए जरूरी हैं।
चीन के निर्यात प्रतिबंध लगाने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में एंटीमनी और रेयर अर्थ मैग्नेट की कीमतों में 200 से 500 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी देखी गई। लॉकहीड मार्टिन (F-35 निर्माता), रेथियॉन और बोइंग जैसी बड़ी अमेरिकी रक्षा कंपनियों को पुर्जों की भारी कमी का सामना करना पड़ा है, जिससे नए लड़ाकू विमान, मिसाइलों और गोला-बारूद के उत्पादन की समयसीमा में वे पिछड़ गई है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी रक्षा विभाग के पास एंटीमनी और कुछ दुर्लभ धातुओं का राष्ट्रीय आपातकालीन भंडार बेहद सीमित था। चीन से आपूर्ति रुकने के बाद यह स्टॉक तेजी से घट रहा है, जिससे अमेरिकी सेना की युद्ध-तैयारी को लेकर वॉशिंगटन में खतरे की घंटी बज रही है।
इस गंभीर संकट से निपटने के लिए अमेरिका सरकार ने इतिहास का सबसे बड़ा “औद्योगिक नीति अभियान” शुरू किया है। रेयर अर्थ खनिजों की कमी पूरी करने के लिए उसने पैक्स सिलिका जैसे गठबंधन बनाए हैं। उसने ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, और सऊदी अरब जैसे मित्र देशों के साथ मिलकर प्रोसेसिंग इकाइयां लगाने की पहल की है, ताकि चीन पर निर्भरता खत्म की जा सके। लेकिन ये सारे प्रयास अभी आरंभिक दौर में हैं। इन पर अमल से जुड़ी कई चुनौतियां अभी सामने हैं। इन क्रम में निवेश से लेकर तकनीक और प्रशिक्षित विशेषज्ञों एवं कर्मियों की कमी जैसी मुश्किलें मौजूद हैं।
CSIS ने कहा है कि रेयर अर्थ धातुओं के खनन और उनकी रिफाइनिंग/ प्रोसेसिंग क्षमता हासिल करने में अमेरिका को कम-से-कम पांच से सात साल लगेंगे। फिलहाल, अमेरिकी मीडिया ऐसी चर्चाओं से भरा-पड़ा है कि चीन के प्रतिबंध अमेरिका के खिलाफ उसका ‘रणनीतिक हथियार’ साबित हुए हैं। (6)
इन्हीं परिस्थितियों ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के हाथ बांध दिए हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि गुजरे पांच महीनों में ईरान ने पश्चिम एशिया के सामरिक समीकरण बदल दिए हैं। उसने ऐसी स्थिति पैदा की है, जिसमें उस क्षेत्र के जो देश अमेरिक सैन्य अड्डों को अपनी सुरक्षा की गारंटी समझते थे, उन्हें आज वे अड्डे जोखिम का स्रोत नजर आने लगे हैं। इससे उस क्षेत्र पर अमेरिका दशकों से चले आ रहे वर्चस्व की जड़ें कांपती नजर आई हैं।
ईरान में तख्ता पलट, वहां अपने कठपुतली को राजगद्दी पर बैठाने और ईरान के तेल भंडार को अमेरिकी कंपनियों को सौंपने के लक्ष्य को छोड़ देने पर ट्रंप प्रशासन पहले ही मजबूर हो चुका है। इन मकसदों को छोड़ने के बाद ही उसने युद्ध खत्म करने के लिए ईरान के साथ एमओयू पर दस्तखत किए थे। हालांकि उस दस्तावेज में वह होरमुज जलमार्ग पर ईरानी संप्रभुता को स्वीकार करता मालूम पड़ा था, लेकिन बाद में उस बिंदु की अलग व्याख्या कर ट्रंप ने फिर से हमले शुरू कर दिए। मगर युद्ध का ये दूसरा दौर अमेरिका को और भी भारी पड़ा है।
अब मुख्य सवाल होरमुज जलमार्ग पर आकर टिक गया है। ईरान इस इरादे पर अडिग है कि इस जलमार्ग से होने वाला नौवहन अब उसकी इजाजत के बिना संभव नहीं होगा। अमेरिका के लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं है, क्योंकि इसका अर्थ सदियों से चले आ रहे पश्चिमी वर्चस्व के अंत को स्वीकार कर लेना होगा। उसके सामने यह सवाल खड़ा है कि पश्चिमी साम्राज्यवाद के नेता के रूप में होरमुज जलमार्ग को खुला रखवाने में वह कामयाब नहीं हुआ, तो फिर महाशक्ति के रूप में उसका कैसा रुतबा बचेगा? और क्या यहां से विश्व व्यापार मार्गों के संचालन एवं प्रबंधन का एक नया चलन अस्तित्व में नहीं आ जाएगा, जिसमें पश्चिम सर्वोपरि नहीं, बल्कि कई शक्तियों में से सिर्फ एक शक्ति होगा?
दुनिया के सामने यह तथ्य भी मौजूद है कि 28 फरवरी 2026 तक होरमुज जलमार्ग का कोई मुद्दा मौजूद नहीं था। यह जलमार्ग मुक्त नौवहन के लिए खुला हुआ था। ईरान ने उस पर नियंत्रण अमेरिका और इजराइल के हमलों के कारण स्थापित किया। मतलब यह कि ये दोनों ताकतें ईरान में मनचाहा खेल तो नहीं ही कर पाईं, उलटे उनकी कमजोरी का परिणाम यह हुआ कि एक प्रमुख जलमार्ग पर ईरान का नियंत्रण बन गया है। दुनिया के भावी इतिहास में इसे उनकी करारी शिकस्त के रूप में दर्ज किया जाएगा। और यह घटना युग परिवर्तनकारी मानी जाएगी।
(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)