मुंबई। “जलेस” जनवादी लेखक संघ, मुंबई और “स्वर संगम” के सौजन्य से शनिवार, 29 अगस्त 2026 की शाम को प्रसिद्ध उर्दू कथाकार ‘अली इमाम नक़वी’ के बहुचर्चित उपन्यास “तीन बत्ती के रामा” (हिंदी संस्करण) के विमोचन समारोह और रचना-प्रक्रिया पर चर्चा का कार्यक्रम आयोजित किया गया।
‘तीन बत्ती के रामा’ 1990 में प्रकाशित कथाकार अली इमाम नक़वी का उर्दू उपन्यास है। हाल ही में ‘रेखता समूह’ ने इसे हिंदी में प्रकाशित किया है।
यह उपन्यास हाशिए पर रहने वाले उन कामगार वर्ग पर केंद्रित है, जो मुंबई के मलाबार हिल, कफ़ परेड, भूलेश्वर जैसे संपन्न इलाकों में रहने वाले अमीरों के फ्लैट्स में बतौर घरेलू सहायक काम करते हैं। मुंबई की विशेष बोली में इन्हें ‘रामा’ कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि यह शब्द पारसियों ने दिया हो ये रामा महाराष्ट्र के कोंकण, गुजरात और देश के विभिन्न प्रदेशों से रोज़गार की तलाश में मुंबई आते हैं और यहाँ आकर मुंबई की चकाचौंध में जीने वाले अमीरों की सेवा में अपनी ज़िंदगी बिता देते हैं।
मलाबार हिल के तीन बत्ती सिग्नल के इर्द-गिर्द ऐसे ही कुछ रामा रोज़ इकट्ठा होते हैं। यहाँ बैठकर कुछ पलों के लिए अपने सुख-दुख साझा करते हैं और सभ्य दिखाई देने वाले अपने मालिकों की काली दुनिया के किस्से भी सुनाते हैं। उपन्यास की खास बात यह है कि इन रामाओं की विशेष मुंबईया बोली और संवादों के माध्यम से शहरी जीवन के यथार्थ को उजागर किया गया है। साठ के दशक में शैलेश मटियानी द्वारा रचित उपन्यास ‘कबूतर खाना’ में भी मुंबई के इन रामाओं के जीवन संघर्ष को मुंबईया शैली में पेश किया गया है।
इस महत्त्वपूर्ण गोष्ठी की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार धीरेन्द्र अस्थाना ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में कथाकार असग़र वजाहत, इक़बाल नियाज़ी और हृदयेश मयंक मंच पर उपस्थित थे। पुस्तक के अनुवादक अनवर मिर्ज़ा तथा असलम परवेज़ और वक़ार क़ादरी ने उपन्यास की रचना-प्रक्रिया पर अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम की शुरुआत में महिलाओं के अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष करने वाली ‘कॉमरेड सोनिया गिल’ के असमय निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसके बाद साहित्य अकादमी से सम्मानित वक़ार क़ादरी ने “तीन बत्ती के रामा” का अंश पाठ कर श्रोताओं को उपन्यास की आंशिक झलक से रूबरू कराया।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में धीरेन्द्र अस्थाना ने सबरंग पत्रिका के संपादन के समय अली इमाम नक़वी से अपनी मुलाकात का ज़िक्र किया। ‘तीन बत्ती के रामा’ को एक बेहतरीन उपन्यास बताते हुए उन्होंने कहा कि यह एक ही बैठक में पढ़ लिए जाने वाला उपन्यास है—यही इसकी सफलता का राज़ है। सत्तर के दशक के रामू काका का परिवर्तन ही रामा है। हिंदी अनुवाद के लिए अनवर मिर्ज़ा को बधाई देते हुए उन्होंने बेबाकी से कहा कि किताब में नब्बे के दशक की बंबई का ज़िक्र हो रहा है, इसलिए बंबई को बंबई ही रहने दें, इसे मुंबई में न बदलें।
वरिष्ठ कथाकार असग़र वजाहत ने कहा कि श्रमिक व मज़दूर वर्ग के जीवन की सच्चाई पर लिखना आसान काम नहीं है। मज़दूरों और श्रमिकों के चेहरों की सादगी और सच्चाई के ताप को गहराई से जान पाना मध्यमवर्गीय जीवन जीने वाले लेखक के लिए कठिन है। अली इमाम नक़वी का यह कमाल है कि उन्होंने इस उपन्यास में उस वर्ग के जीवन-संघर्ष को उन्हीं की भाषा में उतारा। उन्होंने रेखांकित किया कि सादगी के बिना सच्चाई का तजरुबा नामुमकिन है।
वरिष्ठ साहित्यकार हृदयेश मयंक ने अली इमाम नक़वी के संग बिताए पलों को साझा किया और श्रमिक वर्ग तथा सेठों के घरों में काम करने वाले स्त्री-पुरुष नौकरों के जीवन-संबंधों के अंतर्द्वंद्व पर अपनी बात रखी।
“तीन बत्ती के रामा” के अनुवादक अनवर मिर्ज़ा ने संक्षेप में कहा कि उपन्यास के विषय से प्रभावित होकर उन्होंने इसे हिंदी में लाने का निश्चय किया ताकि एक बड़े तबके तक इस उपन्यास पहुँचे।
ड्रामा निगार और फिल्म निर्देशक इक़बाल नियाज़ी ने उपन्यास पर बड़े रोचक अंदाज़ में लिखा अपना मज़मून सुनाया। लेखन-शैली पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह उपन्यास फिल्म की तरह देखा जाने वाला उपन्यास है। इसमें आए दृश्य किसी फिल्म की तरह स्पष्ट दिखाई देते हैं। उपन्यास से गुज़रना यानी मुंबई को हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों की नज़रों से देखना है— यह उपन्यास कई सवालों को जन्म देता है।
शैलेश सिंह ने अली इमाम नक़वी के साथ बिताई स्मृतियाँ साझा कीं। उन्होंने कहा कि अली इमाम नक़वी को श्रमिक वर्ग के मनोविज्ञान की गहरी समझ थी। श्रमिक वर्ग में अभी नैतिकता बाक़ी है, जबकि उच्च वर्ग में नैतिकता का पतन हुआ है। उन्होंने जगदम्बा प्रसाद दीक्षित के उपन्यास ‘मुर्दा घर’ का भी ज़िक्र किया।
उर्दू लेखक और रंगकर्मी असलम परवेज़ ने अली इमाम नक़वी की कहानियों पर विस्तार से लिखे अपने लेख का एक अंश पढ़कर सुनाया, जिसमें मुंबई में उर्दू अफ़साने की रिवायत और अली इमाम नक़वी के साहित्य का आलोचनात्मक जायज़ा लिया गया।
जलेस केंद्रीय परिषद के सदस्य सुबोध मोरे ने मुंबई के कामगार वर्ग को केंद्र में रखकर लिखे गए मराठी साहित्य की चर्चा की। उन्होंने उर्दू, हिंदी और मराठी के बीच निरंतर अनुवाद के ज़रिए आदान-प्रदान की बात कही। इस अवसर पर उन्होंने मराठी लेखक जयंत पवार और अमर शेख को भी याद किया—29 अगस्त दोनों का स्मृति दिवस भी है।
इस अवसर पर राकेश शर्मा, जे आर यादव, पुलक चक्रवर्ती, कल्पना महापुस्कर, राजीव रोहित, कबीर खान, ज़िया नक़वी, मिथिलेश प्रियदर्शी, फिरोज़ खान, संदीप माने, मुस्तहसन अज़्म, ज़ाकिर सरदार, समीर त्र्यंबक, शिरीष हाटे, कल्पना उबाले, कल्पना पांडे, बेबी नाज़, वसीम अकील शाह, संजय पांडे, दिनेश गुप्ता और कई महत्वपूर्ण साथी शामिल हुए।
कार्यक्रम का संचालन जलेस महाराष्ट्र के सेक्रेटरी मुख्तार खान ने किया। अंत में जलेस मुंबई के अध्यक्ष संजय भिसे ने अतिथियों और उपस्थित सभी दर्शकों का आभार व्यक्त किया।
(जलेस, मुंबई के मुख्तार खान / रीता दास राम की रिपोर्ट)