जेन ज़ी से संवाद का संघी स्वांग और मजबूरी की भागवत कथा

जंतर मंतर का झटका सचमुच जोर का लगा है। इतना जोर का कि सपड़ा ही नहीं बंध पा रहा। सूझ ही नहीं रहा कि बताएं तो बताएं क्या, छुपायें तो छुपायें क्या। फिलहाल तो कुनबे में जिसे देखो वो जेन-जी बनने की कोशिश में मार आकाश पाताल एक किये हुए है। शुरुआत मोदी के रतजगे और फ्रेंड्ज से शुरू होने वाली रीलों से हुई। 

इस रील की रीच के रिकॉर्ड – जो  उस पर आई आलोचनात्मक टिप्पणियों का नतीजा थी – कायम करने का आधा सच सुनने के बाद प्रधानमंत्री को रीलें बनाने का ऐसा चस्का लग गया है कि अब वे कभी गमछे, कभी स्कार्फ तो कभी तौलिये बिछाकर उनसे खेलते हुए रात रात भर जागकर रीलें ही रीलें बनाए जा रहे हैं।

जब पता चला  कि इनका उलटा असर हो रहा है और ब्रह्मा जी की रेटिंग धरती चूम रही है, जेन-जी साधे नहीं सध रही है, उलटे उसके साथ जेन-अल्फा भी उतरती जा रही है तब स्वयं रिमोटधारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत मैदान में उतरे। उन्होंने इस बार हमेशा की तरह प्रबोधन नहीं संबोधन दिया और उसकी शुरुआत भी संघ जिसे भारतोचित और सांस्कृतिक मानता है उन शब्दों  ‘भाइयो बहनों, युवकों और युवतियों या फिर  वत्सो  और वत्साओ  के बजाय अपने स्वभाव के विपरीत  “फ्रेंड्स” से की। 

वे बहुत कम ही अंग्रेजी बोलते हैं, लेकिन 6 अगस्त  को उन्होंने बोली। सिर्फ भाषा में ही नहीं अपने अंदाज़ में भी उन्होंने जेन-जी बनने की जी भर कोशिश की – इस पीढ़ी  के हाव-भाव भी दिखाए। हालांकि बिना किसी पूर्वाग्रह के कहें तो यह कि ऐसा करते हुए वे  बहुत ही दयनीय नजर आये।  

100 से अधिक शहरों से चुनकर बुलाये गए 15 से 19 वर्ष के कोई 2000 युवक युवतियों के बीच बोलते हुए सरसंघचालक जो भी बोले तय करके बोले। अब तक बोले जाने वाले विषयों से बचते बचाते अपने स्वभाव से हटकर बोले। युवा भारत के बीच उठी गुस्से की लहर से सहम कर डरकर बोले। जंतर मंतर पर इतिहास रचने वाले युवाओं के खिलाफ अपने कुनबे की तरफ से उलीची जा रही  नफरती गालीगलौज की कीच से खुद को काफी हद तक झटक कर बोले । 

बोले कि हाल में हुए जेन-ज़ी प्रदर्शन में विरोध प्रदर्शन करने वाले जेन ज़ी एंटी-नेशनल नहीं हैं और लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन भी सहमति बनाने का एक माध्यम है। बोले कि युवाओं ने जो शिकायतें उठाईं वे जायज शिकायतें हैं।  भारत की शिक्षा व्यवस्था में बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है और वह नहीं हो पा रहा है, इसलिए ये मुद्दे उठ रहे हैं। यह भी बोले कि संवाद निश्चित रूप से होना चाहिए।  विरोध के दौरान अलग-अलग विचार सामने आते हैं और चर्चा के बाद एक सहमति बनती है। 

यह चर्चा संवाद के ज़रिए हो सकती है। अगर किसी वजह से बात नहीं सुनी जाती है तो आंदोलन किया जा सकता है। 

हालांकि इसमें भी किन्तु परन्तु लगाने से नहीं चूके और कहा कि इसका उद्देश्य सहमति बनाना होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन पैदा करना, जैसे नीट घोटाले के अपराधियों को सजा देने की मांग उठाने से  समाज में विभाजन हो जाएगा।  बोले कि आन्दोलन करने  वाले हमारी अगली पीढ़ी हैं। इनके साथ बातचीत के साथ-साथ, इन्हें अपनापन महसूस कराने की भी ज़रूरत है।  

अब यह बात वे जंतर मंतर पर पैलेट गन, कील लगी लाठियों, एक्सपायरी डेट वाले आंसू गैस के गोलों और गंदे पानी की बौछारों से “संवाद” और आन्दोलनकारी युवतियों से अश्लील बर्ताव से उन्हें “अपनापन” महसूस कराने वाली अपने मोदी और शाह की सरकार को सुनाने के लिए कह रहे थे या हॉल में बैठे युवाओं को बहलाने के लिए कह रहे थे यह तो वे ही जानें। अलबत्ता उन्हें इतना जरूर मालूम था कि सामने बैठे युवा – भले देश भर से उन्हीं के कुनबे द्वारा चीन्ह चीन्ह कर लाये गए हैं मगर – बुद्दू नहीं हैं। 

यह बात उन्होंने स्वयं भी मानी और  कहा कि  जेन-ज़ी और जेन-अल्फ़ा की सोच पहले की पीढ़ियों से अलग है।  जब हम उनकी उम्र के थे तो बड़ों की बात मान लेना हमारी आदत थी, हम सवाल नहीं करते थे.लेकिन आज जेन-ज़ी और जेन-अल्फ़ा सवाल करते हैं, वे तर्कसंगत जवाब चाहते हैं। यह बात अलग थी कि उनके एक भी सवाल को अपनी पूरी भागवत कथा में सरसंघचालाक जी ने छुआ तक नहीं।

पुचकारने के अंदाज में उन्होंने यह भी कहा कि जेन ज़ी सिर्फ़ विरोध के लिए आवाज़ नहीं उठा रहा है। वे कुछ समस्याओं के कारण अपनी बात रख रहे हैं और उन समस्याओं का समाधान होना चाहिए। बहरहाल इतनी सावधानी और तयशुदा स्क्रिप्ट के बाद भी अपने वालों को बचाने की कोशिश उन्होंने नहीं छोड़ी। युवाओं को समझाया कि आंदोलन किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार के लिए होना चाहिए। 

अपनी बात गले उतारने के लिए वे यहाँ तक बोल गए  कि जनरेशन  जेड  और जनरेशन अल्फा वर्तमान पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार हैं और देशभक्ति और सेवा की भावना से प्रेरित होकर अपील का जवाब देती हैं।

इतना डर और भय क्यों था इस पर आने से पहले यह जानना ठीक रहेगा कि जो कहा गया है वह क्या सच में दिल से कहा गया है?  यह सवाल इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वे सुप्रीमो हैं उस संघ के उनसे नीचे वाले पदाधिकारियों से लेकर उनकी पूरी सेना ठीक इससे उलटी दिशा में खड़ी अस्त्र-शस्त्र भांज रही है। जंतर मंतर के युवाओं के विरुद्ध युद्ध सा छेड़े हुए है। 

संघ के दोनों मुखपत्र ऑर्गनाईजर और पांचजन्य और उनकी आई टी सैल आन्दोलनकारियों के हाथों के पोस्टर्स और फैस्टून्स की ही नहीं उनके बाहरी भीतरी वस्त्रों की भी जाँच पड़ताल कर रही थी। सोशल मीडिया खातों में घुसपैठ कर आन्दोलनकारी युवतियों के फोन नम्बर्स सार्वजनिक किये जा रहे थे और उन्हें गालियाँ सुनाने के लिए ट्रोल आर्मी छुट्टा छोड़ी जा रही थी। चौदह साल की अवयस्क किशोरी से रो रोकर माफ़ी मंगवाई जा रही थी। उसके माफीनामे पर उछल उछल कर विजय घोष किया जा रहा था। 

इस धर्मयुद्ध में तलवार भांजने  केरल वाले बौद्धिक इंचार्ज मोहनदास ही नहीं उतरे थे, भागवत जी के सहायक महासचिव – सह सरकार्यवाह – अतुल लिमये भी कूदे हुए थे और इस आंदोलन को राष्ट्रविरोधी बता रहे थे। मंच से लगे नारों पर सवाल उठा रहे थे। तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान तो इन युवाओं को  शाहीन बाग़ की तर्ज पर  “दहशतगर्दों” और विघटनकारी तत्वों की “बी-टीम” बता ही चुके थे ।  

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन इससे भी आगे पहुँचकर इस प्रदर्शन को शिक्षा सुधार के लिए नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार को निशाना बनाने के लिए एक प्रायोजित और विदेशी फंडिंग वाला आन्दोलन बता रहे थे। इसमें शामिल लोगों के पीछे के तत्वों को “टुकड़े-टुकड़े गैंग” का हिस्सा बता रहे थे। दावा कर रहे थे कि कुछ लोग विदेशों में बैठकर भारत के युवाओं को दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ ताकतें डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल कर भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही हैं।

आरएसएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने दावा कर रहे थे  कि इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी ताकतें हैं जो भारत को मजबूत और विकसित नहीं देखना चाहतीं।  केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू अपनी संसद तो चला नहीं पा रहे थे, युवा आंदोलन के इरादों और “भारत विरोधी ताकतों” के साथ इसके कथित संबंधों पर सवाल जरूर उठा रहे थे।  

भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज प्रदर्शनकारियों पर “अराजकता” फैलाने का आरोप लगा रही थी, तो उन्हीं की पार्टी के एक और नेता कह रहे थे कि नीट आंदोलन को “भारत विरोधी अराजकतावादी” गिरोह ने हाईजैक कर लिया है। इस पूरे तूमार के बीच, इससे एकदम उलट राग में कथा सुनाने खुद भागवत जी का आना कुछ लोगों – कुछ को ही – को गलती को सुधारने जैसे आत्म-स्वीकरण का काम लगा। 

पुलिसिया और शाब्दिक दमन की इन जघन्यताओं के बीच,  मीडिया प्रबंधन की सारी कवायदों, ध्यान बंटाऊ तिकड़मों,  आन्दोलन और विरोध के सम्मान और संवाद की जरूरतों के भागवत आख्यान के झांसे में वे ही आ सकते हैं जो फासिस्टों की कार्यप्रणाली को नहीं जानते। दिखावे के लिए कहे गए को सच मानने की गफलत में वे ही पड़ सकते हैं जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में कुछ नहीं जाना। मुंह में राम बगल में छुरी इनका आजमाया हुआ पैंतरा है जिसे अब तक अयोध्या के राम मंदिर वाले राम भी जान चुके होंगे। 

इसलिए सवाल सिर्फ इन बोलवचनों का ही नहीं है, जंतर मंतर पर पुलिस से भी आगे बढ़कर बेदर्दी से लाठी बरसाने वाले और विशेषकर लड़कियों को निर्लज्ज तरीके से प्रताड़ित करने वाले उन बेवर्दी सिविल ड्रेस वालों का भी था जिनकी आरएसएस के साथ संबद्धता के अनेक प्रमाण सामने आये हैं। भागवत जी इनके बारे में नहीं बोले तो नहीं बोले।

जिस जेन जी और जेन अल्फा की देशभक्ति और योग्यता और क्षमता और सम्भावनाओं की वे अपनी भागवत कथा में भूरि भूरि प्रशंसा कर रहे थे उस पर दिनदहाड़े हुई पुलिसिया हिंसा पर वे एक शब्द नहीं बोले।  संघ भाजपा नेताओं के भौंडे और अपमानजनक बयानों में से एक का भी खंडन किये बिना भागवत जी ने एकदम से यू-टर्न लेने का जो करतब दिखाया है उससे महात्मा गाँधी की कही बात याद आती है। 

तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर से मुलाक़ात के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कथनी और करनी के अंतर पर टिप्पणी करते हुए गांधी ने कहा था कि “आरएसएस के कहे पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।”  गांधी के अलावा देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, जिन्हें आरएसएस अपने पितृ-पुरुष के रूप में गोद लेने को लालायित रहता है,  ने भी महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ की विचारधारा और उनकी बातों पर अविश्वास जताते हुए यही चेतावनी दोहराई थी। 

जब जब अपनी करतूतों से संघ और उसका कुनबा गर्म तवे पर बैठा है तब तब उसे इस तरह की उलटबांसियां सूझी हैं। 

ऐसा न अनायास हुआ है न दिल से किया गया है। यह बुझे मन से मजबूरी में किया गया अधूरा संवाद है। युवतर भारत के इस उभार की सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि इसने 56 इंच के छोटे बंदर की ही शिनाख्त नहीं की बल्कि अपने ऊपर बरसने वाले डंडे के पीछे वाले हाथ को भी भलीभांति पहचाना है। उसने अच्छी तरह समझ लिया है कि शिक्षा प्रणाली का भट्टा बिठाने वाला कोई और नहीं वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है जिसके सुप्रीमो मोहन भागवत हैं। 

यह भी कि 2014 के बाद से बना हर शिक्षा मंत्री सीधे नागपुर की ख़ास पसंद का रहा है।  वह भलीभांति जनता है कि संघ ही है जो समूची शिक्षा प्रणाली पर गोबर लीपकर उसके गौमूत्राभिषेक पर आमादा है। यह इन्टरनेट से दुनिया के हर सच झूठ की लेटेस्ट अपडेट रखने वाली पीढ़ी है जिसे पता है कि नीट सहित हर पर्चा लीक और व्यापम सहित हर भर्ती घोटाले  के तार आखिर में जाकर संघ से जुड़े किसी न किसी बड़े नेता तक पहुंचे हैं।

यही वजह थी कि जंतर मंतर पर यंग इंडिया के आक्रोश के निशाने पर मोदी शाह के साथ साथ आरएसएस भी था। दसियों हजार की संख्या में युवा उसके नागपुर मुख्यालय पर भी प्रदर्शन करने भी जा पहुंचे थे। 

भागवत जानते हैं  कि जेन जी और जेन अल्फा वह पीढ़ी है जो मंदी के दौर में जन्मी, नोटबंदी की आपदा में स्कूल गयी और कोरोना की महाआपदा में बड़ी हुई है – यह वह पीढ़ी है जो इनकी व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी के हिन्दू मुस्लिम एजेंडे के सच को इन्स्टाग्राम से मिलने वाली वैश्विक जानकारियों की कसौटी पर तौलती है और बिना डरे मुखरता से बोलती है।  

6 अगस्त की भागवत कथा सुनने के बाद सभागार से बाहर निकली एक किशोरी ने इसका प्रमाण भी दे दिया और भागवत के कहे से असहमति जताते हुए कहा कि जो बोला गया, जो टैक्स्ट में दिया गया है उसमें न कोई तथ्य है न समाधान !!  उसने कहा कि रोजगार का विकल्प उद्यमिता – एंटरप्रेन्योरशिप – नहीं हो सकती। पूँजीवाद में छोटी मोटी उद्यमिता टिक ही नहीं सकती।  

उधर नीता मुकेश अम्बानी के नाम पर बने कल्चरल सेंटर में भागवत बेरोजगारी के सवाल को गोल मोल घुमा रहे थे, इधर अर्थशास्त्र का यह सत्य दोहरा कर जेन अल्फा कही जाने वाली पीढ़ी उसकी पोल उजागर कर रही थी। पूरा कुनबा सरे बाजार निर्वस्त्र खड़ा है, जितना खुद को ढांपने के जतन कर रहा है, उतना ही और उघड़ रहा है । दस अगस्त को जेन जी और जेन अल्फा के अभिभावकों – किसान और मजदूरों – ने एक हजार से अधिक जगहों पर दस लाख से अधिक संख्या में गिरफ्तारियां देकर इसी प्रक्रिया को गति भी दी है, दिशा भी दी है । 

(बादल सरोज लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)

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