राष्ट्रीय हरित अधिकरण की रिपोर्टः यमुना की सफाई के दावे सच्चाई से बहुत दूर

महीने भर भी नहीं गुजरे जब दिल्ली की आप सरकार और इसके गवर्नर यमुना की सफाई को लेकर बड़े-बड़े दावे करने में लगे थे और सारा श्रेय खुद लेने के लिए बयान पर बयान दे रहे थे। ‘आई लव यू यमुना’ जैसे जुमलों से यमुना की सफाई का अभियान चलाने की बात कर रहे थे। उस समय ‘जनचौक’ ने स्पष्ट किया था कि यमुना सिर्फ बात करने से नहीं, ठोस काम करने से ही साफ हो सकती है। यमुना की सफाई को लेकर बुधवार को जारी की गई रिपोर्ट में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने स्पष्ट किया है कि ‘इसके पानी की जो गुणवत्ता है वह संतोषजनक नहीं है।’ यमुना में दिल्ली से बहकर आ रहे पानी में दो जगहों- पल्ला और वजीराबाद में जरूर कुछ सुधार दिखा है, लेकिन अन्य जगहों की स्थिति या तो जस की तस है या और भी बिगड़ी है।

दिल्ली सरकार की ओर से राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सामने 5 जुलाई को पेश किये आंकड़े में दिखता है कि पिछले 6 महीने में स्थिति बेहतर होने के बजाए खराब ही हुई है। जनवरी, 2023 में प्रति मिनट गैलन पानी का बहाव 960, सीवेज का बहाव 768, जबकि अशोधित सीवेज का बहाव 238 था। जून 2023 में यह क्रमशः 990, 792 और 245 है। यहां इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि इस समयावधि में झुग्गी बस्ती और जेजे काॅलोनी की सीवर लाइन को नालों से जोड़ने की संख्या में 124 की वृद्धि हुई है। इसका अधिकांश हिस्सा ट्रीटमेंट प्लांट से नहीं जुड़ा है।

पानी में मुख्यतः दो हिस्से होते हैं, एक कार्बनिक और दूसरा अकार्बनिक। इन दोनों के संयोजन को तोड़ने और पानी को शु़द्ध करने के लिए जितनी मात्रा में ऑक्सीजन की जरूरत होती है उसे बीओडी और सीओडी के नाम से जाना जाता है। इसमें से बीओडी कार्बनिक पदार्थों की संरचना तोड़ने के लिए ऑक्सीजन की मात्रा है और सीओडी रासायनिक पदार्थों की संरचना तोड़ने के लिए जरूरी ऑक्सीजन की मात्रा है। बीओडी का मानक 3 एमजी प्रतिलीटर या उससे कम है जबकि सीओडी के लिए 5 एमजी या उससे अधिक की जरूरत होती है। हालांकि ये मानक मध्यम-प्रदूषित पानी का है और अभी इसे ही मानक मान लिया गया है। शुद्ध पानी का बीओडी 1 एमजी से कम होना चाहिए।

निजामुद्दीन पर लिये गये सैंपल में सीओडी प्रति मिलीग्राम 152 था और बीओडी 52। ओखला बैराज पर यह क्रमशः 170 और 48, असगरपुर में यह क्रमशः 181 और 50 एवं आईएसबीटी पुल पर यह 144 और 40 था। सीओडी का यह बढ़ाव दिखाता है कि दिल्ली के नालों में रासायनिक पदार्थों की मात्रा काफी ज्यादा है और इसमें निश्चय ही उद्योगों का कचरा और रसायन से भरा पानी बिना सफाई के नालों से बहता हुआ यमुना में गिर रहा है। सीवेज लाइन से आने वाला गंदा पानी इन सभी आंकड़ों में एक समान ही दिखता है। इस अवधि में ट्रीट किये पानी के प्रयोग में थोड़ी सी वृद्धि दिख रही है। इस संदर्भ में ट्रीटमेंट प्लांट को स्थापित करने और उसे सक्रिय करने की स्थिति संतोषजनक नहीं है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण का मुख्य जोर यमुना में आ रहे कचरे और गंदे पानी को रोकने और ट्रीटमेंट प्लांट का प्रयोग कर पानी का दिल्ली के भीतर ही प्रयोग करने का है। इस नीति के तहत दिल्ली सरकार की पहलकदमी में दिल्ली की झीलों को पुनर्जीवित करने का कार्य शुरू हुआ। इन झीलों में जो गंदा पानी सीधे उतरता था, उसे अब ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ दिया गया और इसके किनारे की जमीनों पर पेड़ों से भरे पार्क निर्माण की नीति अपनाई गई है। 

इससे दिल्ली में कई सारी झीलों का उद्धार होता तो दिख रहा है लेकिन सच्चाई यही है कि इसमें इकठ्ठा जल ‘साफ’ होने के मानक से बहुत दूर है और इसमें से उठती बदबू झील की अवधारणा को तोड़ती है। एनजीटी का जोर प्रदूषण को क्षेत्रीय स्तर पर सुधारने की नीति की तरह दिख रही है। हाल ही में एम्स के इलाके में, शुद्ध हवा के लिए पेड़ लगाने और पानी शुद्धिकरण की व्यवस्था विकसित करने आदि के निर्देश इस तरह की क्षेत्रीय नीति को ही प्रदर्शित करता है। हाल ही में यमुना के भीतर से टनों कचड़ा निकालने का काम किया गया है। 

निश्चय ही इस तरह की पहलकदमी से यमुना की सफाई में वृद्धि होगी। लेकिन, मुख्य मसला वहीं रुका हुआ है। जब तक यमुना में पानी का उपयुक्त बहाव और उचित ऑक्सीजन व कम रसायन की मात्रा वाले पानी में वृद्धि नहीं होगी, साथ ही इसके किनारों की परिस्थितिकी को सुरक्षित नहीं किया जायेगा तब तक यमुना की सफाई में गुणात्मक वृद्धि नहीं होगी। यमुना के लिए एकमात्र मॉनसून ही वह प्राकृतिक हस्तक्षेप है जिससे वह साल भर में एक बार साफ हो पाती है, बाकी दिनों में वह विविध तरह की नीतियों, दावों, राजनीति और उसके नारों के शोर के नीचे से बहते रसायन और कार्बनिक गंदगी से दम तोड़ने के लिए मजबूर रहती है।

(अंजनी कुमार पत्रकार हैं।)

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