सुभाष गाताडे

चरित्र निर्माण की सदी! आरएसएस कैसे धीरे-धीरे अपने ही इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश कर रहा है-1

एक बिल्ली आँखें बंद करके दूध पीती है और सोचती है कि दुनिया उसे देख नहीं रही… Read More

‘सत्य को बयां करने के रास्ते की मुश्किलों के बारे में’ क्या लेखक सचेत और सक्रिय हैं?

(जनवादी लेखक संघ, दिल्ली के 10 वें राज्य सम्मेलन (4 अप्रैल 2026)  में प्रस्तुत वक्तव्य का संशोधित… Read More

आर एस एस – काया और माया” की समीक्षा : हिन्दुत्व वर्चस्ववाद अतीत का गंधाता कुआं 

धर्मान्ध लोग – जो हंसना भूल गए हैं, रोना भूल गए हैं, और करूणा भूल गए हैं… Read More

संस्कृति की खाल ओढ़ कर आती सांप्रदायिकता कभी ‘इस खेमे से’, तो कभी ‘उस खेमे से’ !

हम को मालूम है जन्नत की हकीक़त लेकिन दिल के खुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा… Read More

‘वोटबंदी’ अर्थात लोकतंत्र कुछ लोगों के लिए! क्या जनता को मताधिकार से वंचित करने का एक नया माॅडल बिहार में गढ़ा जा रहा है?

स्वाधीन भारत, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार [Universal Adult Franchise] के रास्ते पर चलेगा। बीसवीं सदी की पांचवीं दहाई… Read More