बांस, मछली और धान में बसती है असम और अरुणाचल की जिंदगी

यह मेरे कारोबारी और घुमक्कड़ी जीवन की पृष्ठभूमि में बचपन से बड़े होने की कहानी है, जो दरअसल इसी समाज के एक हिस्से की कहानी है। मैं पैदा हुआ उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में लेकिन हमारे पुरखे बिहार के भोजपुर जिले के भकुरा गाँव के रहने वाले थे। पिताजी के दस्तावेजों से सात पीढ़ी पहले पैदा हुए टेंगर जी का नाम झांकता है, जो गंगा के दलदली इलाके में उभरते एक नये गाँव में कहीं दूसरे गाँव से लाकर बसाये गये थे। इस गाँव की जमींदारी यहाँ से तीन कोस पश्चिम गोड़ी गाँव के अंदर आती थी, इसलिए पहली राहत की बात जमींदार सिर पर सवार नहीं होता था और दूसरी राहत की बात एक भी घर पंडितों का नहीं था।

लेकिन, गाँव के आधे से अधिक घर जान हलकान करने के लिए ठाकुरों के थे जिन्होंने अपनी सुविधा और जरूरतों के हिसाब से बाकी लोगों को बसाया था जिसमें एक घर लाला, एक घर डफालियों का, गाँव के बाहर कुछ घर चमारों के, एक घर धोबी जो गाँव के बाहर धिवहीं पोखरी में कपड़ा धोते थे, एक तेली, दो जुलाहों के और बाकी यादवों के। लेकिन एक भी दर्जी नहीं था, यह काम महिलाओं के जिम्मे था।

टेंगर जी के पास अपनी कोई निजी सम्पत्ति न थी, जमीन का टुकड़ा जिस पर झोपड़ी बनी थी वह ठाकुरों की बेगारी के एवज में मिली थी। हां हुजूर के पास अपना एक सामान था जिसे वह विस्थापित होकर आते समय साहब पीठ पर ढोकर लाये थे जिसे उन्होंने झोपड़ी के बाहर लगाया था। जहाँ वह गांव के किसानों और ठाकुरों के खुर्पी, हंसुआ, दंराती, गड़ासा, हल का फाल आदि फरगते या नया बनाते थे, जिसकी एवज में फसल कटने पर एक बार में उठाने भर का बोझा दिया जाता था, लेकिन अधिकांश ठकुराइनों की नजर बंध रहे बोझों पर गड़ी रहती थी कि लोग अधिक वजनी बोझा न बांध लें और ठाकुर अक्सर गांव की बहू-बेटियों को ताड़ते पाए जाते थे, जिससे वह अपनी रातें रंगीन बना सकें। कहीं-कहीं ऐसा भी होता था कि नई दुल्हन का डोला सबसे पहले इन्हीं के दरवाजे उतरता और अगले दिन दुल्हन अपने ससुराल जा पाती थी।

पत्थर का कोयला और लोहा छह कोश दूर आरा शहर में मिलता था, जिसे कंधे पर ढोकर लाना पड़ता था। बैलगाड़ी या इक्के पर चलने की औकात गांव के आम लोगों में न थी और दूसरी बात सामाजिक व्यवस्था तो मनुस्मृति के आधार पर थी, इसलिए पंडित और ठाकुर की नजरों के सामने बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी पर चढ़ें कैसे? यह तो सवर्णों की सवारी थी!

इसलिए जिसे नया सामान बनवाना होता वह शहर से खुद ही लोहा लाता और ठाकुरों के काम से बचे हुए पत्थर के कोयले के चूर-चार को हमारे पूर्वज मिट्टी और गोबर के साथ मिलाकर गुल बना लेते जो लोहे के जोड़ने के काम आता और बाकी कामों के लिए लकड़ी के कोयले का प्रयोग किया जाता था।

और बेगारी का आलम यह था कि मूंछों पर ताव देने वालों और जमींदार का बुलावा कब आ जाये, कोई ठीक न था। यदि हारी-बीमारी या किसी अन्य कारण से पहुंचने में देर हो जाये तो छाती पर खड़ाऊँ से मूंग दलना शुरू! क्योंकि शूद्रों के साथ मार-पीट और उनकी संपत्ति हड़पना तो उपनिषदों की बात है!

खैर, मुगल काल का सूरज डूब चुका था। ईस्ट इंडिया कम्पनी से सत्ता ब्रिटेन की महारानी के पास आ गयी, लेकिन हमारे पुरखों की कहें या इस उपमहाद्वीप की अधिकांश आबादी के तकदीर की चाभी तो भगवान कृष्ण ने यमुना में हेरवा दी, जिसे एक मछली लील के भाग गयी यूरोप। यहां ढुंढवइया हो रही थी वेद, उपनिषद और गीता में! जबकि भगवान जी कह रहे थे, ‘‘चारों वर्णों को मैंने बनाया है और शुद्रों के केवल सेवा को अधिकार है या उनका स्वभाव ही सेवा का है, यदि शूद्र सवर्णों की सेवा नहीं करेंगे तो समाज में विकृति आ जायेगी!

यूं ही घिसटते-पिसटते साल 1917 का दौर आया। पश्चिमी यूरोप में भयंकर लड़ाई के साथ-साथ समाजवाद भी अंगड़ाई ले रहा था तो यहाँ हिन्दुस्तान में सामन्ती व्यवस्था से पूँजीवाद अंकुरित हो रहा था। कलकत्ता, बंबई और मद्रास में लोहे के कल-कारखाने वजूद में आने लगे थे। मेरे दादा जो उस समय मात्र 13-14 साल के हुए ही थे, आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए कलकत्ता कमाने निकल पड़े। वैसे भी गंवई मजूर आर्थिक कारण के अलावा एक दूसरी वजह सवर्णों की मारपीट और बहु-बेटियों की सुरक्षा के मद्देनजर शहर या रेल लाइन की पटरी बिछाने के काम में गांव से पलायन कर रहे थे।

बहरहाल, दादा को लोहार की दुकान पर खुर्पी, हंसुआ, कड़ाही, कलछुल आदि बनाने के काम पर रख लिया गया। बचपन अभी बीता नहीं था और ऊपर से बंगाल के अत्यधिक नमी का वातावरण, लिहाजा पेट खराब। हुजूर पहुंचे एक बंगाली डाक्टर के पास फिर डाक्टर ने कहा, ‘‘खाने में हल्दी की मात्रा बढ़ा दो और झींगा मछली खाना शुरू करो।’’ दादा ने बहुत धीरे कहा, ‘‘डाक्टर साहब हम मांस-मछली नहीं खाते हैं।’’ बंगाली डाक्टर ने अपनी ऐनक उतार कर मेज पर रखा और पूछा, किस देवी-देवता की पूजा करते हो? ‘‘डाक्टर साहेब बिना नागा शिव जी को एक लोटा जल चढ़ाते हैं’’, दादा ने थोड़ा गर्व भरे अंदाज में जवाब दिया।

डाक्टर ने हंसते हुए कहा, अच्छा! भगवान शिव जो बाघम्बरी पहने हुए हैं, उस खाल को उतारने के बाद क्या मांस फेंक दिये होंगे! अरे घनचक्कर मांस-मछली तो भगवान का प्रसाद है, शाकाहारी का मतलब बिना लहसुन-प्याज का बना खाना, देखते नहीं सावन के महीने में देवियों को बकरे की बलि का भोग चढ़ाते हैं! और याद रखना लहसुन खाना मत छोड़ना नहीं तो खून गाढ़ा हो जायेगा और दिल के मरीज बन जाओगे। खैर, दादा ने मछली तो खाया नहीं लेकिन हल्दी की बढ़ी मात्रा ने पेट ठीक कर दिया।

पाँच-छह महीने बाद पता चला कि काशी के राजघाट पुल को दो मंजिला बनाने में बेहतर काम मिल सकता है तो शिवभक्त दादा निकल पड़े भोले की नगरी में भोले से मिलने, लेकिन आखरी पड़ाव से पहले आ गया कमबख्त मुगलसराय उनका रास्ता रोकने, क्योंकि यहाँ गाड़ी जो बदलनी पड़ती थी। कमबख्त रास्ता छेकइयां या गाड़ी बदलने का सिलसिला तब तक चला जब तक राजघाट का पुल अपने वर्तमान हालात में आ नहीं गया। इस तरह अजियाये दादा का तकिया कलाम बना ‘‘कमबख्त कहीं का’’। दादा को दादी उनके स्वभाव के विपरीत मिली-साक्षात रणचण्डी, खूब मछली खाने वाली और हुक्का पीने वाली। लेकिन दोनों में प्रेम भी घना था।

फिर काशी रेलवे का काम पूरा हुआ तो दादा प्लांट डिपो मुगलसराय के संस्थापक मिस्त्री बनकर मुगलसराय में बस गये। दादा की जिंदगी ढर्रे पर आयी तो आगे की पीढ़ी यानि पिताजी भी 1956 में रेलवे में आ गये। पिताजी खड़ाऊं पहने दुर्वासा ऋषि थे तो माताजी एकदम सीधी गाय। पिताजी पुस्तैनी कामों के माहिर होने के साथ-साथ लोहे-लकड़ी के बारीक कामों के जादूगर, लेकिन हुजूर के खड़ाऊं का निशाना इस कदर तेज था कि दूर से भी हम लोगों के पीठ पर सटीक निशाना साधते और पीठ एकदम लाल! लेकिन मेरे होंश संभालते-संभालते पिताजी ने इस पर काबू पा लिया।

मैं छः भाइयों में सबसे छोटा पेट पोच्छन होने के कारण मुझे बहुत लाड़-दुलार मिला, फलस्वरूप बेहद सकचुल्ली और नालायक बन गया। पांच लड़कों के बाद कम से कम एक लड़की की आस में दादी मेरे पैदा होने के पहले चल बसीं तो दादा मेरी चार साल की सकचुल्लीयाई से तंग आकर 1979 में ही कैलाशी हो गये। उम्र बढ़ी तो हाथ भी लपकने लगा। सोचा किसी की पाकेट साफ करने की जगह छत पर स्थापित भगवान के घर पर ही डकैती डाली जाये और देखें उ देखता है कि नहीं। उ देखे या न देखे उहै जाने, पर पहली बार डर लगा, इसलिए आमदनी से खरीदे गये लेमनचूस में से एक ठो देवता की पिण्डी पर रख दिया, फिर महीने-दो महीने में चवन्नी-अठन्नी के लेमनचूस में आत्मा-परमात्मा, देवी-देवता इतने चुसाये कि सब फिरंट!

जिन्दगी खिरामा-खिरामा आगे बढ़ती रही-स्कूल, प्रिंटिग का डिप्लोमा और फिर दिल्ली में अपने पांव पर खड़े होने की जद्दोजहद। इसी जद्दोजहद के दौरान अपने देश को घूमने का जुनून सवार हो गया। 

इन्हीं जुनूनी रोमांचक संस्मरणों को आगे के पन्नों पर साझा करता रहूंगा।

महाराज, यह तो गजब का देश है! महिलायें करघे पर बुनी चमकीली लुंगी पहनती हैं, अपने पतियों से उम्र में बड़ी हैं और अधिकांश पुरुष घर से निकलते समय कोई न कोई हथियार लेकर चलते हैं। बन्धु, यह अरुणाचल प्रदेश है और यात्रा संस्मरण सियोम घाटी के पूर्वोत्तरीय सीमांत इलाके ‘‘मेचुखा’’ का है।

इस यात्रा के साथी मित्र धीरज थे, जो परम हनुमान भक्त तथा टाइट जनेऊधारी पण्डित होने के कारण; ब्रह्मचारी बने हुए हैं, लेकिन दिल मचलता रहता है। चलते समय हम लोगों के मित्रों ने इनसे कहा कि वहाँ शादी की सम्भावना बन सकती है तो साहब अरुणाचल प्रदेश के आलो कस्बे में रात को एक सैलून में बाल और मूँछ रंगा के नौजवान बन गये।

26 अप्रैल, 2022 की रात गुवाहाटी से पूर्वी असम के आखिरी रेलवे स्टेशन मुरकंगसेलेक की यात्रा से इस यात्रा का आगाज होता है। असम राज्य पाँच हिस्सों में बंटा है, जिसमें ऊपरी असम के इलाकों की खूबसूरती अभी बची है और आबादी का घनत्व भी बहुत कम है। बाकी के हिस्सों के जंगल को पूंजी के प्रकोप ने काट कर प्लाई बोर्ड बना दिया है और अब जमीन के नीचे दबे कोयले की बारी है।

नौगांव के आगे ऊपरी असम का इलाका शुरू होता है, जो काफी विरल आबादी वाला हिस्सा है। गाँव के घर कंक्रीट की जगह बाँस के बने होते हैं और उन्हें ताड़ के पत्तों से छाया जाता है। इस तरह के घरों में खाना बनाने से लेकर पखाना करने तक की सभी सुविधाएं होती हैं। एक छोटे परिवार के लिए इस तरह की झोपड़ी बनाने में 50-60 हजार रुपये की लागत आती है।

घर के साथ ही लगा हुआ खेत होता है, जिसे बाँस की ठठरियों से घेर दिया जाता है। जहाँ पानी जमा हो जाये वहीं गढ़ई या पोखरी बन जाती है, क्योंकि इस भूभाग में तो आकाश से पानी चूता ही रहता है और बाँस इतना है कि पोखरी को घेरने में देर नहीं करते हैं, फिर मछली रानी पोखरी से रसोई में और फिर सुबह खाद बनने खेत में, फिर धान की फसल ऐसी लहलहाती है कि पूछिये मत!

अधिकतर लोग घर के पीछे सुअरबाड़े में सुअर भी खूब पालते हैं, लेकिन साफ-सफाई का बहुत ध्यान रखा जाता है। एक छोटे से कस्बे में रोज सुबह 20-25 मिनट में तीन-चार सुअर कट के बिक जाना आम बात है। यहाँ 50 किलो के वयस्क सुअर की कीमत 13000 रुपये तथा मछली 200 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकती है।

असम में रेलगाड़ियों के आने-जाने के लिये एक ही रेलपटरी पर चलाने का रिवाज है, जिसके कारण महज 500 किलोमीटर की दूरी को 11 घण्टे में तय करना निर्धारित किया गया है, फलस्वरूप एक्सप्रेस गाड़ी को हर स्टेशन पर आराम करने का पर्याप्त समय मिल जाता है और यात्री भी प्लेटफार्म पर तफरीह कर लेते हैं और हमारे जैसे लोग उपरोक्त वर्णन के लिये कस्बे का चक्कर भी लगा आते हैं, क्योंकि जब तक दूसरी गाड़ी नहीं आयेगी तो हमारी वाली के जाने का सवाल ही नहीं उठता है। कहा जा रहा है कि दूसरी पटरी बिछाने के लिये सरकार के पास पैसा नहीं है, लेकिन जिस तरह मोदी जी खाने के पैकेट से लेकर देश के गली-मुहल्ले में अपनी मुस्कान बिखेर रहे हैं तो यहाँ के मुख्यमंत्री उनसे एक कदम आगे गुवाहाटी रेलवे स्टेशन को अपने बड़े-बड़े होर्डिंगों से पटवा दिया है, न जाने इस तरह के प्रचार में कितना रुपया फूंका जाता है।

इस तरह की भड़ैती करने की जगह 56’’ के सीना वाले हमारे कद्दावर प्रधानमंत्री जी थोड़ी हिम्मत करें तो केवल सरकारी बैंकों के एनपीए की वसूली से सात लाख करोड़ रुपये से अधिक की रकम मात्र कुछ दिनों में इकट्ठा कर सकते हैं, जिससे देश की सभी परियोजनाओं के लिये धन की कोई कमी नहीं होगी और यदि आम आदमी के बराबर कॉरपोरेट घरानों से भी टैक्स वसूलें तो वर्ल्ड बैंक, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन जैसे फन्दे बाजों से हमेशा के लिये गला छूट जाये। असम के हर चुनाव में रेल पटरी का मुद्दा भी होता है और चुनाव से पहले हर पार्टी वादा भी करती है, देखें इस बार के वादे का क्या होता है?

मुरकंगसेलेक में मौसम बहुत सुहावना था और सुबह के आठ बज रहे थे। सूरज निकले लगभग 4:30 घंटे हो गये थे फिर भी हल्की-हल्की ठण्ड लग रही थी। मुरकंगसेलेक इस दिशा का आखिरी रेलवे स्टेशन है। जहाँ रेल की पटरी खत्म होती है उससे थोड़ा आगे रुकसिन नामक कस्बा है, वहाँ से पासीघाट की गाड़ी आसानी से मिल जाती है। स्टेशन के बाहर रेलगाड़ी से उतरने वालों की संख्या के लगभग बराबर इलेक्ट्रिक रिक्शे वाले आपका इंतजार कर रहे होते हैं, फलस्वरुप यात्रियों की खींचा-तानी भगदड़ का स्वरूप ले लेती है और कुछ ही देर में दोनों पक्ष कुत्ते की तरह जीभ निकाल कर हाँफने लगते हैं, इसी से पता चलता है कि देश में बेरोजगारी का क्या आलम है।

रुकसिन के आगे आबादी लगभग रुक सी जाती है, कहीं-कहीं इक्का दुक्का घर और धान के खेत दिखाई देते हैं। इस बार मार्च से ही पानी बरसने लगा था, इसलिये कुछ लोगों ने धान की रोपाई कर दी थी। इसके अलावा सुपाड़ी के बाग थे तो वहीं ताड़ महाशय अनायास ही दायें-बायें सिर उठाये खड़े थे। आजकल ताड़ के सुपाड़ी की मांग ज्यादा है। कुछ लोगों ने पॉम के बाग भी लगाये हैं और राज्य सरकार इसके बीज को खरीद भी लेती है, लेकिन तेल नहीं निकालती है। साथ बैठे ग्रामीणों को तेल न निकालने के बारे में कुछ खास नहीं पता था।

पोबा संरक्षित वन क्षेत्र के शुरू होते ही असम की सीमा का आखिरी पड़ाव आ गया। अरुणाचल प्रदेश में दूसरे राज्यों के लोगों को प्रवेश करने के लिये इनर लाइन परमिट दिखाना पड़ता है, जो कि अब ऑनलाइन भी बन जाता है। पोबा के जंगल में बाँस और बेंत की झाड़ियाँ थीं यहाँ एक इंच से लेकर 10 इंच तक के मोटे बाँस के पेड़ थे। एक घण्टे की यात्रा के बाद पासीघाट आ गया, यह बड़ी जगह है। आगे जाने वाली गाड़ी ग्यारह बजे की थी, लिहाजा खाना खाने और घूमने निकल पड़े।

ब्रह्मपुत्र नदी को अरुणाचल प्रदेश में ‘सियांग’ नाम से पुकारा जाता है। सियांग नदी के किनारे बसा पासी घाट पूर्वोत्तर की ओर के पहाड़ों की तरफ जाने का प्रवेश द्वार है। सब कुछ इसी रास्ते ऊपर की ओर जाता है। दुकानें उत्तर भारत जैसी ही हैं, लेकिन अधिकांश छोटी दुकानों में बेचने और खरीदने के कामों में महिलाएं ही नजर आ रही थीं। सब्जी, ताम्बूल (छिलका सहित सुपाड़ी), पान का पत्ता, गन्ने के गुड़ का ईंट, लाई साग (सरसों जैसा), कोउ पत्ता (चावल के आटे के घोल को कोउ पत्ता पर फैला कर पत्ते को मोड़ दिया जाता है और फिर इसे खौलते पानी में उबालते हैं। तैयार पीठे नुमा रोटी को सुबह नाश्ते में खाया जाता है), लिंगड का साग और कई तरह के पहाड़ी साग, केले का दिल (फूल), सूखी मछलियाँ, कीनू, संतरा आदि स्थानीय उत्पाद यहाँ की हर सब्जी बेचने वाली महिला अपने दुकान पर रखती है। अरुणाचल प्रदेश के तराई और ऊँचाई के लोग कीनू और संतरे के बाग लगाते हैं तो वहीं केले के जंगल अपने आप उग आते हैं। आजकल यहाँ के ऊँचाई वाले इलाकों में कीवी और सेव के बाग लगाने की कोशिश भी हो रही है।

पासीघाट से पहाड़ शुरू होता है। नदी के साथ थोड़ा ऊपर जाने पर सियांग नदी की मुख्य धारा के अलावा सैकड़ों अन्य जल धाराएं जाल बनाने की शक्ल में 30 से 35 किलोमीटर के फैलाव में फैली नजर आती हैं। यह दृश्य इतना मनमोहक होता है कि यहाँ से हिलने की इच्छा नहीं होती है।

दो घण्टे की यात्रा के बाद एक बाँस और ताड़ के पत्तों से बनी झोपड़ी में दोपहर का खाना हुआ। इस झोपड़ी नुमा घर के नीचे घाटी में तिब्बत से आने वाली सियांग नदी बहुत फैलाव के साथ हड़हड़ाते हुये बह रही थी।

कोमसिंग गाँव के पास सियांग की सहायक नदी ‘सियोम’ हमारी पथप्रदर्शक बन गई। कोमसिंग से आलो तक रोड की चैड़ाई को बढ़ाने के लिये पहाड़ की कटाई की जा रही थी और ऊपर से बदलों की मेहरबानी, फलस्वरूप लगभग 25 किलोमीटर का रास्ता कीचड़ से लबालब भर गया था। इसी में काम करते मजदूर, जिनमें से अधिकांश असम के चाय बागानों में काम करने वाले परिवारों से आते हैं। इनकी जिन्दगी में एक बार बहार (चारु मजूमदार की अगुवाई में चले नक्सलबाड़ी आन्दोलन से उपजी चेतना) आता दिख रहा था, लेकिन ऊपरवाले (यदि हो!) से वो भी देखा न गया, अब तो वह आंदोलन समाज में एक गाली बन गया है।

आलो या अलोंग तक पहुँचते-पहुँचते घाटी बहुत फैल गई है, इसलिये इसे पश्चिमी सियांग जिले का जिला मुख्यालय बनाया गया है। शाम के चार बज गये थे, लिहाजा यात्रा को विराम दे दिया गया। शहर की ऊँचाई 700 मीटर से अधिक नहीं है, फिर भी हल्के ठण्ड जैसा मौसम था। मेचुखा अभी मोटरगाड़ी से 7 घण्टे की दूरी पर था, इसलिये अगले दिन सुबह 5:30 बजे की चार पहिया वाहन में आगे की दो सीट बुक करवा लिया गया।

‘आलो’, ‘गालो’ और ‘आदि’ जनजाति का एक बहुत बड़ा कस्बा है। बहुसंख्यक आबादी की मान्यताओं में ‘डोनीपोलो’ (सूर्य-चंद्रमा) धर्म है, जिसे लगभग 50 वर्ष पूर्व एक बार फिर से संशोधित करके जीवित किया गया है। इनके मतावलम्बी दहकते लाल रंग का सूर्य (डोनी) और बैक ग्राउण्ड में सफेद रंग मतलब चंद्रमा (पोलो) का एक बड़ा सा झंडा अपने घर के दरवाजों पर लगा कर इस धर्म का अनुयायी होने की घोषणा करने से गुरेज नहीं करते हैं। इनकी तुलना में बौद्ध वाले एक पतली सी लम्बी झंडी फुरफुराते हैं तो वहीं ईसाई समुदाय वाले अभी झंडे की खोज में लगे हुए हैं।

आलो कस्बा बहुत फैली हुई घाटी में है, इसलिये जिला मुख्यालय है, जिससे बहुत सारे लोगों को सरकारी नौकरी मिली हुई है। जो व्यक्ति सरकारी नौकरी में होता है उसके निश्चित आय से उसका परिवार तो खाता ही है साथ में तीन-चार अन्य परिवारों का गुजारा कपड़ा, सौंदर्य प्रसाधन, सब्जी, राशन इत्यादि बेचकर चल जाता है, वहीं प्राइवेट सेक्टर की नौकरी से खुद के परिवार का ठीक-ठाक गुजारा हो जाये वही बड़ी बात है।

कस्बे में थल और वायु सेना वाले भी बड़ी संख्या में दखल रखते हैं। वायु सेना की एक हवाई पट्टी भी है, जिसमें रंगरूट लोग सुबह-शाम दौड़ने, चलने के साथ-साथ वर्जिश भी करते हैं, इनमें कुछ बुजुर्गवार भी अपनी चर्बी गला रहे थे, शायद अफसरान होंगे। फौज की एक कैंटीन भी है जहाँ आम नागरिक सुबह, दोपहर और शाम को बहुत कम दाम पर अपना पेट भर सकते हैं। खाना बनाने के लिए एक फौजी को लगाया गया है, जिनका वेतन 60000 रुपये प्रति माह है। सम्भवतः यह पहल जनजातियों में सेना की स्वीकार्यता के लिए किया गया होगा।

सवारी गाड़ी चलाने को छोड़कर अन्य कामों में महिलाओं का दखल कुछ ज्यादा ही है। असम के दुकानदार भी हैं तो इक्का-दुक्का बिहार के निवासी फल, सब्जी, बहुत तेज बस्साती सूखी मछली और रोजमर्रा के समान के साथ दुकान लगाये बैठे हैं। स्थानीय पुरुष जब भी घर से निकलते हैं तो कन्धे पर लगभग एक फुट लम्बा चाकू लटकाते हैं, जिसका फल बेंत के बने एक खोलीनुमां म्यान में होता है, वहीं महिलायें चमकदार लुंगी में लकदक करती फिरती हैं। सभी हिंदी भाषा अच्छी तरह बोल और समझ सकते हैं, गाड़ियों में हिन्दी के गाने बजते हैं। दो स्थानीय और एक हिंदी भाषी हों तो बातचीत हिंदी भाषा में होगी न कि बंगालियों की तरह; कि दोनों बंगाली अपनी भाषा में बात करने लगें और उनका तीसरा मित्र केवल उनका मुंह देखता रहे।

जारी….

(सुरेंद्र विश्वकर्मा का संस्मरण)

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