भारतीय सरकार ने आँकड़ों के अभाव, कानूनों को लटकाए रखने और बीएनएस के एक कमजोर प्रावधान के जरिए भीड़ द्वारा हत्या के मामलों को कम करके आँका है, जिससे अधिक सख्त ‘भीड़-हत्या विरोधी’ और ‘घृणा-अपराध कानूनों’ की आवश्यकता का मामला बनता है
‘वह इंसानों की भीड़ थी साहिब
इसलिए गोपाल, कपिल और गुंजा बच गए
हमने जानवरों की भीड़ में
अखलाक, पहलू, तबरेज़ को मरते देखा है’
– शिल्पा राजपूत भारती@ shilpa_bhartiy
क्या हम लिंचिस्तान की ओर बढ़ रहे हैं?
‘मॉब लिंचिंग इन इंडिया : ए रिकॉर्ड 2014- 2024’ (भारत में भीड़ द्वारा हत्या: एक अभिलेख – 2014-24) के अंतिम अध्याय – ‘भीड़ द्वारा हत्या पर भारतीय नागरिक समाज, राज्य और केंद्रीय कानून’ का केंद्रबिंदु ‘ मई 2014 के चुनावों के बाद जिनके परिणामस्वरूप पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ भाजपा सत्ता में आई’ और हिंदुत्व की वर्चस्ववादी ताकतों को ‘अपने दीर्घकालिक एजेंडे को लागू करने’ का बढ़ता हुआ साहस मिला’ और ‘किस तरह उसके बाद भीड़ द्वारा हत्या के मामलों में तेज़ और निरंतर वृद्धि है,’ उस पर है (पृ. 75)
यह दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि आरएसएस के दूसरे सुप्रीमो गोलवलकर ने 60 के दशक में ही इस एजेंडे की रूपरेखा स्पष्ट रूप से दे दी थी, जब आरएसएस भारतीय जनता का ध्यान हिंदू राष्ट्र के अपने दृष्टिकोण की ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था। यह वह दौर था जब वह अपने उस अतीत से पूरी तरह अलग होने की कोशिश कर रहा था, जिसमें उसने उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष में भाग नहीं लिया था या उसका विरोध किया था और हिंदुत्व के विचारों से प्रभावित लोगों ने महात्मा गांधी की हत्या की थी, जैसा कि भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था। गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ (विचार सुमन) में कुख्यात रूप से ‘आंतरिक दुश्मनों की ’ की बात की थी और मुसलमानों, ईसाइयों तथा कम्युनिस्टों को निशाना बनाया था।
इस बकवास से साफ़ था कि इस एजेंडे का एक मुख्य उद्देश्य ‘मुसलमानों का मनोबल तोड़ना’ और उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में हिंदू श्रेष्ठता स्वीकार करने तथा दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह रहने के लिए मजबूर करना था। सड़कों, पार्कों आदि में पाए जाने वाले असहाय मुसलमानों पर भीड़ द्वारा हत्या करना उन्हें हीन दर्जा स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के प्रमुख तरीकों में से एक था। जैसा कि पहले बताया गया है, केंद्र और राज्य सरकारों, न्यायपालिका, मीडिया तथा नागरिक समाज ने बड़े पैमाने पर इस खतरे की अनदेखी की, जबकि इसके लिए यह निराधार दावे करने में भी कोई हिचक नहीं थी कि मुसलमान गोमांस खाते हैं या ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने में विफल रहते हैं।
न तो सरकार और न ही न्यायपालिका ने इस ख़तरे को रोकने के लिए – चाहे कानून-व्यवस्था तंत्र को स्पष्ट आदेश जारी करना हो या नए कानून बनाना – तत्काल कदम उठाना महत्वपूर्ण समझा । यह बात और भी परेशान करने वाली थी कि सत्तारूढ़ व्यवस्था ने ‘ऐसा कोई डेटाबेस नहीं रखा जिससे इस घटना का विश्लेषण करने, इसका अध्ययन करने और इसकी गंभीरता को समझने में मदद मिलती’ ..‘भीड़ द्वारा हत्या और हिंसक घृणा-अपराधों को छिपाने के लिए’ (पृ. 76) ऐसा करने में उसकी घोर विफलता ने उसकी संवैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लंघन किया और इसे आसानी से इन लक्षित हमलों में उसकी मिलीभगत के रूप में देखा जा सकता है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, जिसका गठन न्याय सुनिश्चित करने और न्याय के साथ हुए अन्याय को दर्ज करने के लिए भी किया गया था, कोई बेहतर साबित नहीं हुआ। उसने अपनी वार्षिक रिपोर्टों से भीड़ द्वारा हत्या, खाप पंचायतों द्वारा आदेशित हत्याओं और धार्मिक कारणों से की गई हत्याओं के उपशीर्षक हटा दिए। भारतीय सरकार को कथित तौर पर इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि वह इंटरनेशनल कान्वेनेंट ऑन सिविल एंड पोलिटिकल राइट्स के अनुच्छेद 27 के तहत पीड़ितों की रक्षा करने के अपने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों का पालन करने में विफल रही है, जिस पर उसने हस्ताक्षर किए हैं।’ (पृ. 76)
सरकार की विफलता स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी, लेकिन सुधारात्मक कदम उठाने के बजाय उसने भीड़ द्वारा हत्या के खिलाफ कानून बनाने की नागरिक समाज की पहलों, निजी सदस्यों के विधेयकों और राज्य सरकारों की पहलों को भी ‘रोक दिया’, यह तर्क देते हुए कि ‘भारतीय दंड संहिता में लिंचिंग का उल्लेख नहीं है। दूसरे, चूँकि कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है, इसलिए कोई केंद्रीय कानून नहीं बनाया जा सकता’। यह भीड़ द्वारा हत्या से निपटने के लिए एक विशिष्ट कानून बनाने से बचने का तरीका था, क्योंकि ये आपराधिक हमले और लक्षित हत्याएँ केंद्र के साथ-साथ विभिन्न राज्यों में भगवा ब्रिगेड के करीबी लोगों द्वारा की जा रही थीं।
जहाँ तक सर्वोच्च न्यायालयों का सवाल है, सर्वोच्च न्यायालय को भीड़ द्वारा हत्या की निंदा करने में चार साल से अधिक का समय लगा, जब उसने इसे “भीड़तंत्र का भयावह कृत्य” (17 जुलाई 2018) करार दिया और इस खतरे पर नियंत्रण पाने के लिए निवारक, उपचारात्मक और दंडात्मक उपायों के निर्देश भी जारी किए। यह अलग बात है कि केंद्र सरकार ने भीड़तंत्र के इन कृत्यों पर लगाम लगाने के लिए कोई महत्वपूर्ण कदम उठाने की कोशिश नहीं की और इस मुद्दे पर टालमटोल करती रही। सरकार पर दबाव डालने और कानूनी रिक्तता को भरने के लिए नागरिक समाज ने भीड़ द्वारा हत्या के खतरे से निपटने के लिए एक मसौदा कानून सामने रखा (पृ. 79)
यह भी उल्लेखनीय था कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों ने कुछ राज्यों को भीड़ द्वारा हत्या विरोधी कानून बनाने के लिए प्रेरित किया, लेकिन ये कभी प्रभावी कानून नहीं बन सके, क्योंकि राज्यपालों – जो सभी केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए गए थे – ने किसी न किसी बहाने से उन पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। (पृ. 80)
अंततः, केंद्र सरकार ने एक नया आपराधिक कानून – भारतीय न्याय संहिता – बनाया, जिसे दिसंबर 2023 में संसद ने पारित किया और जो 2024 के मध्य में लागू हुआ तथा 1860 की भारतीय दंड संहिता का स्थान लिया। बीएनएस में भीड़ द्वारा हत्या को शामिल तो किया गया, लेकिन उसका नाम नहीं लिया गया। इसे पिछली भाजपा सरकार के इस दावे के बावजूद पारित किया गया कि ‘कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है’।
केंद्र में सत्ता में आने (2014) के बाद से उभरे भीड़ द्वारा हत्या के खतरे के प्रति सत्तारूढ़ व्यवस्था का उदासीन रवैया स्पष्ट था, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के दबाव के बाद भी उसे कानून बनाने में पाँच साल लग गए।
बीएनएस की वे धाराएँ, जो भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए जाने से संबंधित हैं, उनमें बहुत कुछ ऐसा था जिसे बेहतर बनाया जा सकता था।
पहली बात, ऐसा लगता है कि यह इस खतरे को कम करके आँकती है, क्योंकि इसमें ‘यह प्रावधान किया गया है कि यह धारा तब लागू होगी जब ऐसा अपराध कम से कम पाँच व्यक्तियों द्वारा किया जाए’ (पृ. 81) – इससे अकेले व्यक्ति द्वारा किए गए घृणा अपराध बाहर हो जाते हैं। राजस्थान में शंभू रैगर द्वारा मोहम्मद अफराजुल की क्रूर हत्या ऐसे ही वीभत्स अपराध का स्पष्ट उदाहरण थी।
शायद कानून बनाने वालों ने सुविधाजनक ढंग से इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि ‘इन अपराधों को विशिष्ट बनाने वाली मूल बात हमलावरों की संख्या नहीं, बल्कि अपराधों के पीछे की घृणा से प्रेरित मंशा है’
दूसरी बात, इसमें जुर्माने की राशि और पीड़ित या उसके वंशजों को दिए जाने वाले मुआवजे के बारे में भी कुछ नहीं कहा गया है।
यह रिपोर्ट आगे नागरिक समाज, राज्यों और बीएनएस द्वारा तैयार किए गए मसौदा कानूनों की तुलना करती है और अंत में पीड़ितों तथा उनके परिजनों, राज्य प्रशासन, नागरिक समाज, भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए सिफारिशें प्रस्तुत करती है।
यह पीड़ितों और उनके परिजनों से अपराध की जानकारी पुलिस, मीडिया और नागरिक समाज के समूहों तक पहुँचाने तथा पुलिस, अपराधियों आदि द्वारा मामला वापस लेने के लिए डाले जाने वाले सभी दबावों और प्रलोभनों का सामना करने को कहती है, क्योंकि ऐसा न करने से अपराधियों को अपने अपराध जारी रखने का प्रोत्साहन मिलेगा।
राज्य प्रशासन से यह अपील करती है कि वह लिंचिंग के अपराधियों और इसके लिए उकसाने वालों की त्वरित जाँच और अभियोजन सुनिश्चित करे तथा घृणास्पद भाषणों और घृणा अपराधों की जाँच करे। भारत सरकार के लिए इसकी सिफारिश है कि लिंचिंग के खिलाफ अधिक कठोर कानून बनाया जाए, क्योंकि मौजूदा बीएनएस इस खतरे से निपटने के लिए बहुत कमजोर है और लिंचिंग, भीड़ की हिंसा तथा घृणा अपराधों में आरोपित व्यक्तियों के लिए जमानत मिलना भी अत्यंत कठिन बनाया जाए।
यह सरकार से घृणा अपराधों के खिलाफ एक सख्त कानून बनाने को भी कहती है, जिसमें सोशल मीडिया के माध्यम से घृणा और इस्लामोफोबिया का प्रचार करना भी शामिल हो, जो अधिकांश मामलों में लिंचिंग और भीड़ की हिंसा का कारण बनता है।
जहाँ तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सवाल है, यह मानवाधिकार संगठनों से भारत में घृणा अपराधों पर सतर्कता से नजर रखने, घृणा अपराधों के अपराधियों और उन्हें उकसाने वालों की जाँच और अभियोजन के लिए भारत को प्रोत्साहित करने तथा संबंधित अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का पालन करने के लिए भारत को प्रेरित करने को कहती है।
जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, लिंचिंग की इस परिघटना पर इन प्रारंभिक अध्यायों के बाद, जिसमें पिछले एक दशक से भी अधिक समय में तेजी से वृद्धि देखी गई है, 750 पृष्ठों की इस विशाल रिपोर्ट में 630 पृष्ठों में फैले 1748 मामलों का विवरण शामिल है।
पुस्तक का परिशिष्ट ‘दादरी (अखलाक) गोमांस की अफवाह पर लिंचिंग संबंधी तथ्य-जाँच रिपोर्ट’ को शामिल करता है और लिंचिंग पर कुछ समाचार पत्रों के संपादकीयों के अंश भी प्रस्तुत करता है।
संगठित मनोरोगी
बीबीसी के पत्रकार फर्गल केन सीज़न ऑफ ब्लड: ए रवांडन जर्नी में ये पंक्तियाँ लिखी हैं:
कुछ लोग वास्तव में मनोरोगी व्यक्तियों जैसे दिखाई देते थे। बाकी अधिकांश लोग फटेहाल और निरक्षर किसान थे, जिन्हें तुत्सियों के प्रति घृणा से आसानी से भड़काया जा सकता था। शायद जिन लोगों से मैं मिला, उनमें सबसे भयावह शिक्षित राजनीतिक अभिजात वर्ग के लोग थे, ऐसे पुरुष और महिलाएँ जो आकर्षक व्यक्तित्व और परिष्कृत व्यवहार के धनी थे, धाराप्रवाह फ्रेंच बोलते थे और युद्ध तथा लोकतंत्र की प्रकृति पर लंबी दार्शनिक बहसों में शामिल हो सकते थे। लेकिन उनमें और सैनिकों तथा किसानों में एक बात समान थी: वे अपने ही देशवासियों के खून में डूबे हुए थे।‘
यह पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रवांडा में सुनियोजित और योजनाबद्ध हत्याओं के परिणामस्वरूप 1994 में 8 लाख तुत्सियों की मौत हुई। यह 20वीं सदी के अंतिम दशक की सबसे काली घटनाओं में से एक थी।
रवांडा से भारत तक इसकी गूँज बहुत तेज है।
भारत में हिंसा जीवन का एक तथ्य है। निश्चित रूप से इस हिंसा के लिए हिंसा करने वालों, सड़कों पर मौजूद कट्टरपंथियों और उन गहरी सामाजिक जड़ों, दोनों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए जो इस हिंसा को जन्म देती हैं।
2014-2024 के दशक के दौरान भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए जाने की घटनाओं का दस्तावेजीकरण करने वाली यह विशाल रिपोर्ट हमारे समाज के सामाजिक और धार्मिक रूप से हाशिए पर पड़े वर्गों तथा महिलाओं के खिलाफ इस हिंसा का प्रमाण है। प्रस्तुत आँकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि घृणा के इस माहौल में कोई भी सुरक्षित नहीं है, यदि राजनीति के नाम पर हमारे आसपास जो कुछ हो रहा है, उसमें आमूलचूल बदलाव नहीं आता। प्रस्तुत मामले के अध्ययनों में गैर-मुसलमानों, दलितों, हिंदुओं, ईसाइयों आदि की भी बड़ी संख्या शामिल है और यह हम सभी के लिए खतरे की घंटी बननी चाहिए।
देश के विभिन्न हिस्सों के विद्वान और चिंतित नागरिकों को इन निष्कर्षों का व्यापक प्रचार-प्रसार करने का प्रयास करना चाहिए; शायद मुख्य टिप्पणियों और निष्कर्षों का सारांश तैयार करने के प्रयास किए जा सकते हैं।
यह वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है कि इस रिपोर्ट को व्यापक रूप से पढ़ा और चर्चा की जाए, दक्षिण एशिया के इस हिस्से के उन विचारशील लोगों के बीच जो अब भी आशा के उस गणराज्य को फिर से जीवंत करने की आकांक्षा रखते हैं, जिसमें हमने 75 वर्ष से भी अधिक पहले प्रवेश किया था, और उसे घृणा के गणराज्य में बदलने नहीं देना चाहते, जिसकी कल्पना वर्चस्ववादी ताकतों ने हमारे लिए की है।
(ज़फ़रुल-इस्लाम ख़ान की किताब ‘मॉब लिंचिंग इन इंडिया : ए रिकॉर्ड 2014-2024 की पुस्तक समीक्षा का तीसरा और अंतिम भाग)
(सुभाष गाताडे लेखक और वामपंथी कार्यकर्ता हैं और न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव से जुड़े हैं।)