एक मरती हुई नदी पर सुख की शैया : किसे आएगी नींद इस पर?

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इस बार जब दिल्ली के विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ शुरू हुईं, तब किसी को शायद ही यह उम्मीद रही हो कि यमुना नदी भी चुनाव का एजेंडा बन जाएगी। यमुना की सफाई को लेकर आप पार्टी और उसकी सरकार ने जो बड़े-बड़े दावे किए थे, उसमें वह नाकाम रही थी। यमुना का पानी पीने का उसका दावा फेल हो चुका था। यमुना नदी में उठते सफेद झाग उसकी मरती हुई हालत को बयाँ कर रहे थे। दिल्ली विधानसभा चुनाव को यमुना ने कितना प्रभावित किया, इसे शायद ही किसी मीडिया घराने ने अध्ययन किया हो। लेकिन उस समय इतना साफ होने लगा था कि यमुना को लेकर कुछ योजनाएँ बनकर तैयार हैं।

इसी बीच 13 मार्च, 2025 को यमुना पर संसदीय रिपोर्ट आई। इस रिपोर्ट का सारांश यही था कि यह नदी दिल्ली में आकर लगभग अपना अस्तित्व खो चुकी है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि यदि दिल्ली में सीवेज के सारे बहाव को साफ कर नदी में आने दिया जाए, तब भी यह नदी अपने जीवन में तभी वापस आ पाएगी जब वजीराबाद से साफ पानी का बहाव सुनिश्चित कर दिया जाए। साल के कुल 12 महीनों में से 9 महीने इस बैराज से नाममात्र का ही पानी आगे जाता है। लेकिन इसके साथ यह सच भी जुड़ा हुआ है कि दिल्ली इस नदी को इस शहर में गंदा करने में 79 प्रतिशत की भूमिका निभाती है।

पिछले कुछ सालों से यमुना के बाढ़ का पानी शहर में घुसना शुरू हुआ है। इस पर काफी हाय-तौबा मचाई गई। इस नदी पर दिल्ली के भीतर हो रहे निर्माणों और इससे फैलने वाले कचरे के बारे में खूब बात हुई। यमुना के किनारे गरीब लोगों की बस्तियों को उजाड़ा गया। वहीं बड़े पैमाने पर नदी के किनारे और नदी के ऊपर निर्माण कार्य जारी रखा गया। निश्चित ही इन निर्माणों को पर्यावरण से जुड़ी नियमावली से छूट मिली हुई थी। यमुना का नदी तट, जिसे काफी संवेदनशील माना जाता रहा है, पिछले 20 सालों में निर्माण की भेंट चढ़ता गया है। अभी तक ये निर्माण मुख्यतः पुलों, मंदिरों, मेट्रो, इंडियन रेल और सड़क निर्माण से जुड़े हुए थे। लेकिन अब परिदृश्य बदलता हुआ दिख रहा है।

पिछले दो दिनों से इंडियन एक्सप्रेस में छप रही खबरों के अनुसार, अब आने वाले समय में दिल्ली के लोग यमुना के तट पर चहलकदमी और शॉपिंग का मज़ा ले सकेंगे। 31 मार्च, 2025 की खबर के अनुसार, आज जहाँ सराय काले खाँ के पास वाला मिलेनियम पार्क वाला बस डिपो है, उसी के पास 25 हेक्टेयर क्षेत्र में एक बड़ा पियाज़ा-कह सकते हैं बड़ा बाज़ार केंद्र-वनस्पतियों की कलाकारी, उद्यान आदि बनाने की योजना सामने आई है।

1 अप्रैल, 2025 की खबर बताती है कि कुल 1660 हेक्टेयर क्षेत्र को 10 हिस्सों में बाँटकर विकसित करने की योजना है। यमुना के किनारों पर 6 नए सार्वजनिक क्षेत्रों का 2 से 3 सालों में निर्माण किया जाएगा। ये निर्माण वजीराबाद से लेकर निज़ामुद्दीन पुल के पश्चिमी किनारों तक होंगे। इसमें छठ के लिए घाट निर्माण से लेकर कैफे, टहलने के लिए पार्क, वाटिका, और बायोडायवर्सिटी पार्क का निर्माण शामिल है।

इन खबरों के साथ छपी योजनाओं की चित्रावली को देखने से साफ पता चलता है कि कुछ निर्माण पहले से जारी हैं। खासकर पार्कों और घाटों का निर्माण वजीराबाद से शुरू होकर आईटीओ के पास तक हम देख सकते हैं। इसी तरह आईटीओ पुल को पार करते ही गरीब लोगों की बस्तियों को हटाकर वहाँ पार्क निर्माण का काम कई सालों से जारी है। इसी तरह हम आईटीओ से लेकर महारानी बाग के पीछे के हिस्से तक, जिसमें सराय काले खाँ का मिलेनियम पार्क भी शामिल है, पार्कों और अन्य निर्माण को देख सकते हैं। इन निर्माणों के साथ अन्य निर्माणों की घोषणा इसे किस हद तक उपभोग को बढ़ावा देगी, यह देखना अभी बाकी है।

इस संदर्भ में दिल्ली विकास प्राधिकरण का बयान यह सुनिश्चित करने का दावा करता है कि इससे नदी का तट और खुद नदी पर खराब असर नहीं होगा। बयान में यह बताया गया है कि निर्माण में ऐसे मैटेरियल का प्रयोग नहीं किया जाएगा जिसका नदी पर्यावरण पर खराब असर पड़े। जाहिर है, कोई भी योजना इस दावे के साथ शुरू ही नहीं हो सकती जिसमें पहले से ही पर्यावरण को खराब करने की योजना नत्थी हो। इन योजनाओं का मूल्यांकन तो प्राधिकरणों के बाहर वे समूह ही कर सकते हैं जो योजनाओं के हितों में खुद हिस्सेदार न हों।

दिल्ली वालों को नेचर पार्क और ईको-टूरिज़्म जैसे शब्द और नदी के किनारे चहलकदमी व खरीदारी की योजनाएँ कितना लुभाएँगी, यह आने वाले समय में ही दिखेगा। लेकिन इससे खुद नदी कितनी साफ होगी, इस पर एक भी शब्द खोजना मुश्किल है। हाँ, यह ज़रूर बताया गया है कि इससे नदी गंदी नहीं होगी। यमुना को एक नदी होना इस शहर में अब तक मयस्सर होना बाकी है। इतना तो स्पष्ट है कि ये योजनाएँ नदी की सफाई को लेकर नहीं हैं। ये कुछ और ही हैं। यह बाज़ार को पर्यावरण से जोड़ देने की वह मशक्कत है जिसके केंद्र में मुनाफा है। यह नदी इसी मुनाफे की अर्थव्यवस्था में आज न सिर्फ नाले में बदल गई है, बल्कि अपने जीवन से भी वंचित हो रही है।

(अंजनी कुमार लेखक-पत्रकार हैं)

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