सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना करना कोई अपराध नहीं है: कर्नाटक हाई कोर्ट 

असहमति जताने के अधिकार के दायरे को स्पष्ट करते हुए, कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में 13 लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है। इन लोगों पर आरोप था कि उन्होंने एक सार्वजनिक दीवार पर ऐसे नारे लिखे थे, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले की आलोचना की गई थी।

जस्टिस एचपी संदेश की एकल पीठ ने कहा कि किसी फैसले से असंतोष जताना, देशद्रोह या समाज में अशांति फैलाने के बराबर नहीं है। कोर्ट ने कहा, “…ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाई गई है, और इसमें केवल न्याय न मिलने की बात कही गई है तथा न्याय की मांग की गई है। ऐसी स्थिति में, यह आईपीसी की धारा 153ए और 295ए के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा।

अदालत आरोपी की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 2019 में मंगलौर दक्षिण पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर और उसके बाद की कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी। यह एफआईआर भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए (दुश्मनी को बढ़ावा देना), 295ए (धार्मिक भावनाओं को आहत करने के जानबूझकर किए गए कृत्य) और 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत दर्ज की गई थी, साथ ही इसमें ‘कर्नाटक ओपन प्लेस डिसफिगरमेंट एक्ट, 1951’ की धारा 3 भी शामिल थी।

यह एफआईआर मंगलौर दक्षिण पुलिस स्टेशन के एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर दर्ज कराई गई थी। इंस्पेक्टर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद, सड़क किनारे दीवारों पर कुछ नारे लिखे हुए पाए गए, जिन्हें कथित तौर पर आरोपी ने लिखा था।

इन नारों में कहा गया था कि यह फैसला डिनायल ऑफ़ जस्टिस है, और साथ ही इसमें ‘न्याय के लिए आवाज़’ उठाने की बात कही गई थी। पुलिस के मुताबिक, ये नारे ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ से जुड़े थे। इसके आधार पर, यह आरोप लगाते हुए कि इस कृत्य का उद्देश्य देश में अशांति फैलाना था, पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील इस्माइल मुनीब मुस्बा ने दलील दी कि मामले या शिकायत के पंजीकरण से ही ऐसा कोई अपराध नहीं बनता, जिसके लिए उक्त धाराओं को लागू किया जा सके।

संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि किसी फैसले से असहमति जताना न तो देशद्रोह है और न ही समाज में धार्मिक भावनाओं को आहत करने जैसा कृत्य है।

‘जावेद अहमद हजम’ मामले का संदर्भ देते हुए, याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कानून के दायरे में रहकर असहमति जताना लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा है, जिसे अनुच्छेद 19(1)(ए) और 21 के तहत संरक्षण प्राप्त है।

इसके विपरीत, राज्य पक्ष ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही याचिकाकर्ताओं ने प्रतिक्रिया दी और सार्वजनिक स्थान पर पोस्टर लगाए। यह कहा गया कि याचिकाकर्ताओं के इस कदम से देश में अशांति फैल सकती थी।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद, कोर्ट ने पाया कि शिकायत में केवल इतना कहा गया था कि यह फैसला ‘न्याय से वंचित करना” है और इसमें ‘न्याय के लिए आवाज़’ उठाई गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया, “…यदि शब्दों का यही इस्तेमाल किया गया है, तो यह आईपीसी की धारा 153ए और 295ए के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा…”।

इस प्रकार, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले से केवल असंतोष जताना इस तरह के अपराध के दायरे में नहीं आता। ‘जावेद अहमद हजम’ मामले में तय किए गए सिद्धांतों के आधार पर, कोर्ट ने दोहराया कि धारा 153ए के तहत अपराध की जांच इस बात से होती है कि उन शब्दों का आम समझ रखने वाले लोगों के एक बड़े समूह पर क्या असर पड़ता है।

कोर्ट ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा, “केवल इसलिए कि कुछ लोगों के मन में नफरत या दुर्भावना पैदा हो सकती है, यह आईपीसी की धारा 153ए की उप-धारा (1) के खंड (ए) को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

एफआईआर को रद्द करने की याचिका को स्वीकार करते हुए, अदालत ने निष्कर्ष निकाला: “…सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई विस्तृत चर्चा और निर्धारित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, यह सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करके कार्यवाही को रद्द करने के लिए एक उपयुक्त मामला है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि यह केवल एक फैसले के प्रति असहमति जताना है, न कि समाज में अशांति या वैमनस्य पैदा करना। इसमें केवल यह कहा गया है कि न्याय नहीं मिला है और अपनी आवाज़ उठाई गई है; यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के दायरे में आता है…”

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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