बकौल दुष्यंत कुमार आज के हालात कुछ इस तरह ही बनते जा रहे हैं। चारों ओर जिस तरह का माहौल है उसमें ज़िन्दगी को जीना बेहद कठिन है। पिछले बारह साल से ख़ामोश अवाम अब मुखर होकर सामने आ रही है। कहा जाता है कि पानी सर से गुजरने लगे तब हाथ पैर चलाने और ज़बाँ खोलने की ज़रुरत पड़ती ही है।
सैंकड़ों सवाल इस वक्त मुंह बाए खड़े हैं जिसमें नंबर वन पर है झूठ का परचम फहराना। हाल ही में हमारे मुखिया जी ने बताया कि ईरान इज़राइल युद्ध के बीच भारत की जीडीपी 7.8% पहुंची है, यह देश की खुशहाली का प्रतीक है जबकि अर्थशास्त्री बता रहे जो जीडीपी माननीय बता रहे हैं वह सरासर झूठ है। वर्तमान जीडीपी 2.6% है।
देश खुशहाल हैं इसे जानने के लिए यदि देशभर में चल रहे आंदोलनों को देखा जाए उनके आंदोलनों की मांग को देखा जाए तो जो तस्वीर सामने आती है वह इस बात को पुष्ट करती है कि हर तरफ बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने कमर तोड़ रखी है।न्याय व्यवस्था प्रशासनिक संस्थाएं सब में लुटेरे बैठे हैं।
बच्चे बहुत मेहनत करके और उनके मां-बाप कोचिंग पर लाखों रुपए इस उम्मीद में खर्च करते हैं कि कल सुनहरा होगा किन्तु जब इनके साथ पेपर लीक कांड होता है तो कई निराश बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था का निजीकरण होने से वह बहुत मंहगी है। जो साधारण आदमी के बस की नहीं रही। ऐसा ही स्वास्थ्य, परिवहन और अन्य क्षेत्रों में भी हुआ है। जिससे सुरक्षित रोज़गार की उम्मीद भी जाती रही। दो उद्योगपतियों अंबानी और अडानी को देश के महत्वपूर्ण कार्य क्षेत्र सौंपकर इसे और जटिल बना दिया गया है।
कहने का आशय यह है कि वर्तमान सरकार ने आम लोगों का ऐसा कचूमर निकाला है कि वे जर्जर हो चुके हैं। तिस पर नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों पर ईडी, सीबीआई की तलवार से दहशत का वातावरण बना हुआ है। जिससे लोग विरोध की हिम्मत जुटाना भूल गए थे।
यूं तो, इस बीच प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी ने इस दमन चक्र के विरुद्ध सदन में हमेशा देश के लोगों की पीड़ा को सामने लाने का प्रयास किया किंतु सदन में उनकी आवाज़ को अनसुना किया गया। बिकाऊ मीडिया ने भी उनकी बात को तवज्जो नहीं दी। उन्हें सड़क पर आना पड़ा।
लेकिन जब शोषण अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा तो कुछ पढ़ें लिखे युवाओं ने अभिजीत दिपके ने, जेन जेड को आवाज़ दी। मामला पेपर लीक का था लेकिन उसमें छुपा था सरकार के कारनामों का पिटारा। लाखों की भीड़ ने जंतर मंतर को भर दिया और सरकार को हिला दिया। दिल्ली पुलिस ने युवाओं के साथ बर्बरता की लेकिन अंतत: शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। गृहमंत्री भी वेटिंग लिस्ट में थे।
हालांकि काक्रोच पार्टी ने युवाओं ने अपना आंदोलन शिक्षा के सुधार तक सीमित कर लिया है किन्तु उनके इस आंदोलन ने देश भर के गूंगे लोंगों को आवाज़ दी है। वे निडरतापूर्वक अपनी लड़ाई लड़ने तैयार हुए हैं और बराबर सिलसिला चल रहा है।इतना ही नहीं जेन अल्फा ने भी गांव गांव में स्कूल की दुर्दशा पर आंदोलन तेज कर दिए हैं। बिहार का छह वर्षीय बालक आदित्य कुमार और आईसा नेत्री नेहा बोरा ने तो इस समय आम लोगों के अधिकारों की लड़ाई को जो गति दी है वह तारीफ़ के काबिल है। नेहा को युवतियों और महिलाओं ने अपना आदर्श बना कई आंदोलन शुरू भी किए हैं।
हाल ही सागर जिले में हुए शराब कांड से जिसमें जहरीली शराब पीने से 30 से अधिक लोग मरे और सौ से अधिक अस्पताल में हैं, को लेकर महिलाओं ने शराब दूकानों में घुसकर शराब को निकालकर आग के हवाले किया तथा प्रशासन और ठेकेदारों के बीच मेल-मिलाप को इस कांड के लिए दोषी ठहराया। जिसे लोग बराबर जानते थे लेकिन विरोध की क्षमता नहीं जुटा पा रहे थे। पीड़ित परिवारों को मुआवजा की मांग उनकी जारी है।
इसी तरह दिल्ली में एक छात्रावास के गिर जाने से हुई छात्रों की मौतों से आक्रोशित युवक कांग्रेस और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने जमकर जो विरोध चालू किया है उसमें युवतियों का जोश को देखते ही बनता है। ऐसे कई हादसे हुए हैं पर यह प्रदर्शन अद्वितीय है।
इसी तरह अब तक मुसलमान वर्तमान सरकार के अत्याचार से पिछले बारह वर्षों से पीड़ित थे। चुप रहे ।कई मस्जिदें शहीद हो गईं। देशद्रोह, लव-जिहाद, गौवंश की हत्या अतिक्रमण और सड़क पर नमाज़ के मामले में लोगों को जेल में डाला गया। वे भी अब सहारनपुर मस्जिद को अचानक रात में तोड़ दिए जाने से आक्रोशित हुए हैं।
ये अच्छे संकेत हैं। न्याय की लड़ाई लड़नी ही होगी। दुष्यंत जी के ही इन शब्दों के साथ ‘हो गई है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए/इस हिमालय से, कोई गंगा निकलनी चाहिए। जी हां वह निकल चुकी है। सरकार और अत्याचारियों में हाहाकार है।
(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट, टिप्पणीकार हैं।)