भीड़ द्वारा हत्याएं : मोहसिन शेख को किसी ने नहीं मारा – 1

हिंदुत्व वर्चस्ववाद के तहत मॉब लिंचिंग के एक दशक का दस्तावेज़ीकरण करती किताब जो घटनाओं को एक परिप्रेक्ष्य में भी रखती है

तब:
फ्लोरिडा में अश्वेत व्यक्ति को ज़िंदा जलाया गया; दूसरे अश्वेत व्यक्ति को फिर फाँसी पर लटकाया गया
न्यूमैन,
जॉर्जिया, 23 अप्रैल—सैम होल्ट को आज दोपहर न्यूनेन, जॉर्जिया के पास 2000 लोगों की मौजूदगी में खंभे से बाँधकर जला दिया गया। उस अश्वेत व्यक्ति को पहले यातनाएँ दी गईं, फिर उस पर तेल डालकर जला दिया गया। जॉर्जिया के एक पूर्व गवर्नर ने अपने नगरवासियों से व्यक्तिगत अपील की कि वे कानून को अपना काम करने दें, लेकिन इसका ज़रा भी असर नहीं हुआ….
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स्प्रिंगफ़ील्ड (मैसाचुसेट्स) वीकली रिपब्लिकन, 28 अप्रैल, 1899

अब:
24 सितंबर की सुबह, 40 वर्षीय सैकुन ख़ान – जो राजस्थान के अलवर ज़िले के बरावास गाँव के निवासी थे, अपनी मोटरसाइकिल के लिए नया टायर खरीदने बाज़ार गए वे कभी वापस नहीं लौटे…वे मर चुके थे, उनका सिर बड़ौदा मेव पुलिस थाने के ठीक बाहर एक पत्थर से कुचल दिया गया था …
“ ..हमें
संदेह है कि उनकी हत्या इसलिए की गई क्योंकि उनकी वेशभूषा से स्पष्ट था कि वे मुसलमान थे। पुलिस थाने के बाहर उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई और फिर भी एक भी पुलिसकर्मी उन्हें बचाने नहीं आया,” सैकुन के छोटे भाई इरशाद ख़ान कहते हैं, उनकी आवाज़ भर्रा जाती है।
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राजस्थान के पुलिस थाने के बाहर मुस्लिम व्यक्ति की हत्या, पत्थर से सिर कुचला गया, वायर, 26 सितंबर,2026

भीड़ द्वारा हत्याओं का एक दशक

“भीड़ द्वारा हत्या” का अर्थ है हिंसा का कोई भी कृत्य या कृत्यों की शृंखला, अथवा हिंसा के किसी कृत्य में सहायता करना, उकसाना या उसका प्रयास करना, चाहे वह स्वतःस्फूर्त हो या सुनियोजित, जब किसी भीड़ द्वारा धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, खान-पान की प्रथा, यौन अभिविन्यास, राजनीतिक संबद्धता, जातीयता या किसी अन्य आधार पर ऐसा किया जाए। (पृ.14)

भीड़ द्वारा हत्या – यह शब्द संयुक्त राज्य अमेरिका के इतिहास के एक अंधकारमय दौर की तस्वीरें मन में उभारता है।

अब यह इतिहास का हिस्सा है कि 1877 और 1950 के बीच, श्वेत वर्चस्ववादी गिरोहों ने 4,000 अफ्रीकी अमेरिकियों की हत्या कर दी, जबकि सरकार और पुलिस ने दूसरी ओर देखना जारी रखा।  

किसी को भी यह पूर्वाभास नहीं था कि संयुक्त राज्य अमेरिका, जो स्वयं को ‘सबसे मज़बूत’ लोकतंत्र के रूप में अपने आप को प्रस्तुत करता है, द्वारा भीड़ के हाथों हत्या की अपनी बर्बर प्रथा को अंततः छोड़ दिए जाने के लगभग आठ दशक बाद, ‘सबसे बड़े’ लोकतंत्र – भारत – में इस खूनी प्रथा की फिर से वापसी होगी।
इस प्रकार की खुद इंसाफ का दावा करनेवाली हिंसा के पीड़ितों के बारे में कोई आधिकारिक आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

सरकार ने आज तक ऐसे किसी भी रेकॉर्ड को तैयार करने से इनकार किया है, न ही ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के तहत फैसलों में तेज़ी लाने के लिए कुछ विशेष अदालतों के अंतर्गत अलग कानून बनाने का विचार उसके विचार-विमर्श में सामने आया है। कथित तौर पर इसका आधार यह भ्रामक दलील है कि हिंसा के एक रूप के तौर पर भीड़ द्वारा हत्या को भारतीय दंड संहिता में शामिल नहीं किया गया है और यह सब उन स्पष्ट आँकड़ों के बावजूद है जो दिखाते हैं कि धार्मिक अल्पसंख्यकों, समाज के सामाजिक रूप से हाशिए पर पड़े वर्गों और महिलाओं को लक्षित कर  की गयी घृणा-हत्याओं में 21वीं सदी के दूसरे दशक में अचानक उछाल आया है, जिसका संबंध भारत की राजनीति और समाज में बहुसंख्यकवादी ताकतों के उदय से है।

हत्याओं की इस लहर में भीड़ द्वारा हत्या के शुरुआती मामलों में से एक मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के एक पखवाड़े से भी कम समय बाद सामने आया। मोहसिन मोहम्मद शेख (उम्र 28 वर्ष) सूचना प्रौद्योगिकी प्रबंधक के रूप में काम करते थे। 4 जून, 2014 को वे अपने दोस्त के साथ घर लौट रहे थे, तभी धनंजय देसाई के नेतृत्व वाली हिंदू राष्ट्र सेना से जुड़े एक गिरोह ने उनका रास्ता रोक लिया और हॉकी स्टिक से उन्हें पीटना शुरू कर दिया। घटनास्थल पर ही उनकी हत्या कर दी गई। मोदी के नेतृत्व वाले भारत में यह सांप्रदायिक निशाने पर की गई पहली हत्या थी। बाद में पता चला कि पीड़ित ने टोपी पहन रखी थी, जिससे उनका धर्म स्पष्ट हो गया और वे इन कट्टरपंथियों के लिए आसान निशाना बन गए।

प्रस्तुत रिपोर्ट : एक जरूरी संसाधन

डॉ. ज़फ़रुल-इस्लाम ख़ान द्वारा एम. ज़ेयाउल हक़, शाहीन नज़र और शोधकर्ताओं की एक टीम के सहयोग से संकलित और संपादित मॉब लिंचिंग इन इंडिया (भारत में भीड़ द्वारा हत्या – एक अभिलेख 2014-2024)  एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ी कृति और विश्लेषण है। इस टीम में तल्हा चौधरी, सलमान नक़वी, ग़ुफ़रान ज़ैदी, ज़िल्लुर रहमान हैदर और नदीम अहमद शामिल थे।

यह “21वीं सदी में भारत के बड़े हिस्सों में फैले आतंकवाद के एक विशिष्ट रूप पर प्रकाश डालती है, अर्थात भीड़ की हिंसा, या हत्या, या ‘भीड़ द्वारा हत्या’, जैसा कि इसे भारत में कहा जाता है’ (पृ/.7) यह मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के पहले दो कार्यकालों – मई 2014 से मई 2024 तक – को समेटती है।

डॉ. ज़फ़रुल-इस्लाम ख़ान और उनके सहयोगी इस लगभग 750 पृष्ठों के विशाल ग्रंथ को प्रकाशित करने के लिए विशेष प्रशंसा के पात्र हैं। इसमें 630 पृष्ठों में फैले 1748 मामलों का विवरण है और इसके अतिरिक्त 100 से अधिक पृष्ठों में ‘भीड़ द्वारा हत्या: भारत में सामान्य स्थिति’, ‘भारतीय नागरिक समाज, भीड़ द्वारा हत्या पर राज्यों और केंद्र के कानून’, ‘सिफ़ारिशें’ शीर्षक वाले विभिन्न अध्याय शामिल हैं। इनसे पहले एक परिचय दिया गया है, जिसमें भीड़ द्वारा हत्या की परिभाषा पर प्रकाश डाला गया है, भारत में भीड़ की हिंसा के प्रमुख कारणों का विश्लेषण किया गया है और बताया गया है कि ऐसी हत्याओं के अपराधियों का महिमामंडन कैसे किया जाता है या ऐसे अधिकांश मामलों में पुलिस की भूमिका प्रेरणादायक क्यों नहीं पाई जाती।

यह इस भयावह परिदृश्य का विश्लेषण करती है कि कैसे “एनडीए के सत्ता में आने के बाद से भीड़ द्वारा हत्या की गाथा हमारे जीवन का स्थायी हिस्सा बन गई है और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद इसमें कोई कमी नहीं आई है तथा ऐसा कोई संकेत नहीं है कि केंद्र सरकार कोई कठोर कानून बनाएगी” और कैसे दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी ताकतों से जुड़े गुंडे यह जानते हुए भी ऐसा करते हैं कि कोई कानून उन्हें पकड़ नहीं पाएगा।

यह इस बात का भी विस्तार से वर्णन करती है कि हिंसा की यह नई लहर गोमांस या गायों की हत्या को लेकर हिंसा से शुरू हुई, लेकिन अब बच्चों के अपहरण, चोरी या पार्किंग की जगह को लेकर मामूली विवादों की अफ़वाहों तक फैल गई है, यह ‘छोटे से बड़े कारणों तक अधिक हिंसक व्यवहार को बढ़ावा दे रही है।’ सामूहिक या सामुदायिक हिंसा के विद्यार्थियों के लिए यह एक बात भी बिल्कुल स्पष्ट करती है कि भीड़ द्वारा हत्या भले ही अब नया सामान्य बन गई हो, लेकिन हमारे देश के लिए नई नहीं है। हमने इसे 1984 के सिख-विरोधी दंगों और 2002 के गुजरात दंगों – जैसे अनगिनत दंगों में देखा है।

शायद यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि इडा बी. वेल्स बार्नेट, जिन्होंने 1890 के दशक में लेखों, पुस्तिकाओं और पुस्तकों में अफ्रीकी अमेरिकियों की भीड़ द्वारा हत्याओं का दस्तावेज़ीकरण किया था, ने ‘भीड़ द्वारा हत्याओं को व्यक्तियों पर हमलों के साथ-साथ अमेरिका में अफ्रीकी अमेरिकियों की “सामूहिक पहचान”, मानवता और आर्थिक सुरक्षा पर हमलों के रूप में भी पहचाना था’ (पृ. 9) या यह कि भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याएँ सभी अफ्रीकी अमेरिकियों में भय पैदा करने का काम करती हैं, ताकि उन्हें अधीनता स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जा सके और अश्वेतों की स्वतंत्रता की सीमाओं पर ज़ोर दिया जा सके। नई भारत में भीड़ द्वारा हत्या का उद्देश्य भी यही कहा जा सकता है।

पहले संकेत: साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपियों को कैसे बरी कर दिया गया

भारत में – मोदी के सत्ता में आने के बाद – भीड़ द्वारा हत्या का पहला मामला, मोहसिन शेख की हत्या, जिस तरह सामने आया, वह इस दक्षिण एशियाई क्षेत्र के सभी चिंतित नागरिकों के लिए आने वाले समय का संकेत था। शुरुआत से ही मानवाधिकार रक्षकों ने आरोप लगाया कि ‘मामले की जाँच कर रहे पुलिस अधिकारी इसे दबाने की कोशिश कर रहे थे’ ( पृ. 101)

– जनवरी 2017 – बॉम्बे उच्च न्यायालय की न्यायाधीश मृदुला भाटकर ने तीन आरोपियों को ज़मानत देते हुए कहा कि वे “उकसाए गए” थे क्योंकि पीड़ित दूसरे धर्म से संबंधित था

– 9 फरवरी 2018 – सर्वोच्च न्यायालय ने ज़मानत रद्द की और रेखांकित किया कि अदालतें “किसी समुदाय के पक्ष या विपक्ष में पूर्वाग्रह से रंगी हुई” टिप्पणियाँ नहीं कर सकतीं

– 29 मार्च, 2018 – न्यायाधीश भाटकर ने फिर ज़मानत दी , कहा कि उनका कृत्य पूर्वनियोजित नहीं था।

– 27 जनवरी 2023 – पुणे ज़िला अदालत ने इस आधार पर सभी आरोपियों को ज़मानत दे दी कि कोई भी प्रत्यक्षदर्शी कथित हत्यारों की निर्णायक रूप से पहचान नहीं कर सका। भीड़ के गुस्से का शिकार बने प्रमुख गवाहों में से एक अपने बयान से मुकर गया। ( पृ. 101)

दोषमुक्ति के ये फैसले ऐसे सभी मामलों में गवाहों की सुरक्षा की व्यवस्था को मज़बूत करने की आवश्यकता को और पुख़्ता करते हैं। 

(ज़फ़रुल-इस्लाम ख़ान की किताब ‘मॉब लिंचिंग इन इंडिया : ए रिकॉर्ड 2014-2024 की पुस्तक समीक्षा का पहला भाग)

(सुभाष गाताड़े लेखक, वामपंथी कार्यकर्ता हैं और न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव से जुड़े हुए हैं।)

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