ओएसए के तहत आरोपी को चार्जशीट में शामिल दस्तावेज़ देने से मना नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत आरोपी व्यक्ति के खिलाफ़ अभियोजन पक्ष द्वारा इस्तेमाल किए गए दस्तावेज़ों को उसे देने से सिर्फ़ इस आशंका के आधार पर मना नहीं किया जा सकता कि ऐसे गोपनीय या अहम दस्तावेज़ देने से देश की सुरक्षा और संरक्षा को खतरा हो सकता है।

लाइव लॉ के अनुसार जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा, “…हमारी पक्की राय है कि अपीलकर्ताओं को दस्तावेज़ देने से सिर्फ़ इस आधार पर मना नहीं किया जा सकता कि उनके खिलाफ़ ओएसए के प्रावधान लागू किए गए।”

बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द किया, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस आदेश में दखल दिया गया था, जिसमें अपीलकर्ता-आरोपी को दस्तावेज़ देने का निर्देश दिया गया था।

कोर्ट ने कहा, “यह स्थापित कानून है कि किसी आरोपी को चार्जशीट का हिस्सा रहे दस्तावेज़ों (जिनमें जनरल डायरी के दस्तावेज़ भी शामिल हैं) तक पहुंच से वंचित नहीं किया जा सकता, अगर ऐसे दस्तावेज़ नेक नीयत से हासिल किए गए हों, अभियोजन पक्ष के मामले के लिए प्रासंगिक हों और न्याय व निष्पक्ष सुनवाई के हित में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर द्वारा उनका खुलासा करना ज़रूरी समझा जाए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ऐसे दस्तावेज़ों को छिपाने से आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर गंभीर असर पड़ सकता है।”

अपीलकर्ता वी.के. सिंह भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल हैं और नवंबर 2000 से जून 2004 तक कैबिनेट सचिवालय (रॉ) में संयुक्त सचिव के तौर पर भी काम कर चुके हैं। उन पर ओएसए,1923 की धारा 3/5 और भारतीय दंड संहिताकी धारा 409/120B के तहत मामला दर्ज किया गया।

यह मामला “इंडिया’स एक्सटर्नल इंटेलिजेंस – सीक्रेट्स ऑफ़ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग” शीर्षक से किताब प्रकाशित करने के लिए दर्ज किया गया, जिसमें, आरोप है कि, उन्होंने सेना के बारे में कई गोपनीय जानकारी प्रकाशित की थीं।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, इन जानकारियों से आम जनता और विदेशियों/विदेशी देशों को देश के गोपनीय रहस्यों का पता चला, जिससे भारत की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरा पैदा हुआ। अपीलकर्ता के खिलाफ़ चार्जशीट दाखिल की गई, जिसमें सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट से अनुरोध किया कि चार्जशीट का हिस्सा रहे सभी गोपनीय दस्तावेज़ों को सीलबंद लिफ़ाफ़े में रखा जाए।

ट्रायल कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और उसके बाद अपीलकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 207 के तहत दस्तावेज़ उपलब्ध कराने के लिए अर्ज़ी दायर की। चार्जशीट में बताए गए दस्तावेज़ों को उपलब्ध कराने के ट्रायल कोर्ट के निर्देश से असंतुष्ट होकर अभियोजन पक्ष हाई कोर्ट गया।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले में बदलाव किया और अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट के पास मौजूद दस्तावेज़ों को देखने की अनुमति दी ताकि वह ट्रायल के दौरान अपना बचाव ठीक से कर सके। हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट गया।

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि ओएसए लागू होने से आरोपी का चार्जशीट का हिस्सा रहे दस्तावेज़ों की कॉपी पाने का अधिकार खत्म नहीं होता।

हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द करते हुए जस्टिस माहेश्वरी ने अपने फ़ैसले में कहा कि चार्जशीट में बताए गए दस्तावेज़ न देने से आरोपी को ट्रायल के दौरान अपना बचाव करने के महत्वपूर्ण अधिकार से वंचित किया जाता है।

कोर्ट ने ओएसए की धारा 14 के तहत सीबीआई के इस तर्क को खारिज किया कि दस्तावेज़ उपलब्ध कराने की अनुमति देने से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। इसके बजाय, ‘सुपरिटेंडेंट एंड रिमेंब्रेंसर ऑफ़ लीगल अफेयर्स, वेस्ट बंगाल बनाम सत्येन भौमिक और अन्य, (1981) 2 SCC 109’ मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दस्तावेज़ न देने के पक्ष में सीबीआई के तर्क को महज़ एक आशंका बताया।

कोर्ट ने कहा कि यह आशंका आरोपी के उस कानूनी अधिकार को कम या खत्म नहीं कर सकती, जिसके तहत वह चार्जशीट में बताए गए दस्तावेज़ उपलब्ध कराने की मांग कर सकता है।

कोर्ट ने सत्येन भौमिक मामले का हवाला देते हुए यह बात कही, “अगर किसी आरोपी को पुलिस द्वारा दर्ज किए गए बयान या जांच या ट्रायल के दौरान गवाहों के बयान नहीं दिए जाते हैं तो वह अपना बचाव कैसे कर सकता है और अपने वकील को गवाहों से सफलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से जिरह करने के लिए कैसे कह सकता है ताकि अभियोजन पक्ष के मामले को गलत साबित किया जा सके?

इसलिए हमारा मानना है कि धारा 14 का मकसद कभी भी आरोपी से उस अहम अधिकार को छीनना या उससे वंचित करना नहीं रहा होगा, जो उसे देश के आपराधिक कानून के तहत मिला है।”

इसके अलावा, सत्येन भौमिक मामले में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संवेदनशील या अहम जानकारी लीक होने से रोकने के लिए ओएसए की धारा 5 के तहत पहले से ही पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए।

कोर्ट ने सत्येन भौमिक मामले में यह टिप्पणी की, “इस अधिनियम की धारा 5 के तहत कोई भी व्यक्ति जिसके पास कोई दस्तावेज़ या जानकारी है और वह उसे सार्वजनिक करता है तो उसे उस धारा के तहत अपराध करने वाला माना जाएगा, उस पर मुकदमा चलाया जाएगा और भारी जुर्माना लगाया जाएगा। इसलिए यह वकीलों को भी कोर्ट के बाहर सबूतों का खुलासा करने से रोकता है।”

नतीजतन, अपील स्वीकार की गई और प्रतिवादी-सीबीआई  को निर्देश दिया गया कि वह आरोपी द्वारा मांगे गए दस्तावेजों की टाइप की हुई प्रतियां उपलब्ध कराए। कोर्ट ने यह आदेश दिया, “हम निर्देश देते हैं कि अपीलकर्ता द्वारा सीआरपीसी की धारा 207 के तहत दायर आवेदन के पैरा नंबर 1(ए) और 1(बी) में बताए गए दस्तावेजों की टाइप की हुई प्रतियां आरोपी को उसके बचाव के लिए दो महीने के भीतर उपलब्ध कराई जाएं। यदि आवश्यक हो तो ट्रायल कोर्ट द्वारा अदालती कार्यवाही के दौरान उन दस्तावेजों के निरीक्षण की अनुमति दी जा सकती है।”

(जनचौक ब्यूरो)

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